भाग 4
उस रात उसकी दवा का समय हुआ, तो कोई दरवाजा खटखटाने नहीं आया। पानी का पात्र खाली था। बगीचे में चलने के लिए कोई उसका इंतजार नहीं कर रहा था।
उसने खुद से कहा—
“अच्छा हुआ वह चला गया।”
लेकिन उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उधर आरोही अपराधबोध में डूब चुकी थी।
उसने राजवर्धन को पूरी सच्चाई बता दी कि उसने आधा सच बोलकर अर्जुन के विरुद्ध संदेह बढ़ाया था।
राजवर्धन ने निराश होकर कहा—
“मैंने हमेशा सोचा था कि तुम दोनों में कम से कम तुम न्याय का साथ दोगी।”
आरोही रोते हुए बोली—
“मैंने उसे खोने के डर में ऐसी गलती की, जबकि वह कभी मेरा था ही नहीं।”
राजवर्धन ने कहा—
“प्रेम किसी को पाने की इच्छा नहीं। उसके साथ अन्याय न होने देने का साहस है।”
आरोही ने उसी दिन अर्जुन को ढूँढ़ने की कोशिश की, लेकिन वह शहर छोड़ चुका था।
अब रोहन के लिए रास्ता साफ था।
उसने कियारा से कहा—
“देखा? जैसे ही उसका सच खुला, वह भाग गया।”
कियारा कमजोर थी। उसने रोहन की बात पर विश्वास कर लिया।
रोहन धीरे-धीरे उसके जीवन में वापस आने लगा।
उसने कहा कि कियारा को अपने पिता और संस्था से स्वतंत्र होना चाहिए। उसने कुछ कागज उसके सामने रखे।
“ये केवल अस्थायी अधिकार पत्र हैं। जब तक तुम्हारे पिता स्वस्थ नहीं हो जाते, मैं तुम्हारी संपत्ति संभालूँगा।”
कियारा ने बिना पूरा पढ़े हस्ताक्षर कर दिए।
उसे पता नहीं था कि उन कागजों से रोहन को उसके संस्था अंश बेचने और उसके नाम पर ऋण लेने का अधिकार मिल गया था।
रोहन ने उसकी दवाओं में भी बदलाव करवाया। उसने पुराने भ्रष्ट चिकित्सक से संपर्क किया और कियारा को फिर से ऐसी दवाएँ देने लगा, जिनसे उसका मन भ्रमित रहता।
वह कहता—
“अर्जुन ने तुम्हें दवाओं से कमजोर बना दिया था। ये नई दवाएँ तुम्हें शांति देंगी।”
कियारा कुछ ही सप्ताह में फिर से नशे की गिरफ्त में आने लगी।
राजवर्धन ने विरोध किया, तो रोहन ने कियारा को उनके विरुद्ध भड़का दिया।
“तुम्हारे पिता तुम्हें मानसिक रोगी सिद्ध करके सारी संपत्ति आरोही को देना चाहते हैं।”
कियारा ने पिता से दूरी बना ली।
महेंद्र संस्था के निर्णयों पर अधिकार करने लगा।
एक रात कियारा पानी लेने नीचे आई। बैठक कक्ष से रोहन की आवाज सुनाई दी।
वह किसी स्त्री से बात कर रहा था।
कियारा दरवाजे के पास रुक गई।
अंदर रोहन के साथ एक विदेशी वस्त्र पहने स्त्री बैठी थी।
उस स्त्री ने कहा—
“तुम कब तक इस नाटक को खींचोगे? मैं तुम्हारी पत्नी हूँ। मुझे यहाँ छिपकर रहना पड़ रहा है।”
कियारा का शरीर सुन्न पड़ गया।
रोहन ने कहा—
“बस कुछ दिन और, सान्या। कियारा ने अधिकार पत्रों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। जैसे ही उसके अंश हमारे नियंत्रण में आएँगे, हम उसे उपचार केंद्र भेज देंगे।”
“और अगर वह ठीक हो गई?”
रोहन हँसा।
“वह ठीक नहीं होगी। उसकी दवा की मात्रा बढ़ा दी गई है। लोग मानेंगे कि उसने फिर नशा शुरू कर दिया।”
सान्या ने पूछा—
“उसका पति वापस आ गया तो?”
