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मजबूरी में ऑफिस बॉय से शादी की, फिर खुला उसका चौंकाने वाला सच

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

दोस्तों, यह कहानी है अर्जुन की, जो दिन में एक बड़ी औषधि संस्था में ऑफिस बॉय बनकर काम करता था और रात में अपनी माँ का अधूरा सपना पूरा करने के लिए चिकित्सा अनुसंधान की पढ़ाई करता था।

संस्था के मालिक राजवर्धन को जब अर्जुन की अद्भुत प्रतिभा और मेहनत के बारे में पता चलता है, तो वह उसकी पढ़ाई में सहायता करते हैं। लेकिन परिस्थितियाँ तब बदल जाती हैं, जब राजवर्धन अपनी नशे की लत से जूझ रही अमीर और घमंडी बेटी कियारा की शादी अर्जुन से करवा देते हैं।

कियारा इस विवाह को कभी स्वीकार नहीं करती। वह अर्जुन को पति नहीं, एक मामूली नौकर समझकर बार-बार अपमानित करती है। इसी बीच उसका पुराना प्रेमी रोहन अमेरिका से वापस लौटता है और प्रेम का नाटक करके उसकी पूरी संपत्ति हड़पने की खतरनाक योजना बनाता है।

झूठ, विश्वासघात और परिवार के षड्यंत्र के कारण कियारा अपने निर्दोष पति अर्जुन को ही चोर समझ बैठती है। टूटे हुए सम्मान के साथ अर्जुन उसका घर छोड़ देता है। लेकिन जब कियारा की जिंदगी और उसकी संपत्ति दोनों खतरे में पड़ जाती हैं, तब वही व्यक्ति उसे बचाने लौटता है, जिसे उसने सबसे अधिक दर्द दिया था।

क्या अर्जुन अपनी असाधारण खोज से कियारा की जान बचा पाएगा? क्या रोहन का सच सबके सामने आएगा? और क्या कियारा अपने किए हुए अपराधों के बाद अर्जुन का विश्वास दोबारा जीत पाएगी?

जानने के लिए इस भावनात्मक, रहस्यमयी और प्रेरणादायक कहानी को अंत तक जरूर देखिए।

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आप भाग 2 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 79 मिनट

भाग 2

कियारा ने अपने पिता की प्रतिष्ठा, संस्था और अपने अपराध के भय में अर्जुन की ओर देखा।

फिर उसने झूठ बोल दिया—

“गाड़ी अर्जुन चला रहा था।”

अर्जुन स्तब्ध रह गया।

“मैडम…?”

“इसने मेरी अनुमति के बिना गाड़ी ली थी। मैं साथ बैठी थी।”

पुलिस अर्जुन को पकड़कर ले गई।

राजवर्धन अस्पताल पहुँचे तो कियारा ने वही कहानी दोहरा दी।

मगर पुल के पास लगे एक निजी भवन के दृश्य यंत्र में पूरी घटना दर्ज थी। अगले दिन वह चित्र राजवर्धन के हाथ लगा।

उन्होंने कियारा को अपने कक्ष में बुलाया।

“तुमने उस व्यक्ति को जेल भिजवा दिया, जिसने अपनी जान खतरे में डालकर तुम्हें बचाया?”

कियारा की आँखें झुक गईं।

“मैं डर गई थी।”

“डर इंसान से गलती करा सकता है, मगर कायरता उससे किसी निर्दोष की जिंदगी छीन लेती है।”

राजवर्धन तुरंत पुलिस थाने गए।

अर्जुन को छोड़ा गया।

उन्होंने उससे कहा, “मैं कियारा के विरुद्ध शिकायत दर्ज करवाऊँगा।”

अर्जुन ने मना कर दिया।

“नहीं मालिक।”

“उसने तुम्हें अपराधी बना दिया!”

