भाग 5
“तुम्हें अभी बहुत कुछ ठीक करना है। तुम इस तरह नहीं जा सकतीं।”
कुछ क्षण बाद कियारा ने हल्की साँस ली।
अर्जुन की आँखों में आशा जगी।
उसने फिर पुकारा—
“कियारा!”
कियारा की पलकें काँपीं।
धुँधली दृष्टि में उसने अर्जुन का चेहरा देखा।
उसे लगा शायद वह सपना देख रही है।
उसके होंठ हिले—
“तुम… क्यों आए?”
अर्जुन ने कहा—
“क्योंकि तुम्हारी साँसों ने अभी हार नहीं मानी।”
तभी दरवाजा टूट गया।
रोहन और उसके आदमी भीतर आ गए।
रोहन अर्जुन को देखकर चौंक गया।
“तुम यहाँ कैसे पहुँचे?”
अर्जुन कियारा के सामने खड़ा हो गया।
“तुम्हारी योजना के अंत तक।”
रोहन ने अपने आदमी को अर्जुन पर हमला करने का आदेश दिया। अर्जुन चिकित्सक था, योद्धा नहीं, लेकिन उस समय उसके सामने एक जीवन था। उसने पूरी शक्ति से प्रतिरोध किया।
संघर्ष के बीच आरोही पुलिस के साथ केंद्र के मुख्य द्वार से भीतर पहुँची। उसने ध्वनि अभिलेख, नकली अधिकार पत्र और सान्या का बयान पुलिस को दे दिया था।
असल में आरोही ने सान्या को खोज लिया था। जब सान्या को पता चला कि रोहन सारा धन स्वयं लेकर उसे भी छोड़ने की योजना बना रहा है, तो उसने पुलिस के सामने सच स्वीकार कर लिया।
पुलिस ने रोहन और उपचार केंद्र के संचालक को गिरफ्तार कर लिया।
महेंद्र को भी संस्था से पकड़ा गया।
कियारा को अस्पताल ले जाया गया।
अगले चौबीस घंटे बहुत कठिन थे।
अर्जुन स्वयं उसके उपचार कक्ष के बाहर बैठा रहा। चिकित्सकों ने उसके शोध आधारित उपाय की सहायता से दवा की प्रतिक्रिया नियंत्रित की।
मुख्य चिकित्सक ने आश्चर्य से पूछा—
“तुमने यह पद्धति कहाँ सीखी?”
अर्जुन ने कहा—
“मैं पिछले कई वर्षों से इसी पर शोध कर रहा हूँ।”
चिकित्सक ने उसके अभिलेख देखे।
“तुम्हें पता है, यह खोज हजारों नशा रोगियों की जान बचा सकती है?”
अर्जुन ने काँच के पार कियारा को देखा।
“अगर सही हाथों में पहुँचे, तो शायद।”
दो दिन बाद कियारा को होश आया।
उसने सबसे पहले आरोही को देखा।
“अर्जुन कहाँ है?”
आरोही ने कहा—
“तुम्हें बचाकर चला गया।”
कियारा की आँखें भर आईं।
“क्या उसने मुझसे कुछ कहा?”
“नहीं।”
कियारा ने मुँह फेर लिया।
उसे शायद अर्जुन की डाँट, क्रोध या शिकायत सहना आसान लगता। मगर उसका मौन उसके लिए सबसे बड़ी सजा बन गया।
राजवर्धन अस्पताल आए। कियारा ने रोते हुए उनका हाथ पकड़ लिया।
“पापा, मैंने आप पर विश्वास नहीं किया।”
राजवर्धन ने कहा—
“तुम्हें सबसे पहले अपने ऊपर विश्वास करना सीखना होगा।”
“मैंने अर्जुन को खो दिया।”
राजवर्धन ने गंभीर स्वर में कहा—
“अर्जुन कोई वस्तु नहीं था, जिसे पाया या खोया जाए। तुमने उसका विश्वास तोड़ा है। अब तुम्हारे पास केवल एक रास्ता है—अपने कर्मों से यह सिद्ध करना कि तुम बदल सकती हो।”
कियारा अस्पताल से निकलने के बाद सीधे अर्जुन के पास नहीं गई।
पहले उसने अपने अपराधों का सामना करने का निर्णय लिया।
उसने पुलिस को पूरा बयान दिया। उसने स्वीकार किया कि सड़क दुर्घटना के समय उसने झूठ बोलकर अर्जुन को फँसाया था। उस अपराध की कानूनी सीमा और परिस्थिति अलग थी, फिर भी उसने सार्वजनिक रूप से सत्य स्वीकार किया।
उसने संस्था की सभा बुलाई।
सभी कर्मचारी उपस्थित थे।
वही कर्मचारी, जिनके सामने उसने अर्जुन को अवसरवादी और चोर कहा था।
कियारा मंच पर खड़ी हुई।