“अर्जुन? वह अब कभी वापस नहीं आएगा। कियारा ने स्वयं उसका अपमान किया था।”
रोहन ने आगे कहा—
“वैसे भी उसकी शोध सामग्री महेंद्र के पास है। उसे अपराधी साबित करना कठिन नहीं होगा।”
दरवाजे के बाहर खड़ी कियारा की आँखों से आँसू बह निकले।
सारा सच उसके सामने था।
रोहन कभी उससे प्रेम नहीं करता था।
उसने उसे छोड़ा था।
उसने झूठे पत्र बनाए थे।
उसने अर्जुन को फँसाया था।
और सबसे बड़ा सत्य यह था कि अर्जुन ने हर बार उसे बचाया, मगर उसने हर बार उसी पर संदेह किया।
कियारा पीछे हटने लगी, तभी उसके हाथ से पानी का पात्र गिर गया।
आवाज सुनकर रोहन बाहर आया।
कियारा भागने लगी, लेकिन नशे के प्रभाव से उसके कदम लड़खड़ा गए।
रोहन ने उसे पकड़ लिया।
“तुमने कितना सुना?”
कियारा ने उसे थप्पड़ मारने की कोशिश की।
रोहन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“बहुत देर हो चुकी है।”
उसने महेंद्र को बुलाया।
दोनों ने मिलकर कियारा को गाड़ी में बैठाया और शहर से दूर एक निजी उपचार केंद्र में पहुँचा दिया। वहाँ के संचालक को भारी धन दिया गया था।
अगली सुबह पूरे परिवार को बताया गया कि कियारा ने अत्यधिक नशा कर लिया था और उसे गुप्त उपचार के लिए भेजा गया है।
किसी को उससे मिलने की अनुमति नहीं थी।
राजवर्धन ने विरोध किया, लेकिन अधिकार पत्रों के कारण रोहन ने स्वयं को कियारा का कानूनी प्रतिनिधि घोषित कर दिया।
आरोही को शक हुआ।
उसने कियारा के कमरे की तलाशी ली। वहाँ उसे अर्जुन की छोड़ी हुई शोध पुस्तिका और संपत्ति अधिकार छोड़ने वाला दस्तावेज मिला।
पुस्तिका के अंतिम पन्ने पर अर्जुन ने लिखा था—
“रोगी ने आज पहली बार बिना दवा के पूरी रात नींद ली। उसमें ठीक होने की इच्छा है, भले ही वह स्वयं इसे स्वीकार नहीं करती।”
नीचे एक और पंक्ति थी—
“किसी भी शोध में उसकी पहचान उपयोग नहीं की जाएगी। उसका सम्मान मेरी उपलब्धि से अधिक महत्वपूर्ण है।”
आरोही की आँखें भर आईं।
उसे समझ आ गया कि अर्जुन ने कभी कियारा का उपयोग नहीं किया था।
उसी समय उसे कियारा की मेज के नीचे एक छोटा ध्वनि अभिलेखक मिला। शायद गिरने के कारण वह चालू हो गया था। उसमें रोहन और सान्या की बातचीत का कुछ हिस्सा दर्ज था।
आरोही तुरंत पुलिस के पास जा सकती थी, लेकिन महेंद्र का प्रभाव बहुत बड़ा था और अभिलेख अधूरा था।
उसे केवल एक व्यक्ति याद आया, जो कियारा को उस उपचार केंद्र से जीवित निकाल सकता था।
अर्जुन।
मगर अर्जुन कहाँ था, यह किसी को पता नहीं था।
कई सप्ताह तक खोजने के बाद आरोही को जानकारी मिली कि वह हिमालय के पास एक छोटे सरकारी चिकित्सा अनुसंधान केंद्र में काम कर रहा है।
आरोही वहाँ पहुँची।
अर्जुन एक साधारण कमरे में रोगियों के रक्त नमूनों की जाँच कर रहा था। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और आँखों के नीचे थकान थी, मगर उसके सामने रखी शोध सामग्री पहले से अधिक विस्तृत थी।
आरोही को देखकर वह चुप हो गया।
आरोही ने रोते हुए कहा—
“मैं क्षमा माँगने आई हूँ।”
अर्जुन ने कहा—
“क्षमा माँगने के लिए इतनी दूर आने की जरूरत नहीं थी।”
“मैंने तुम्हारे विरुद्ध आधा सच बोला। उस आधे सच ने तुम्हारी पूरी जिंदगी तोड़ दी।”
अर्जुन ने नजरें झुका लीं।
आरोही ने कहा—
“कियारा खतरे में है।”
अर्जुन का हाथ रुक गया।
उसने तुरंत प्रश्न नहीं किया।
आरोही ने पूरी बात बता दी।
अर्जुन ने कठोर स्वर में कहा—
“उसके पास पिता हैं, वकील हैं, पुलिस है।”
“लेकिन उसे बचाने वाला कोई नहीं है।”
“मैं वापस जाकर क्या करूँ? फिर से अपने चरित्र का प्रमाण दूँ?”