“वह नशे और भय में थी। शिकायत से उसे उपचार नहीं मिलेगा, केवल बदनामी मिलेगी।”

राजवर्धन ने पूछा, “तुम उस लड़की को बचा रहे हो, जो तुम्हें जेल भेजना चाहती थी?”

अर्जुन ने शांत स्वर में उत्तर दिया—

“मैं उसके कर्म को सही नहीं कह रहा। लेकिन एक बीमार इंसान को केवल सजा देना भी सही नहीं होगा।”

जब कियारा को यह बात पता चली, तो पहली बार वह अर्जुन के सामने बोल नहीं पाई।

उसने क्षमा भी नहीं माँगी, लेकिन कई दिनों तक उसकी आँखों में अर्जुन से मिलने का साहस नहीं हुआ।

कुछ सप्ताह बाद राजवर्धन को अचानक सीने में तेज दर्द हुआ। जाँच में पता चला कि उनके हृदय की एक धमनी अत्यंत कमजोर हो चुकी थी। चिकित्सकों ने उन्हें तनाव से दूर रहने की सलाह दी।

उधर कियारा की नशे की लत बढ़ती जा रही थी। वह उपचार केंद्र जाने से इनकार कर रही थी।

एक रात उसने अधिक मात्रा में दवा ले ली। उसकी साँसें धीमी पड़ गईं।

घर में अफरा-तफरी मच गई।

अर्जुन उस समय राजवर्धन को एक शोध फाइल देने आया था। उसने कियारा की हालत देखी और तुरंत उसकी नाड़ी जाँची। चिकित्सक के पहुँचने से पहले उसने प्राथमिक उपचार शुरू किया और उसे अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की।

समय पर उपचार मिलने से कियारा बच गई।

अस्पताल के गलियारे में राजवर्धन टूट चुके थे।

उन्होंने अर्जुन से पूछा, “क्या मेरी बेटी कभी ठीक हो सकती है?”

अर्जुन ने कहा, “हो सकती है। लेकिन उसे दवा से अधिक विश्वास, अनुशासन और लंबा उपचार चाहिए।”

राजवर्धन कुछ देर तक उसे देखते रहे।

फिर बोले, “तुम उससे विवाह कर लो।”

अर्जुन को लगा कि उसने गलत सुना है।

“क्या?”

“मैं चाहता हूँ कि तुम कियारा से विवाह कर लो।”

अर्जुन तुरंत खड़ा हो गया।

“मालिक, विवाह कोई उपचार नहीं है। आपकी बेटी कोई जिम्मेदारी नहीं, जिसे आप एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को सौंप दें।”

“मैं उसे तुम्हारे हवाले नहीं कर रहा। मैं उसे ऐसे व्यक्ति के साथ देखना चाहता हूँ, जो उसके धन से नहीं, उसके जीवन से प्रेम कर सके।”

“लेकिन वह मुझसे घृणा करती है।”

राजवर्धन की आवाज भर्रा गई।

“और मैं शायद अधिक समय तक उसके साथ नहीं रह पाऊँगा।”

अर्जुन ने फिर भी इनकार कर दिया।

कुछ दिनों बाद संस्था में एक और संकट खड़ा हो गया।

कियारा का विवाह एक बड़े व्यापारी परिवार के बेटे से तय किया गया था। राजवर्धन ने सोचा था कि शायद नया संबंध उसे स्थिरता देगा। मगर विवाह के दिन किसी ने समाचार माध्यमों को कियारा की नशे की लत और गाड़ी दुर्घटना की जानकारी भेज दी।

विवाह स्थल के बाहर समाचारकर्मी जमा हो गए।

वर पक्ष ने सबके सामने रिश्ता तोड़ दिया।

लड़के की माँ ने कहा—

“हम अपने घर में नशे की रोगी और झूठी लड़की नहीं लाएँगे।”

कियारा विवाह के वस्त्रों में खड़ी यह अपमान सुनती रही।

उसके परिचित लोग कानाफूसी कर रहे थे। कुछ लोग अपने दूरभाष यंत्रों से दृश्य बना रहे थे।