उसकी आवाज काँप रही थी।
“आज मैं अपने परिवार या संस्था की बेटी के रूप में नहीं, उस व्यक्ति के रूप में बोल रही हूँ जिसने अपने अहंकार से कई लोगों को चोट पहुँचाई।”
उसने सबके सामने कहा—
“अर्जुन निर्दोष था। उसने कोई शोध नहीं चुराया। उसे फँसाने वाले रोहन और महेंद्र थे। लेकिन उससे भी बड़ा अपराध मैंने किया, क्योंकि मैंने बिना सत्य जाने उस पर आरोप लगाया।”
दफ्तर में सन्नाटा था।
कियारा की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“मैंने उसे हमेशा उसके पुराने पद से देखा। वह मुझसे कहीं अधिक शिक्षित, ईमानदार और महान था, लेकिन मैंने उसे चाय परोसने वाला नौकर समझा। सच यह है कि छोटी उसकी वर्दी नहीं थी, मेरी सोच थी।”
उसने संस्था के कर्मचारियों से भी क्षमा माँगी।
इसके बाद उसने अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा नशा मुक्ति केंद्रों और गरीब रोगियों के उपचार के लिए दान कर दिया।
उसने अर्जुन की शोध के लिए आधुनिक प्रयोगशाला बनवाने का प्रस्ताव रखा, मगर राजवर्धन ने पूछा—
“क्या तुम यह सब उसे वापस पाने के लिए कर रही हो?”
कियारा ने सिर हिलाया।
“नहीं। अगर वह कभी वापस न आए, तब भी मुझे यह करना चाहिए।”
यही उसके परिवर्तन का पहला सच्चा संकेत था।
अर्जुन की शोध अब पूरे चिकित्सा जगत का ध्यान आकर्षित कर रही थी। उसने रक्त संकेतों और तंत्रिका प्रतिक्रिया के आधार पर एक कम लागत वाली उपचार पद्धति विकसित की थी, जिससे चिकित्सक यह अनुमान लगा सकते थे कि किस रोगी को कौन सी दवा कितनी मात्रा में दी जाए।
एक बड़ी विदेशी औषधि संस्था ने उसे करोड़ों रुपये का प्रस्ताव दिया।
शर्त केवल इतनी थी कि शोध के सभी अधिकार उस संस्था को मिल जाएँगे और दवा अत्यंत ऊँची कीमत पर बेची जाएगी।
अर्जुन ने प्रस्ताव ठुकरा दिया।
उसके सहयोगी ने पूछा—
“इतने पैसे से तुम्हारी पूरी जिंदगी बदल सकती है।”
अर्जुन ने अपनी माँ की तस्वीर देखते हुए कहा—
“मैंने यह शोध अपनी जिंदगी बदलने के लिए नहीं किया। मैं चाहता हूँ कि किसी गरीब की जिंदगी पैसे के कारण खत्म न हो।”
उसने अपना शोध सरकारी चिकित्सालयों और सार्वजनिक संस्थानों को कम लागत पर उपलब्ध करवाने का निर्णय लिया।
समाचार माध्यमों में उसकी चर्चा होने लगी।
शीर्षक छपे—
“पूर्व दफ्तर सहायक की खोज से बदल सकता है नशा उपचार।”
“साधारण कर्मचारी बना असाधारण शोधकर्ता।”
लेकिन अर्जुन इन समाचारों से दूर रहा।
उसने दिल्ली लौटने से भी इनकार कर दिया।
कियारा को पता चला कि अर्जुन पहाड़ी क्षेत्र में एक छोटा नशा पुनर्वास केंद्र खोलने वाला है।
वह वहाँ पहुँची, मगर इस बार महँगी गाड़ी, सेवक और दिखावे के बिना।
उसने साधारण वस्त्र पहने थे।
अर्जुन केंद्र के बाहर मजदूरों के साथ सामान उतार रहा था।
कियारा उसके सामने आकर खड़ी हो गई।
अर्जुन ने उसे देखा, फिर सामान उठाने लगा।
कियारा ने कहा—
“मैं क्षमा माँगने आई हूँ।”
अर्जुन ने उत्तर दिया—
“तुम पहले भी क्षमा माँग सकती थीं।”
“तब मैं केवल तुम्हें वापस पाना चाहती। आज मैं अपनी गलती स्वीकार करने आई हूँ।”
अर्जुन चुप रहा।
कियारा ने विवाह की अंगूठी उसकी ओर बढ़ाई।
“यह तुम छोड़ गए थे।”
अर्जुन ने अंगूठी नहीं ली।
“किसी अंगूठी से विश्वास वापस नहीं आता।”
कियारा ने आँखें झुका लीं।
“मुझे पता है।”
“फिर क्या चाहती हो?”