आरोही ने ध्वनि अभिलेखक उसके सामने रख दिया।
“इस बार तुम्हें उसके पति के रूप में नहीं, एक रोगी के जीवन के लिए बुला रही हूँ।”
अर्जुन कुछ देर तक मौन रहा।
फिर उसने अपनी प्रयोगशाला की ओर देखा। उसकी शोध लगभग पूरी हो चुकी थी। उसने ऐसे जैव संकेत पहचान लिए थे, जिनसे नशे की घातक मात्रा और रोगी के शरीर की प्रतिक्रिया का तुरंत अनुमान लगाया जा सकता था।
कियारा जिस केंद्र में थी, वहाँ उसकी दवा लगातार बढ़ाई जा रही थी।
अर्जुन ने अपना छोटा चिकित्सा पात्र उठाया।
“मैं कियारा को बचाने चलूँगा।”
आरोही की आँखों में आशा जगी।
लेकिन अर्जुन ने आगे कहा—
“उसे बचाने के बाद मैं उसके जीवन से वापस चला जाऊँगा।”
दोस्तों, अब कहानी अपने सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुँच चुकी थी।
एक ओर कियारा उस बंद उपचार केंद्र में कैद थी। रोहन उसके हस्ताक्षर लेकर उसकी संपत्ति बेचने वाला था। दूसरी ओर अर्जुन वह इंसान था, जिसे उसने सबसे अधिक चोट पहुँचाई थी।
फिर भी वही उसे बचाने लौट रहा था।
लेकिन क्या अर्जुन समय पर पहुँच पाएगा?
क्या रोहन कियारा को जीवित छोड़ेगा?
और सबसे बड़ी बात—अगर कियारा बच भी गई, तो क्या अर्जुन का टूटा हुआ विश्वास कभी फिर जुड़ सकेगा?
दोस्तों, कुछ रिश्ते प्रेम से बनते हैं, कुछ कर्तव्य से और कुछ ऐसे होते हैं, जिन्हें टूटने के बाद फिर जोड़ने के लिए केवल आँसू पर्याप्त नहीं होते। उनके लिए इंसान को अपने भीतर की पूरी दुनिया बदलनी पड़ती है।
अर्जुन आरोही के साथ दिल्ली लौट रहा था।
पूरे रास्ते वह खिड़की से बाहर देखता रहा। उसके मन में पुराने दृश्य आते रहे।
कियारा का उसे अपराधी कहना।
उसका विवाह की अंगूठी छोड़ना।
उसका घर से निकल जाना।
वह स्वयं से पूछ रहा था—
“मैं क्यों लौट रहा हूँ?”
उत्तर हर बार एक ही आता—
“क्योंकि किसी रोगी को उसके अपराध के कारण मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।”
अर्जुन ने अपने मन को समझा लिया था कि वह कियारा को पत्नी नहीं, एक रोगी मानकर बचाएगा।
उधर निजी उपचार केंद्र में कियारा की हालत बिगड़ती जा रही थी।
उसे एक बंद कमरे में रखा गया था। खिड़की पर लोहे की जाली थी और दरवाजे के बाहर पहरेदार बैठता था। रोहन हर दूसरे दिन वहाँ आता और कागजों पर उसके हस्ताक्षर करवाने की कोशिश करता।
एक दिन वह कुछ दस्तावेज लेकर आया।
“इन पर हस्ताक्षर कर दो।”
कियारा ने कमजोर आवाज में पूछा, “ये क्या हैं?”
“तुम्हारे उपचार के कागज।”
“झूठ।”
रोहन मुस्कराया।
“अब तुम्हें सच और झूठ में फर्क समझ आता है?”