राजवर्धन ने वर पक्ष को रोकने का प्रयास किया, लेकिन तभी उन्हें हृदयाघात हो गया।

वह मंच के पास गिर पड़े।

अर्जुन वहाँ कर्मचारियों की व्यवस्था देख रहा था। वह दौड़कर आया। उसने राजवर्धन को प्राथमिक उपचार दिया और अस्पताल पहुँचाया।

चिकित्सक ने कहा कि अगले कुछ घंटे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

अस्पताल के बाहर कियारा की स्थिति टूट चुकी थी।

वह विवाह के वस्त्रों में फर्श पर बैठी थी। आँखों का श्रृंगार आँसुओं से बह चुका था।

संस्था के संचालक मंडल का एक सदस्य, जो राजवर्धन का चचेरा भाई महेंद्र मेहरा था, वहाँ पहुँचा। उसने कियारा से कहा—

“तुम्हारी वजह से भाई साहब की यह हालत हुई है। अब संस्था का नियंत्रण तुम्हारे हाथ में नहीं रह सकता।”

महेंद्र लंबे समय से संस्था पर अधिकार चाहता था। उसने कानूनी सलाहकारों को बुलाकर कहा कि यदि राजवर्धन अचेत रहे और कियारा मानसिक रूप से अस्थिर सिद्ध हो जाए, तो संस्था का नियंत्रण उसे मिल जाएगा।

आरोही ने विरोध किया, लेकिन महेंद्र ने कहा—

“तुम सामाजिक सेवा संभाल सकती हो, व्यापार नहीं।”

कियारा ने पहली बार महसूस किया कि उसके पिता के बाद उसके आसपास कोई अपना नहीं रहेगा।

तभी राजवर्धन को कुछ क्षण के लिए होश आया। उन्होंने अर्जुन और कियारा को अपने पास बुलाया।

कमजोर आवाज में उन्होंने कहा—

“मेरी एक अंतिम इच्छा समझकर… एक-दूसरे का साथ स्वीकार कर लो।”

अर्जुन ने कियारा की ओर देखा।

कियारा की आँखों में प्रेम नहीं था। केवल भय, अपमान और असुरक्षा थी।

अर्जुन ने कहा, “निर्णय कियारा का होना चाहिए।”

कियारा काफी देर चुप रही।

फिर उसने धीमे स्वर में कहा—

“मैं विवाह करूँगी। लेकिन यह केवल पिता के लिए होगा।”

अस्पताल के छोटे प्रार्थना कक्ष में उसी रात उनका विवाह हुआ।

न कोई बड़ी सजावट थी, न संगीत, न उत्सव।

अर्जुन ने साधारण कुर्ता पहन रखा था और कियारा अब भी अपने टूटे हुए विवाह के वस्त्रों में थी।

जब अर्जुन ने उसके गले में मंगलसूत्र डाला, कियारा ने उसकी ओर देखे बिना कहा—

“इस विवाह से तुम्हें मेरी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं मिलेगा।”

अर्जुन ने शांत स्वर में उत्तर दिया—

“मुझे तुम्हारी संपत्ति नहीं चाहिए।”

“और मुझसे पति का अधिकार पाने की उम्मीद मत रखना।”

अर्जुन ने कहा—

“अधिकार माँगने से नहीं, विश्वास से मिलता है।”

दोस्तों, इस तरह उनका विवाह तो हो गया, मगर दो दिलों के बीच दूरी पहले से भी अधिक थी।

घर पहुँचने के बाद कियारा ने अर्जुन को अतिथि कक्ष भी नहीं दिया।

उसने सेवकों के रहने वाले हिस्से की ओर इशारा करके कहा—

“तुम वहीं रहोगे। तुम्हारी असली जगह भी वही है।”

