भाग 5
“यह पहचानते हो? तुम सामान्य श्रेणी के डिब्बे में तीन दिन खड़े रहकर उज्जैन गए थे। वहाँ मंदिर के पास यह प्रेम का ताला लगाया था। तुमने कहा था कि हमारा संबंध कभी नहीं टूटेगा।”
ताले का एक हिस्सा बीच से टूटा हुआ था।
आर्या ने घबराकर कहा,
“यह सुबह तक ठीक था। इसे किसने तोड़ा?”
निखिल ने कहा,
“शायद समय ने।”
“इसे दोबारा लगवा दो।”
“टूटा हुआ ताला बदल सकता है। लेकिन उसके टूटने से जो सत्य सामने आया है, वह नहीं बदलेगा।”
आर्या अचानक घुटनों के बल बैठ गई।
“मैं तुम्हारे सामने झुक रही हूँ। अब तो विश्वास करो कि मेरा अहंकार समाप्त हो गया है।”
मीरा उसके पास आई।
“उठ जाइए। किसी के सामने घुटने टेकना प्रेम नहीं है।”
आर्या ने कड़वे स्वर में कहा,
“तुम बीच में मत बोलो।”
मीरा ने शांत भाव से कहा,
“मैं बीच में नहीं हूँ। मैं निखिल की पत्नी हूँ और यह हमारा विवाह है।”
“तुम्हें पता है उसने मेरे लिए क्या-क्या किया?”
“पता है। लेकिन उसका एकतरफा समर्पण आपके गर्व का विषय नहीं होना चाहिए। आपको उस पर शर्म और पछतावा होना चाहिए।”
आर्या का चेहरा कठोर हो गया।
“उसने मेरे लिए अनुसंधान का अवसर छोड़ा।”
मीरा ने उत्तर दिया,
“और मैंने उसे अनुसंधान पर जाने के लिए स्वयं विदा किया।”
“उसने मेरे साथ रहने के लिए शहर बदला।”
“मैंने उससे कभी अपना संसार छोड़ने को नहीं कहा।”
“उसने मेरी हर बात मानी।”
“मैं उसके विचारों से असहमत हो सकती हूँ, मगर उसे बोलने से नहीं रोकती।”
मीरा ने निखिल की ओर देखा।
“सच्चा प्रेम कवच होता है, बेड़ी नहीं।”
ये शब्द आर्या के भीतर कहीं गहरे उतर गए।
निखिल ने आचार्य से कहा,
“विवाह की विधि जारी रखिए।”
आर्या ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।
“निखिल, तुम पछताओगे। मैं करण से विवाह कर लूँगी। वह वर्षों से मेरी प्रतीक्षा कर रहा है।”
करण तुरंत आगे आया।
“हाँ, आर्या। मैं तुम्हें निखिल से अधिक प्रेम करूँगा।”
निखिल ने शांत स्वर में कहा,
“तुम दोनों के जीवन के लिए शुभकामनाएँ।”
आर्या ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।
वहाँ ईर्ष्या नहीं थी।
क्रोध नहीं था।
दुख भी नहीं था।
और यही बात उसे सबसे अधिक तोड़ गई।
उसने करण की ओर मुड़कर कहा,
“मैं तुमसे विवाह नहीं करूँगी।”
करण का चेहरा उतर गया।
“अभी तो तुमने कहा…”
“मैं केवल निखिल को ईर्ष्या दिलाना चाहती थी। तुम कभी उसके जैसे नहीं हो सकते।”
करण की मुट्ठियाँ बँध गईं।
“मैंने तीन वर्षों तक तुम्हारा साथ दिया।”
“क्योंकि तुम चाहते थे कि निखिल वापस न आए।”
“मैंने तुमसे प्रेम किया!”
“नहीं। तुमने मेरी निर्भरता का लाभ उठाया। जिस रात तुमने अपने जीवन को समाप्त करने की झूठी धमकी दी थी, उसी रात निखिल हमेशा के लिए चला गया। तुम जानते थे कि वह शहर छोड़ रहा है, फिर भी तुमने मुझे बुलाया।”
करण का चेहरा पीला पड़ गया।
आर्या समझ गई कि उसका अनुमान सही था।
“तुम्हें पता था?”
करण चुप रहा।
आर्या ने उसे थप्पड़ मार दिया।
“मेरी सबसे बड़ी गलती निखिल को अनदेखा करना थी। दूसरी सबसे बड़ी गलती तुम पर विश्वास करना।”
करण की आँखों में अपमान और घृणा उतर आई।
सुरक्षा कर्मी आर्या और करण को बाहर ले गए।
मंडप में फिर शहनाई बजने लगी।
निखिल ने मीरा की उँगली में अंगूठी पहनाई।
मीरा ने धीमे स्वर में पूछा,
“तुम ठीक हो?”