“कुछ नहीं।”
अर्जुन ने पहली बार आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
कियारा ने कहा—
“तुम मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार मत करो। मुझसे बात भी मत करो। लेकिन मुझे इस केंद्र में काम करने दो। मैं उन लोगों की सेवा करना चाहती हूँ, जिनके दर्द का मैं कभी मजाक उड़ाती थी।”
अर्जुन ने कहा—
“यहाँ तुम्हें मालिक की बेटी समझकर कोई सुविधा नहीं मिलेगी।”
“मुझे सुविधा नहीं चाहिए।”
“यहाँ रोगी तुम्हारा अपमान कर सकते हैं।”
“मैंने भी कई लोगों का अपमान किया है।”
“यहाँ काम कठिन है।”
कियारा ने शांत स्वर में कहा—
“अपने किए का सामना करना उससे अधिक कठिन है।”
अर्जुन ने उसे रोका नहीं।
अगले दिन से कियारा केंद्र में काम करने लगी।
वह रोगियों के कमरे साफ करती, दवा बाँटने में सहायता करती और नए रोगियों के परिवारों से बात करती।
पहले कुछ लोग उसे पहचान गए।
एक रोगी की माँ ने कहा—
“आप वही अमीर लड़की हैं ना, जो नशे के कारण समाचारों में आई थीं?”
कियारा का चेहरा उतर गया।
वह चाहती तो वहाँ से चली जाती, मगर उसने कहा—
“हाँ। और शायद इसी कारण मैं आपके बेटे का दर्द थोड़ा समझ सकती हूँ।”
धीरे-धीरे उसने रोगियों का विश्वास जीतना शुरू किया।
एक दिन एक युवक उपचार के दौरान हिंसक हो गया। उसने कियारा को धक्का दिया और कहा—
“तुम क्या जानो नशे की तड़प?”
कियारा जमीन पर गिर गई।
अर्जुन दौड़कर आया, लेकिन कियारा स्वयं उठ खड़ी हुई।
उसने युवक से कहा—
“मैं जानती हूँ। मैं यह भी जानती हूँ कि नशा छोड़ते समय हम सबसे अधिक उसी व्यक्ति को चोट पहुँचाते हैं, जो हमें बचाना चाहता है।”
अर्जुन कुछ दूरी पर खड़ा उसे देखता रहा।
उसे पहली बार लगा कि कियारा केवल शब्दों में नहीं, भीतर से बदल रही है।
महीने बीत गए।
कियारा ने कभी अर्जुन पर संबंध लौटाने का दबाव नहीं डाला। वह उसे केवल “डाक्टर साहब” कहती और काम के अतिरिक्त बात नहीं करती।
एक शाम तेज वर्षा हो रही थी।
केंद्र की छत के एक हिस्से से पानी टपकने लगा। सभी कर्मचारी बाल्टियाँ रख रहे थे।
अर्जुन ने देखा कि कियारा भीगते हुए रोगियों की फाइलें सुरक्षित स्थान पर रख रही है।
“तुम अंदर जाओ,” अर्जुन ने कहा।
“पहले ये फाइलें।”
“तुम बीमार पड़ जाओगी।”
कियारा हल्का मुस्कराई।
“कभी किसी ने मुझसे कहा था कि किसी रोगी की जान उसके अपराध से छोटी नहीं होती। इन फाइलों में उनकी जान से जुड़ी जानकारी है।”
अर्जुन उसकी ओर देखता रह गया।
अगले दिन कियारा को तेज बुखार हो गया।
अर्जुन ने उसका उपचार किया। वह पूरी रात उसके कमरे के बाहर बैठा रहा, ठीक वैसे ही जैसे विवाह के शुरुआती दिनों में बैठा था।
सुबह कियारा ने आँखें खोलीं।
“तुम फिर पूरी रात जागते रहे?”