अर्जुन ने कोई उत्तर नहीं दिया।

अगली सुबह वह पहले की तरह अपनी पुरानी वर्दी पहनकर दफ्तर पहुँच गया।

कर्मचारी उसे देखकर हैरान थे।

कुछ लोग उसके पीछे हँसने लगे—

“देखो, मालिक का दामाद आज भी चाय बाँट रहा है।”

एक अधिकारी ने मजाक किया—

“अर्जुन, अब चाय में चीनी अधिक डालना। तुम बड़े घर के दामाद हो।”

सभी हँस पड़े।

कियारा पास ही खड़ी थी।

वह चाहती तो उन्हें रोक सकती थी, मगर उसने मुँह फेर लिया।

अर्जुन ने सबको चाय दी और फिर अकेले भोजन कक्ष में बैठकर सूखी रोटी खाने लगा।

कियारा किसी काम से वहाँ आई।

अर्जुन ने पहली बार उसे सीधे देखा।

“मेरी वर्दी मुझे छोटा नहीं बनाती।”

कियारा रुक गई।

अर्जुन ने आगे कहा—

“लेकिन आज आपकी चुप्पी ने आपको जरूर छोटा कर दिया।”

कियारा के चेहरे पर क्रोध आया, पर वह उत्तर नहीं दे सकी।

उस रात नशे की दवा न मिलने पर कियारा की हालत बिगड़ गई। उसने कमरे का सामान फेंकना शुरू कर दिया। अर्जुन ने दरवाजा बंद करके उसे शांत करने की कोशिश की।

कियारा ने काँच का पात्र उठाकर उसकी ओर फेंका।

काँच अर्जुन की बाँह में लगा और खून बहने लगा।

“मुझे कैद मत करो!” कियारा चीखी, “तुम सब मुझे पागल समझते हो!”

अर्जुन दरवाजे के बाहर बैठ गया।

“मैं तुम्हें पागल नहीं समझता।”

“झूठ!”

“मैं तुम्हें एक ऐसी इंसान समझता हूँ, जो किसी और के किए अपराध की सजा खुद को दे रही है।”

अंदर अचानक सन्नाटा छा गया।

अर्जुन पूरी रात दरवाजे के बाहर बैठा रहा।

सुबह कियारा ने दरवाजा खोला। वह थकी हुई थी। उसकी आँखें लाल थीं।

बाहर अर्जुन दीवार से सिर टिकाकर सो गया था। उसकी बाँह पर कपड़ा बँधा था, जो खून से भीग चुका था। पास ही पानी, दवा और भोजन रखा था।

कियारा ने पहली बार उसके घायल हाथ को ध्यान से देखा।

उसके भीतर अपराधबोध उठा, लेकिन अहंकार ने उसे बोलने नहीं दिया।

अब कहानी में धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा।

अर्जुन ने कियारा के लिए उपचार की दैनिक योजना बनाई। वह दवा की मात्रा धीरे-धीरे कम करता, उसे ध्यान करने के लिए कहता और रात को उसके साथ खुले बगीचे में चलता।

कियारा अक्सर उसका अपमान करती।

“तुम चिकित्सक नहीं हो।”

अर्जुन कहता, “हाँ, अभी नहीं हूँ। इसलिए हर निर्णय योग्य चिकित्सक की सलाह से ले रहा हूँ।”

“तुम मेरे पति होने का अभिनय क्यों कर रहे हो?”

“मैं अभिनय नहीं कर रहा। मैं केवल तुम्हें मरते हुए नहीं देख सकता।”

एक दिन कियारा ने उससे पूछा—

“तुम मेरे लिए इतना सब क्यों करते हो?”