“पहली बार अतीत के सामने खड़े होकर मुझे अपराधबोध नहीं हुआ।”
“अभी भी मन भारी है?”
“दर्द समाप्त होने और स्मृति समाप्त होने में अंतर होता है। स्मृतियाँ रहेंगी, मगर अब वे मेरे निर्णय नियंत्रित नहीं करेंगी।”
मीरा मुस्कराई।
“यही पर्याप्त है।”
कुछ दिनों बाद सूक्ष्म चिकित्सा परियोजना की राष्ट्रीय निविदा का समारोह आयोजित हुआ।
देवगढ़ चिकित्सालय का दल भी वहाँ उपस्थित था। करण को क्रय विभाग का प्रमुख बनाया गया था और उसे विश्वास था कि अपने पिता के पुराने परिचय के कारण निविदा उनके पक्ष में जाएगी।
वह अपने साथियों से कह रहा था—
“परियोजना का तकनीकी अध्यक्ष आचार्य देवेंद्र का शिष्य है। मेरे पिता भी उनके परिचित थे। काम लगभग निश्चित है।”
आर्या चुपचाप दस्तावेज देख रही थी।
विवाह वाले दिन के बाद उसने निखिल से संपर्क करने का प्रयास नहीं किया था।
मंच पर उद्घोषणा हुई—
“कृपया राष्ट्रीय सूक्ष्म चिकित्सा परियोजना के मुख्य अभियंता और कार्यकारी अध्यक्ष श्री निखिल त्रिपाठी का स्वागत कीजिए।”
आर्या ने सिर उठाया।
निखिल मंच पर आ रहा था।
पूरा सभागार तालियों से गूँज उठा।
करण की आँखें फैल गईं।
“यह… निखिल?”
मंच पर खड़ा व्यक्ति वह साधारण सहायक नहीं था, जिसे करण वर्षों तक ताना मारता रहा था। उसके पीछे देश के प्रमुख वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी और चिकित्सा विशेषज्ञ बैठे थे।
निखिल ने अपना संबोधन शुरू किया—
“तकनीक का वास्तविक उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं, मनुष्य का जीवन बेहतर बनाना है। कोई भी आविष्कार कितना भी महान क्यों न हो, यदि वह सामान्य रोगी तक नहीं पहुँचता तो उसकी चमक अधूरी है।”
उसने सूक्ष्म चिकित्सा प्रणाली की जानकारी दी, जिसकी सहायता से गंभीर रोगों का उपचार कम पीड़ा और अधिक सटीकता से किया जा सकता था।
आर्या उसे देखती रही।
उसे महाविद्यालय वाला निखिल याद आया, जिसकी आँखें अनुसंधान की बात करते समय चमक उठती थीं।
फिर उसे वह दिन याद आया जब उसने कहा था—
“यदि तुम चले गए तो हमारा संबंध समाप्त।”
उसने केवल एक अवसर नहीं रोका था।
उसने निखिल की उड़ान रोक दी थी।
मीरा उसके पास आकर बैठी।
आर्या ने कहा,
“तुम मुझे यह दिखाने आई हो कि निखिल तुम्हारे साथ अधिक सफल है?”
मीरा ने उत्तर दिया,
“मैं केवल यह बताने आई हूँ कि जिस व्यक्ति को प्रेम मिलता है, उसे अपने सपने और संबंध में से एक नहीं चुनना पड़ता।”
“यदि मैंने उसे जाने दिया होता तो शायद वह पाँच वर्ष पहले यहाँ होता।”
“शायद।”
आर्या की आँखें भीग गईं।
“मैंने उसे बाँधकर रखा।”
“गलती स्वीकार करना पहला कदम है। लेकिन स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि सामने वाला वापस लौटने के लिए बाध्य हो जाए।”
कार्यक्रम समाप्त होने पर आर्या ने निखिल को रोका।
“मैं केवल एक बात कहना चाहती हूँ।”
निखिल रुक गया।
“मुझे क्षमा कर दो। वापस आने के लिए नहीं कहूँगी। केवल क्षमा चाहती हूँ।”
“मैंने तुम्हें बहुत पहले क्षमा कर दिया था।”
आर्या की आँखों में आशा जागी।
निखिल ने आगे कहा,
“लेकिन क्षमा का अर्थ संबंध में लौटना नहीं होता। मैंने तुम्हें क्षमा इसलिए किया, ताकि तुम्हारे प्रति क्रोध लेकर अपना जीवन न जीना पड़े।”
आर्या की आशा शांत हो गई।
“तुम सच में आगे बढ़ चुके हो।”
“हाँ।”
“अब तुम्हें मुझ पर क्रोध भी नहीं आता?”
