भाग 4
संयोग से निखिल और मीरा का निजी कक्ष आर्या वाले कक्ष के पास था।
आर्या ने दीवार के उस पार से एक पुरुष की आवाज सुनी—
“मीरा को ठंडा पेय मत दीजिए। उसका गला जल्दी खराब होता है। भोजन थोड़ा तीखा रखिए, लेकिन बहुत तैलीय नहीं।”
आर्या का हाथ रुक गया।
वह आवाज निखिल जैसी थी।
अगले कक्ष में परिचारक ने कहा,
“आप अपनी पत्नी का बहुत ध्यान रखते हैं।”
निखिल ने उत्तर दिया,
“उसका ध्यान रखना कोई बोझ नहीं। इससे मुझे खुशी मिलती है।”
आर्या का हृदय काँप उठा।
यही वाक्य निखिल उससे कहा करता था।
वह उठकर बाहर आई, मगर सुरक्षा कर्मियों ने निजी कक्ष के पास जाने से रोक दिया।
“भीतर कौन है?”
“हमारी संस्था की अध्यक्ष और उनके पति।”
करण ने आर्या का हाथ पकड़कर कहा,
“देखा? वह निखिल नहीं है।”
आर्या वापस चली गई, लेकिन मन नहीं माना।
कुछ देर बाद मीरा हाथ धोने बाहर गई और निखिल भी गलियारे में आ गया।
आर्या ने उसे स्पष्ट देख लिया।
तीन वर्षों की तलाश, पछतावा और प्रतीक्षा एक ही क्षण में टूटकर बाहर आ गए।
वह दौड़कर निखिल से लिपट गई।
“निखिल!”
निखिल का शरीर सख्त हो गया।
“आर्या, मुझे छोड़ो।”
“मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगी। तुम्हें पता है मैंने इन तीन वर्षों में तुम्हें कितना खोजा?”
निखिल ने उसके हाथ हटाए।
“खोजा? मुझे लगा तुम करण से विवाह कर चुकी होगी।”
“मेरे और करण के बीच कुछ नहीं है। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी। तुम्हारा घर पूरा करवा दिया है। चलो वापस देवगढ़ चलते हैं।”
“मैं कहीं नहीं जा रहा।”
“अब भी नाराज हो? मैं क्षमा माँगती हूँ। मैंने अपनी गलतियों पर बहुत विचार किया है। हम पहले जैसे हो सकते हैं।”
निखिल ने शांत स्वर में कहा,
“पहले जैसा होना ही तो मैं नहीं चाहता।”
“तुम मुझसे प्रेम करते हो।”
“करता था।”
“झूठ!”
“हमारा संबंध तीन वर्ष पहले समाप्त हो चुका है।”
आर्या की आँखों से आँसू बहने लगे।
“तुमने मेरे लिए अपना भविष्य छोड़ा था। मेरे लिए देवगढ़ आए। मेरी हर जरूरत पूरी की। अपने मित्र, परिवार और शौक छोड़ दिए। इतना सब करने वाला व्यक्ति अचानक प्रेम करना कैसे छोड़ सकता है?”
निखिल ने गहरी साँस ली।
“अचानक नहीं छोड़ा, आर्या। हर अपमान के साथ थोड़ा-थोड़ा प्रेम समाप्त होता गया। जिस दिन कुछ बचा ही नहीं, उस दिन मैं चला आया।”
“मैं बदल जाऊँगी।”
“तुम मुझे वापस चाहती हो या उस व्यक्ति को, जो बिना शिकायत तुम्हारे लिए भोजन बनाता था, औषधि रखता था और तुम्हारे हर आदेश को प्रेम समझता था?”
“मैं तुम्हें चाहती हूँ।”
“बहुत देर हो चुकी है।”
आर्या ने काँपते स्वर में पूछा,
“वह स्त्री कौन है?”
“मेरी पत्नी।”
आर्या पीछे हट गई।
“पत्नी?”
“हमने तीन वर्ष पहले विवाह-पंजीकरण किया था। कल परिवार और मित्रों के सामने हमारा विवाह समारोह है।”
“नहीं। तुम मुझे जलाने के लिए झूठ बोल रहे हो।”
“तुम आकर देख सकती हो।”
उसी समय मीरा वहाँ पहुँची।
उसने आर्या की ओर देखा और फिर निखिल से पूछा,
“सब ठीक है?”