अर्जुन ने उत्तर दिया—

“क्योंकि किसी समय मेरी माँ को भी किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी, जो हार न माने। तब कोई नहीं था।”

कियारा ने पहली बार उसकी माँ के बारे में जाना।

उस रात वह काफी देर तक जागती रही।

लेकिन दोस्तों, जब दो लोगों के बीच विश्वास की एक छोटी सी किरण जन्म ले रही थी, उसी समय हजारों किलोमीटर दूर बैठा एक व्यक्ति भारत लौटने की तैयारी कर रहा था।

रोहन मल्होत्रा।

अमेरिका में उसका व्यापार पूरी तरह डूब चुका था। उस पर भारी कर्ज था। जिन लोगों से उसने पैसा लिया था, वे उसके पीछे पड़े थे।

उसके पास अब केवल एक रास्ता था—

कियारा।

उसे पता चला कि कियारा का विवाह एक मामूली दफ्तर सहायक से हो चुका है।

रोहन मुस्कराया।

उसने अपने साथी से कहा—

“जिस लड़की ने मेरे लिए सब कुछ खोया था, वह आज भी मेरे एक झूठ पर विश्वास कर लेगी। पहले उसके पति को रास्ते से हटाना होगा, फिर उसकी संपत्ति मेरी होगी।”

और इस तरह, दोस्तों, अर्जुन और कियारा के जीवन में वह तूफान लौटने वाला था, जिसके घाव अभी तक भरे भी नहीं थे।

दोस्तों, जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा अक्सर तब शुरू होती है, जब हमें लगने लगता है कि अब सब कुछ धीरे-धीरे ठीक हो रहा है।

अर्जुन और कियारा के बीच प्रेम अभी जन्मा नहीं था, लेकिन घृणा की दीवार में पहली दरार जरूर पड़ चुकी थी। कियारा अब भी उसे अपना पति नहीं मानती थी, फिर भी उसकी उपस्थिति में स्वयं को सुरक्षित महसूस करने लगी थी।

वह रात को घबराकर उठती, तो उसकी पहली नजर दरवाजे के बाहर जाती। उसे विश्वास था कि अर्जुन वहीं किसी पुस्तक के साथ बैठा मिलेगा।

अर्जुन ने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर दी थी। राजवर्धन ने उसके लिए संस्था की एक छोटी प्रयोगशाला उपलब्ध करवा दी थी। वह नशे की लत के रोगियों में होने वाले मस्तिष्क परिवर्तन पर शोध कर रहा था।

उसका मानना था कि सभी रोगियों को एक जैसी दवा देना गलत था। हर व्यक्ति के शरीर और मस्तिष्क की प्रतिक्रिया अलग होती है। यदि कुछ विशेष रक्त संकेतों और तंत्रिका प्रतिक्रियाओं को पहले पहचान लिया जाए, तो दवा की मात्रा रोगी के अनुसार तय की जा सकती है।

इससे उपचार के दौरान होने वाली हिंसक प्रतिक्रिया, अवसाद और दोबारा नशे की ओर लौटने की संभावना कम हो सकती थी।

कियारा को इसकी जानकारी नहीं थी, लेकिन अर्जुन उसके उपचार के प्रत्येक दिन से भी कुछ सीख रहा था। वह उसकी पहचान छिपाकर केवल चिकित्सकीय संकेतों को अपनी शोध पुस्तिका में दर्ज करता था।

दूसरी ओर आरोही अर्जुन के प्रति पहले से अधिक सम्मान महसूस करने लगी थी।

एक दिन वह प्रयोगशाला में उसके लिए भोजन लेकर आई।

“तुम फिर खाना भूल गए?”

अर्जुन मुस्कराया।

“बस थोड़ा काम बाकी था।”

“तुम्हारा थोड़ा काम कभी खत्म नहीं होता।”

आरोही ने डिब्बा उसके सामने रखा। अर्जुन ने धन्यवाद दिया।

दरवाजे के बाहर खड़ी कियारा ने यह दृश्य देख लिया।

उसके मन में एक अजीब चुभन हुई।

वह खुद भी नहीं समझ सकी कि उसे क्रोध क्यों आया। वह अर्जुन से प्रेम नहीं करती थी। फिर आरोही के उसके पास बैठने से उसे परेशानी क्यों हुई?

उसने स्वयं से कहा—

“मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।”

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