कियारा ने दस्तावेज फाड़ने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे।
रोहन ने उसका चेहरा पकड़कर कहा—
“तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी जानती हो क्या है? तुम प्रेम नहीं करतीं, तुम किसी व्यक्ति पर निर्भर हो जाती हो। पहले मुझ पर हुईं, फिर अपने नशे पर और फिर उस दफ्तर सहायक पर।”
कियारा ने धीमे स्वर में कहा—
“अर्जुन तुमसे लाख गुना अच्छा है।”
रोहन का चेहरा बदल गया।
उसने कियारा को थप्पड़ मार दिया।
“अब उसका नाम याद आ रहा है?”
कियारा की आँखों से आँसू निकले।
“वह हर बार मुझे बचाता रहा… और मैंने हर बार उसे चोट दी।”
रोहन ने पहरेदार को संकेत दिया।
कियारा को दवा का इंजेक्शन लगाया गया।
कुछ ही देर में उसकी चेतना धुँधली होने लगी।
रोहन ने उपचार केंद्र के संचालक से कहा—
“कल तक इसके सभी अंश हमारे नाम होने चाहिए। उसके बाद मात्रा इतनी बढ़ा देना कि यह कभी पूरी तरह ठीक न हो।”
उसी शाम अर्जुन, आरोही और राजवर्धन के विश्वसनीय वकील ने उपचार केंद्र की जानकारी जुटाई।
पुलिस को सूचना दी गई, लेकिन रोहन और महेंद्र ने पहले से व्यवस्था कर रखी थी। उपचार केंद्र के अभिलेखों में लिखा था कि कियारा अपनी इच्छा से भर्ती हुई थी और उसके कानूनी प्रतिनिधि ने बाहरी लोगों से मिलने पर रोक लगाई थी।
अर्जुन ने कहा—
“कानूनी प्रक्रिया में समय लगेगा। उसके शरीर को समय नहीं मिलेगा।”
आरोही ने पूछा, “तुम क्या करोगे?”
अर्जुन ने उपचार केंद्र का नक्शा देखा।
“पीछे औषधि आपूर्ति का द्वार है। हर रात नौ बजे वाहन आता है।”
राजवर्धन के विश्वसनीय चालक की सहायता से अर्जुन औषधि आपूर्ति करने वाले कर्मचारी के रूप में केंद्र के भीतर पहुँचा।
उसने साधारण वर्दी पहन रखी थी।
विडंबना देखिए दोस्तों—जिस वर्दी के कारण दुनिया उसे छोटा समझती थी, उसी वर्दी ने उस रात उसे कियारा तक पहुँचने का रास्ता दिया।
केंद्र के भीतर जाते ही अर्जुन ने रोगियों की दशा देखी। कई लोगों को आवश्यकता से अधिक शांतिदायक दवाएँ दी जा रही थीं। वहाँ उपचार से अधिक कैद का वातावरण था।
अर्जुन ने अभिलेख कक्ष में प्रवेश किया और कियारा की चिकित्सा फाइल ढूँढ़ी।
दवा की मात्रा देखकर उसके चेहरे का रंग बदल गया।
“यह मात्रा जानलेवा है।”
उसी समय उसे एक परिचारक ने देख लिया।
“तुम कौन हो?”
अर्जुन ने उसे धक्का देकर बाहर का दरवाजा बंद किया और कियारा के कमरे की ओर भागा।
कमरा खोलते ही उसने कियारा को बिस्तर पर अचेत पाया। उसकी साँस अत्यंत धीमी थी। होंठ नीले पड़ रहे थे।
अर्जुन ने नाड़ी जाँची।
स्थिति गंभीर थी।
उसने तुरंत अपना छोटा परीक्षण उपकरण निकाला। यह उसकी शोध का प्रारंभिक नमूना था। कुछ बूँद रक्त लेकर उसने जैव संकेतों की जाँच की।
उपकरण ने दिखाया कि कियारा के शरीर में दो अलग दवाओं की घातक प्रतिक्रिया हो रही थी।
सामान्य उपचार से उसकी स्थिति और बिगड़ सकती थी।
अर्जुन ने अपनी शोध के आधार पर दवा की अत्यंत नियंत्रित मात्रा तैयार की। उसने कियारा को इंजेक्शन दिया और कृत्रिम श्वास शुरू की।
“कियारा, आँखें खोलो।”
कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।
बाहर पहरेदार दरवाजा तोड़ने लगे।
अर्जुन लगातार उसकी छाती दबाता रहा।