“क्रोध भी एक संबंध होता है। मैं अब उस संबंध से भी मुक्त हूँ।”
आर्या ने सिर झुका लिया।
“आज के बाद मैं तुम्हें परेशान नहीं करूँगी।”
वह भवन से बाहर निकल गई।
करण कुछ दूरी पर खड़ा उनकी बातचीत देख रहा था।
उसका चेहरा क्रोध से विकृत हो गया।
उसने मन में कहा—
“निखिल के कारण आर्या ने मुझे सबके सामने अपमानित किया। यदि वह मेरे साथ नहीं रह सकती तो किसी के साथ नहीं रहेगी।”
अगली सुबह आर्या चिकित्सालय जाने के लिए निकली। सड़क पार करते समय एक तेज गाड़ी उसकी ओर बढ़ी।
आखिरी क्षण में सुरभि ने आवाज लगाई—
“आर्या, सावधान!”
गाड़ी ने उसे टक्कर मार दी।
आर्या दूर जा गिरी।
लोग दौड़कर पहुँचे। गाड़ी कुछ दूरी पर दीवार से टकराई थी, मगर चालक भाग चुका था।
आर्या को चिकित्सालय ले जाया गया।
जाँच के बाद चिकित्सक ने कहा,
“दोनों पैरों में गंभीर बहुखंडीय अस्थिभंग है। उपचार लंबा चलेगा। वह दोबारा चल पाएँगी या नहीं, अभी कहना कठिन है।”
सुरभि रो पड़ी।
मीरा और निखिल भी परियोजना दल के साथ उसी चिकित्सालय में थे। समाचार मिलने पर वे वहाँ पहुँचे।
आर्या ने निखिल को देखकर धीमे स्वर में कहा,
“शायद यह मेरे किए का दंड है।”
निखिल ने कहा,
“दुर्घटना दंड नहीं होती। अभी उपचार पर ध्यान दो।”
“यदि मैंने अपनी गलतियाँ पहले समझ ली होतीं तो क्या हमारा जीवन अलग होता?”
निखिल कुछ क्षण चुप रहा।
“शायद। लेकिन जीवन केवल ‘यदि’ के सहारे नहीं चलता। जो हो चुका है, उसे बदल नहीं सकते। जो आगे है, उसे बेहतर बना सकते हो।”
पुलिस ने सड़क के दृश्य, गाड़ी के अभिलेख और आसपास के कैमरों की जाँच की। गाड़ी करण के परिचित के नाम पर थी। करण ने उसे कई दिन पहले लिया था।
जब पुलिस उसे पकड़ने पहुँची तो वह आर्या के कमरे के बाहर ही मिला।
वह भीतर जाकर कह रहा था—
“अब तुम कहीं नहीं जा पाओगी। मैं तुम्हारा ध्यान रखूँगा। निखिल चला गया, मगर मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा।”
आर्या ने भय से उसकी ओर देखा।
“गाड़ी तुम चला रहे थे?”
करण हँस पड़ा।
“मैं केवल तुम्हें रोकना चाहता था। तुम हमेशा निखिल की ओर भागती रहती थीं। अब तुम्हें मेरी आवश्यकता होगी।”
उसी समय पुलिस भीतर आई।
“करण मल्होत्रा, आपके विरुद्ध जानलेवा हमला, प्रमाण नष्ट करने और पूर्व नियोजित दुर्घटना का प्रकरण दर्ज है।”
करण चिल्लाने लगा—
“मैंने यह सब प्रेम में किया!”
आर्या ने कठोर स्वर में कहा,
“इसे प्रेम मत कहो। प्रेम किसी को पिंजरे में बंद नहीं करता।”
पुलिस उसे ले गई।
कई महीनों तक आर्या का उपचार चला।
निखिल ने परियोजना की ओर से उसे सर्वोत्तम उपचार उपलब्ध करवाया, मगर व्यक्तिगत दूरी बनाए रखी।
आर्या ने पहली बार सहायता को अधिकार समझने के बजाय कृतज्ञता के साथ स्वीकार किया।
पुनर्वास कठिन था। एक-एक कदम सीखते हुए उसे उन अनगिनत अवसरों की याद आती, जब निखिल उसके लिए दौड़ता था और उसने धन्यवाद तक नहीं कहा था।
लगभग एक वर्ष बाद आर्या सहारे के साथ खड़ी होने लगी।
उसने देवगढ़ चिकित्सालय में रोगी सहायता केंद्र शुरू किया, जहाँ अकेले रोगियों और उनके परिवारों के लिए भोजन, औषधि तथा आपात परिवहन उपलब्ध कराया जाता था।
मालती चाची ने उद्घाटन के दिन पूछा,
“इसका नाम क्या रखोगी?”