अर्जुन ने कहा—
“मैं केंद्र का चिकित्सक हूँ।”
कियारा ने हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया—
“हाँ, केवल चिकित्सक।”
उसकी आवाज में शिकायत नहीं थी।
यही बात अर्जुन के मन को छू गई।
कुछ दिनों बाद अर्जुन की शोध पद्धति को राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद ने मान्यता दे दी। केंद्र के उद्घाटन के लिए बड़ा समारोह आयोजित किया गया।
राजवर्धन, आरोही, चिकित्सक, वैज्ञानिक और अनेक रोगी वहाँ उपस्थित थे।
अर्जुन को मंच पर बुलाया गया।
उसने अपनी उपलब्धि का श्रेय अपनी माँ, अपने शिक्षकों और उन रोगियों को दिया, जिनसे उसने सीखा था।
फिर संचालक ने कियारा को कुछ शब्द कहने के लिए बुलाया।
कियारा मंच पर पहुँची।
उसने अर्जुन की ओर देखा।
“लोग आज इन्हें महान वैज्ञानिक कहते हैं। लेकिन मैंने इन्हें पहली बार एक साधारण वर्दी में देखा था। तब मुझे लगा था कि इंसान की कीमत उसके पद से तय होती है।”
सभा शांत थी।
कियारा ने आगे कहा—
“मैं गलत थी। मैंने उस व्यक्ति को छोटा समझा, जो हर कठिन समय में मुझसे बड़ा सिद्ध हुआ। जब मैंने उसे अपराधी कहा, तब भी उसने मेरे लिए नफरत नहीं चुनी। जब मैंने उसका विश्वास तोड़ा, तब भी उसने मेरी जान बचाई।”
उसकी आँखें भर आईं।
“आज मैं उनसे किसी संबंध की माँग नहीं करती। मैं केवल इतना कहना चाहती हूँ कि जिस व्यक्ति को दुनिया कभी दफ्तर का मामूली सहायक समझती थी, उसने मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया।”
सभा तालियों से गूँज उठी।
अर्जुन की आँखों में भी नमी थी।
समारोह के बाद कियारा चुपचाप केंद्र के पीछे बने बगीचे में चली गई।
कुछ देर बाद अर्जुन वहाँ आया।
कियारा ने कहा—
“मैंने मंच पर कुछ गलत तो नहीं कहा?”
“नहीं।”
“मैं कल दिल्ली वापस जा रही हूँ। केंद्र अब अच्छे हाथों में है।”
अर्जुन चौंका।
“क्यों?”
“क्योंकि मैं यहाँ सेवा करने आई थी, तुम्हारी जिंदगी पर अधिकार करने नहीं। शायद मेरी उपस्थिति तुम्हें अतीत से मुक्त नहीं होने देती।”
वह जाने लगी।
अर्जुन ने पुकारा—
“कियारा।”
वह रुक गई।
अर्जुन उसके पास आया और जेब से वही विवाह की अंगूठी निकाली।
कियारा आश्चर्य से उसे देखने लगी।
“यह तुम्हारे पास कैसे?”
“जिस दिन तुमने मुझे लौटाई थी, मैंने बाद में उठा ली थी।”
कियारा की आँखों में आँसू आ गए।
अर्जुन ने कहा—
“मैंने तुम्हें बहुत पहले क्षमा कर दिया था। लेकिन क्षमा और विश्वास अलग बातें हैं।”
“मैं जानती हूँ।”
“पिछले महीनों में तुमने विश्वास माँगा नहीं, कमाया है।”
कियारा रो पड़ी।
“क्या इसका मतलब है कि तुम मुझे फिर अपनी पत्नी मानते हो?”
अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“इसका मतलब है कि मैं तुम्हें एक नया अवसर देना चाहता हूँ। लेकिन इस बार हमारा संबंध मजबूरी से नहीं, बराबरी और सत्य से शुरू होगा।”
कियारा ने हाथ आगे नहीं बढ़ाया।
उसने कहा—
“अंगूठी पहनाने से पहले एक बात सुन लो। मैं शायद फिर गलती करूँगी। कभी डरूँगी, कभी कमजोर पड़ूँगी।”
अर्जुन ने उत्तर दिया—
“मैं भी पूर्ण नहीं हूँ। मैंने तुम्हारी अनुमति के बिना तुम्हारे लक्षण शोध में दर्ज किए थे। मेरी नीयत सही थी, तरीका नहीं।”
कियारा ने पहली बार हल्केपन से कहा—
“तो हम दोनों को सुधार की जरूरत है।”