“हाँ। पुरानी पहचान है।”
आर्या ने कहा,
“मीरा, तुम्हें शायद पता नहीं कि निखिल ने मेरे लिए कितना कुछ किया है। हमारा दस साल का संबंध था।”
मीरा का स्वर शांत था।
“मुझे सब पता है।”
“फिर भी तुम हमारे बीच आ गईं?”
“मैं आपके बीच नहीं आई। जब निखिल मेरे पास लौटा था, तब आपके बीच कुछ बचा ही नहीं था।”
करण भी वहाँ पहुँच गया।
वह निखिल पर तंज कसते हुए बोला,
“तो तुमने किसी धनवान स्त्री को पकड़ लिया और तीन साल में पुराना प्रेम भूल गए?”
निखिल ने उसकी ओर देखा।
“मेरे जीवन का मूल्य तुम्हारी समझ से बाहर है।”
करण आगे बढ़ा।
“तुम्हारे जैसे व्यक्ति को मीरा में प्रेम नहीं, उसका धन दिखाई दिया होगा।”
निखिल ने उसका हाथ झटक दिया।
पास रखे सजावटी बक्से करण की टक्कर से गिरने लगे। आर्या उनके नीचे खड़ी थी।
निखिल ने उसे धक्का देकर दूर किया। एक भारी बक्सा उसके घायल हाथ पर आ गिरा।
मीरा तुरंत निखिल के पास पहुँची।
“तुम ठीक हो?”
आर्या भी आगे बढ़ी, मगर उसी क्षण करण कराहने लगा—
“मेरे कंधे में चोट लगी है।”
आर्या अनजाने में पहले करण की ओर मुड़ गई।
मीरा ने यह दृश्य देख लिया।
उसने कठोर स्वर में कहा,
“आर्या जी, आप कहती हैं कि आपने अपनी गलतियाँ समझ ली हैं। लेकिन संकट आते ही आपने फिर उसी व्यक्ति को चुना, जिसके कारण निखिल हमेशा पीछे छूटता रहा।”
आर्या रुक गई।
“मैं… मैंने जान-बूझकर नहीं…”
“निखिल ने आपको बचाते हुए फिर चोट खाई। फिर भी आपकी पहली दृष्टि करण पर गई। यही आपका सत्य है।”
आर्या की आँखें झुक गईं।
मीरा ने निखिल का हाथ थामा।
“चलो।”
आर्या ने उनका रास्ता रोक लिया।
“निखिल, मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगी। तुमने पहले मुझसे प्रेम किया था। अब मेरी बारी है। मैं तुम्हें वापस जीतूँगी।”
निखिल ने उसकी ओर आखिरी बार देखा।
“प्रेम किसी प्रतियोगिता का पुरस्कार नहीं है, आर्या। कल मेरे विवाह में आना। शायद मुझे किसी और का होते देखकर तुम्हें यह सत्य स्वीकार हो जाए।”
वह मीरा के साथ चला गया।
आर्या वहीं खड़ी रही।
कुछ देर बाद उसने आँसू पोंछे और धीमे स्वर में कहा—
“निखिल, कल मैं तुम्हें किसी और का नहीं होने दूँगी।”
दोस्तों, अब कहानी उस बिंदु पर पहुँच चुकी थी, जहाँ एक ओर तेरह वर्षों की प्रतीक्षा का प्रेम था और दूसरी ओर खो चुके अधिकार को वापस पाने की जिद।
अगली रात केवल एक विवाह नहीं होने वाला था।
वहाँ निखिल के अतीत और भविष्य का अंतिम निर्णय होने वाला था।
सूर्यनगर के प्राचीन राजमहल के आँगन को उस रात हजारों दीपों और गेंदे के फूलों से सजाया गया था।
दीवारों पर पीले और लाल वस्त्र लहरा रहे थे। बीच में विशाल मंडप बना था, जिसके चारों ओर दोनों परिवारों के लोग बैठे थे। शहनाई की मधुर धुन वातावरण को शांत और पवित्र बना रही थी।
निखिल क्रीम रंग की शेरवानी में मंडप के पास खड़ा था। वर्षों बाद उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी, जिसमें किसी को प्रसन्न करने का प्रयास नहीं था। वह मुस्कान भीतर से निकली थी।
मीरा लाल और सुनहरे रंग के विवाह-वस्त्र में सीढ़ियों से उतर रही थी।
उसकी आँखें निखिल पर टिकी थीं।
वह लड़की, जिसने कभी निखिल से यह नहीं पूछा था कि वह उसके लिए क्या छोड़ सकता है, आज उसके साथ वह जीवन शुरू करने जा रही थी, जिसमें दोनों अपने-अपने सपनों के साथ रह सकते थे।
विवाह कराने वाले आचार्य ने कहा,
“इन दोनों को इस क्षण तक पहुँचने में तेरह वर्ष लगे हैं। समय ने इन्हें अलग-अलग दिशाओं में भेजा, परीक्षाएँ लीं, मगर अंततः उसी स्थान पर लाकर खड़ा किया जहाँ इनकी प्रतीक्षा समाप्त हो सके।”
मीरा की माँ आँसू पोंछ रही थीं।
निखिल ने अंगूठी उठाई।
तभी मुख्य द्वार से तेज आवाज आई—
“यह विवाह नहीं हो सकता!”