आर्या ने कहा,
“नई दिशा।”
“निखिल के नाम पर क्यों नहीं?”
आर्या मुस्कराई।
“क्योंकि फिर यह भी उसे वापस पाने का प्रयास लगेगा। उसने मुझे जो सीख दी, उसे मैं अपने व्यवहार में जीवित रखना चाहती हूँ, उसके नाम पर अधिकार जताकर नहीं।”
उधर सूर्यनगर में निखिल और मीरा ने अपने जीवन की नई शुरुआत की।
निखिल राष्ट्रीय परियोजना का संचालन करता और मीरा अपनी औषधि निर्माण संस्था के माध्यम से उपचार को कम लागत में लोगों तक पहुँचाने में सहायता करती।
घर में काम दोनों बाँटते थे।
कभी निखिल भोजन बनाता।
कभी मीरा सब्जी जलाकर कहती—
“भावनाएँ देखो, स्वाद नहीं।”
निखिल अपने पुराने मित्रों से भी मिलने लगा। उसने फिर वैज्ञानिक प्रतिरूप एकत्र करने शुरू किए। अध्ययन कक्ष पुस्तकों और प्रयोगों से भर गया।
एक शाम मीरा ने उसके सामने चिकित्सकीय जाँच का कागज रखा।
“यह क्या है?”
मीरा ने मुस्कराकर कहा,
“तुम पिता बनने वाले हो।”
निखिल कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर उसके चेहरे पर ऐसी खुशी आई, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन था।
“सच?”
“हाँ।”
“बैठो, ध्यान से। सीढ़ियाँ धीरे उतरना। भोजन समय पर करना। ठंडी चीजें मत—”
मीरा हँस पड़ी।
“अभी से आरंभ हो गए?”
निखिल भी हँसने लगा।
कुछ महीने बाद उनके घर पुत्र ने जन्म लिया।
मीरा ने पूछा,
“नाम क्या रखें?”
निखिल ने खिड़की से उगते सूर्य की ओर देखा।
“आदित्य।”
“क्यों?”
“क्योंकि सूर्य हर अँधेरी रात के बाद यह याद दिलाता है कि प्रकाश लौट सकता है। परिस्थितियाँ चाहे कितनी कठिन हों, मनुष्य फिर से उठ सकता है।”
मीरा ने बच्चे को निखिल की बाँहों में देते हुए कहा,
“तो आदित्य ही सही।”
निखिल ने अपने पुत्र को सीने से लगा लिया।
वर्षों पहले वह सोचता था कि आर्या के बिना उसका जीवन समाप्त हो जाएगा।
लेकिन आज उसे समझ आ चुका था कि किसी संबंध का अंत जीवन का अंत नहीं होता।
कभी-कभी वह केवल उस कहानी का अंत होता है, जिसमें हम स्वयं को खो चुके होते हैं।
और दोस्तों, सच्चा प्रेम हमें छोटा नहीं करता।
वह हमसे हमारा अस्तित्व नहीं माँगता।
वह हमें अपने सपनों, मित्रों, परिवार और आत्मसम्मान से दूर नहीं करता।
सच्चा प्रेम वह होता है, जिसमें दो लोग एक-दूसरे के लिए रास्ता छोड़ते नहीं, बल्कि रास्ते पर साथ चलते हैं।
आर्या ने प्रेम खोकर उसका अर्थ समझा।
करण ने अधिकार को प्रेम समझा और सब कुछ खो दिया।
मीरा ने प्रतीक्षा की, मगर निखिल को बाँधने की कोशिश नहीं की।
और निखिल ने अंततः यह सीख लिया कि किसी से प्रेम करने से पहले स्वयं का सम्मान करना भी आवश्यक है।
बरसों पहले एक तूफानी रात में कोई उसे वर्षा के बीच अकेला छोड़ गया था।
उसी रात उसे लगा था कि उसका संसार समाप्त हो गया।
मगर वास्तव में वही रात उसके नए जीवन की पहली सुबह थी।