सभी लोग मुड़कर देखने लगे।
द्वार पर आर्या खड़ी थी।
उसने लाल विवाह-वस्त्र पहन रखा था। उसके हाथ में एक अंगूठी और पुराना पीतल का ताला था। उसके पीछे सुरभि और करण खड़े थे।
निखिल के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
मीरा ने शांत स्वर में पूछा,
“आप यहाँ क्यों आई हैं?”
आर्या धीरे-धीरे मंडप की ओर बढ़ी।
“निखिल से विवाह करने।”
लोगों के बीच फुसफुसाहट होने लगी।
निखिल ने कहा,
“आर्या, मैंने कल सब स्पष्ट कर दिया था।”
“तुमने अपने मन की बात कही थी। आज मेरी बात सुनोगे।”
वह निखिल के सामने आकर खड़ी हो गई।
“निखिल, तुमने मेरे लिए अपना अनुसंधान छोड़ा था। मेरे साथ देवगढ़ आए। पाँच वर्षों तक मेरे लिए भोजन बनाया। मेरी बीमारी, मेरी पसंद, मेरी प्रत्येक जरूरत का ध्यान रखा। खतरे में अपनी जान तक दाँव पर लगा दी। क्या कोई व्यक्ति बिना प्रेम के इतना सब कर सकता है?”
“नहीं,” निखिल ने कहा, “मैंने वह सब प्रेम में ही किया था।”
आर्या की आँखें चमक उठीं।
“तो फिर यह अंगूठी मुझे पहना दो। उस समय तुम मेरे पीछे चलते थे। अब मैं तुम्हारे पीछे चलूँगी। तुमने मेरे लिए अपने शौक छोड़े थे। अब मैं तुम्हारे लिए अपना काम छोड़ दूँगी। तुमने मेरे मित्रों को स्वीकार किया, अब मैं करण से कभी नहीं मिलूँगी।”
निखिल कुछ क्षण उसे देखता रहा।
“तुम आज भी नहीं समझी कि मैं क्यों गया था।”
“तो समझाओ।”
“मैंने अनेक बार समझाने की कोशिश की थी।”
“कब?”
निखिल ने शांत मगर भारी स्वर में कहा—
“जब पंजीकरण कार्यालय में मैं दसवीं बार तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था।”
आर्या की पलकें झपकने लगीं।
“जब मैंने कहा था कि आज हमारे विवाह का पंजीकरण होना है, तुमने कहा था—‘केवल एक प्रमाणपत्र है, कभी भी बन जाएगा।’”
आँगन में सन्नाटा छा गया।
“जब मैं तुम्हारे माता-पिता के लिए उपहार लेकर आया था, तुमने कहा था कि विवाह की बात करके तुम्हारे कार्य में बाधा मत डालूँ।”
“वह समय उचित नहीं था…”
“जब मैंने तुम्हारे साथ एक जैसे वस्त्र पहनने की इच्छा जताई, तुमने उन्हें पाँच वर्षों तक अलमारी में बंद रखा।”
“मुझे ऐसी चीजें पसंद नहीं थीं।”
“जब मैं अपने मित्रों के साथ एक शाम बिताना चाहता था, तुमने कहा था कि मेरे कपड़ों में धुएँ की गंध आएगी।”
“क्योंकि मुझे वह गंध सच में पसंद नहीं थी।”
“जब मैंने अपने पसंद का वैज्ञानिक प्रतिरूप खरीदा, तुमने उसे बच्चों का खिलौना कहकर लौटवा दिया।”
आर्या के पास कोई उत्तर नहीं था।
निखिल आगे बोला—
“जब मैं वर्षा में बुखार के साथ खड़ा था, तुम करण को गाड़ी में बैठाकर चली गईं।”
“उसके पिता का निधन हुआ था।”
“मैंने तुम्हें उसे सांत्वना देने से नहीं रोका था। मैंने केवल इतना कहा था कि मेरी स्थिति भी देख लो।”
“मैंने सोचा तुम संभाल लोगे।”
“हर बार तुमने यही सोचा। निखिल संभाल लेगा। निखिल समझ जाएगा। निखिल प्रतीक्षा करेगा। निखिल भोजन बना देगा। निखिल क्षमा कर देगा।”
आर्या की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मुझसे गलती हुई।”
“झींगों से मुझे गंभीर एलर्जी थी। तुम्हें पता था। फिर भी करण के लिए तुमने मुझे वही भोजन बनाने को मजबूर किया।”
“मैंने नहीं सोचा था कि केवल छूने से—”
“यही समस्या थी, आर्या। तुमने कभी सोचा ही नहीं।”
निखिल की आवाज अब भी ऊँची नहीं हुई थी, लेकिन हर शब्द वर्षों का दबा हुआ दर्द लेकर निकल रहा था।
“जब उस व्यक्ति ने करण को बंधक बनाया, तुमने मुझे उसकी जगह जाने को कहा। मेरी गर्दन कट गई। तुमने पहले करण की जाँच की। मैंने रक्त बहाते हुए संबंध समाप्त करने की बात कही, और तुमने उसे मजाक समझ लिया।”
आर्या ने काँपते हुए कहा,
“मैं चिकित्सक थी। मुझे लगा उसकी धमनी—”
“और मेरी गर्दन से बहता रक्त तुम्हें दिखाई नहीं दिया?”
“मैं गलत थी।”
“हाँ। तुम गलत थीं। मगर मैं केवल तुम्हारी गलतियों के कारण नहीं गया। मैं इसलिए गया क्योंकि तुम्हारे साथ रहते-रहते मैं स्वयं भी गलत बन गया था।”
“तुम?”
“मैंने प्रेम के नाम पर अपना सम्मान छोड़ दिया। अपने सपने छोड़ दिए। अपनी पहचान छोड़ दी। हर बार जब तुमने मुझे अनदेखा किया, मैंने स्वयं से कहा कि यह प्रेम की परीक्षा है। हर बार जब तुमने करण को चुना, मैंने स्वयं को समझाया कि तुम केवल दयालु हो। मैं तुम्हें दोष देते-देते भी तुम्हारे लिए बहाने बनाता रहा।”
निखिल ने मीरा की ओर देखा।
“फिर मुझे समझ आया कि प्रेम वह नहीं, जिसमें एक व्यक्ति लगातार मिटता रहे और दूसरा इसे सामान्य मान ले।”
आर्या ने अपने हाथ की अंगूठी आगे बढ़ाई।
“मुझे एक अवसर दे दो। मैं सब ठीक कर दूँगी।”
“कुछ संबंध टूटने के बाद जोड़े नहीं जाते। उनसे सीखकर आगे बढ़ा जाता है।”
“दस वर्षों का संबंध तुम तीन वर्षों की पहचान के लिए छोड़ रहे हो?”
निखिल ने कहा,
“संबंध की गहराई उसकी आयु से नहीं मापी जाती। किसी भावनात्मक रूप से अनुपस्थित व्यक्ति के साथ तीस वर्ष भी बिताए जाएँ, तो वे तीस वर्ष प्रेम नहीं बन जाते।”
आर्या ने मीरा की ओर देखते हुए कहा,
“तुम इसे इसलिए चुन रहे हो क्योंकि यह धनवान है। इसके परिवार के पास बड़ा व्यवसाय है। तुम्हें शक्ति और सम्मान मिल गया, इसलिए पुराना प्रेम भूल गए।”
निखिल की आँखों में पहली बार क्रोध दिखाई दिया।
“दस वर्षों तक मैंने तुम्हारे लिए अपना प्रत्येक पैसा, प्रत्येक अवसर और प्रत्येक साँस लगा दी। फिर भी तुम मुझे इतना छोटा समझती हो कि धन देखकर विवाह कर लूँगा?”
“मैं क्रोध में बोल गई।”
“तुम्हारे शब्द वही बताते हैं, जो तुम्हारे मन में मेरे लिए हमेशा से था। तुम्हें लगता था मैं साधारण हूँ। मैं केवल तुम्हारे पीछे चलने वाला व्यक्ति हूँ। इसलिए तुम्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि मेरे भीतर तुमसे अलग कोई अस्तित्व भी हो सकता है।”
आर्या ने हाथ में पकड़ा पीतल का ताला उठाया।