Poor Man Found to be Rich

एक झूठी शादी… एक झाड़ूवाला… और अरबपति होने का सबसे बड़ा राज

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

एक बड़ी कंपनी में काम करने वाली अन्वी को उसके पुराने प्रेमी रोहन ने सबके सामने अपमानित कर दिया। अपनी इज्जत बचाने के लिए अन्वी ने अचानक कंपनी के एक युवा झाड़ूवाले को अपना पति बता दिया। वह झाड़ूवाला चुपचाप उसके साथ खड़ा हो गया, लेकिन अन्वी के दिल में अपराधबोध भर गया कि उसकी वजह से उस गरीब आदमी की नौकरी जा सकती है। वह उसे अच्छा खाना खिलाने लगी, उसके लिए कपड़े खरीदने लगी और धीरे-धीरे उसकी सादगी में एक अजीब अपनापन महसूस करने लगी। लेकिन अन्वी को नहीं पता था कि यह शांत झाड़ूवाला हर दिन कंपनी की दीवारों के पीछे छिपे एक बड़े राज को देख रहा है। जब रोहन ने उसी झाड़ूवाले को चोरी के आरोप में फंसाया, तो पूरे ऑफिस के सामने कुछ ऐसा हुआ जिसने अन्वी, रोहन और पूरी कंपनी की दुनिया हिला दी। आखिर वह झाड़ूवाला कौन था? और उसने अपनी पहचान क्यों छिपाई थी?

“जिसे सब मामूली झाड़ूवाला समझ रहे थे, उसका सच जानकर पूरा ऑफिस सन्न रह गया…”

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आप भाग 2 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 47 मिनट

भाग 2

उस शाम अन्वी ने राजू को बुलाया। वह कार्यालय की छत पर मिला। हवा तेज चल रही थी। नीचे शहर की रोशनियां जल रही थीं।

“मुझे सब ठीक करना है,” अन्वी ने कहा। “मैं सबको सच बता दूंगी। कह दूंगी कि मैंने झूठ बोला था। आप पर कोई दाग नहीं आएगा।”

राजू ने पूछा, “और आप?”

अन्वी ने फीकी मुस्कान दी, “मुझ पर तो लोग वैसे भी बातें कर रहे हैं।”

“तो आप मुझे बचाने के लिए खुद को सबके सामने झूठा बना देंगी?”

“क्योंकि गलती मेरी है,” अन्वी ने कहा। “आपने सिर्फ मेरा साथ दिया था।”

राजू ने कुछ देर चुप रहकर कहा, “अगर मैं कहूं कि मुझे कोई दिक्कत नहीं?”

अन्वी ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

“मतलब?”

“मतलब,” राजू ने धीरे से कहा, “अगर इस झूठ को सच बनाकर आपकी मां की चिंता कम हो सकती है, आपकी इज्जत बच सकती है, तो मुझे दिक्कत नहीं।”

अन्वी जैसे पत्थर हो गई। “आप जानते भी हैं आप क्या कह रहे हैं?”

“हां।”

“शादी कोई खेल नहीं है।”

“इज्जत भी खेल नहीं होती,” राजू ने उत्तर दिया।

अन्वी की आंखों से आंसू गिर पड़े। “आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? आप मुझे जानते भी नहीं।”

राजू ने पहली बार बिना मुस्कुराए कहा, “कभी-कभी किसी को जानने के लिए उसकी पूरी कहानी नहीं, उसका एक सही डर देखना काफी होता है।”

कुछ दिनों बाद, एक छोटे से मंदिर में, बिना शोर, बिना बैंड, बिना भीड़, अन्वी और राजू की शादी हो गई। अन्वी ने हल्की साड़ी पहनी थी। राजू ने साधारण कुर्ता। मां ने कांपते हाथों से बेटी के सिर पर हाथ रखा। उनकी आंखों में चिंता अब भी थी, पर एक राहत भी थी कि बेटी अकेली नहीं है।

मंगलसूत्र पहनाते समय राजू के हाथ एक क्षण को ठिठके। वह जानता था कि वह आर्यन सिंघानिया है, करोड़ों की कंपनी का मालिक। पर इस क्षण में वह सचमुच राजू था—एक आदमी जिसे एक लड़की ने मजबूरी में नहीं, अपनी गलती की जिम्मेदारी लेकर जीवन में जगह दी थी।

अन्वी ने आंखें बंद कर लीं। उसके मन में प्यार नहीं था, पर घृणा भी नहीं थी। बस अपराधबोध, सम्मान और एक अनकहा डर था।

शादी के बाद जब दोनों घर लौटे, अन्वी ने कमरे के एक किनारे पर अलग बिस्तर लगा दिया। उसने धीमे स्वर में कहा, “मैं जानती हूं यह सब अचानक हुआ है। मैं आपको किसी अधिकार के नाम पर असहज नहीं करूंगी। आप इस घर में सम्मान से रहेंगे। जब तक आप चाहें।”

राजू ने उसकी तरफ देखा। कितनी अजीब बात थी। दुनिया उसे अरबपति होने के कारण सम्मान देती थी। यह लड़की उसे झाड़ूवाला समझकर भी सम्मान दे रही थी।

उसने बस इतना कहा, “आप चिंता मत कीजिए।”

अन्वी ने नजरें झुका लीं, “चिंता तो करनी ही पड़ेगी। आपकी जिंदगी मैंने बदल दी है।”

राजू ने मन ही मन सोचा—नहीं अन्वी, शायद तुमने मेरी जिंदगी पहली बार सच में शुरू की है।

उस रात दोनों अलग-अलग बिस्तरों पर लेटे रहे। कमरे में खामोशी थी। बाहर कहीं दूर कुत्ते भौंक रहे थे। अन्वी की आंखों से नींद कोसों दूर थी। उसे लगता रहा कि उसने एक गरीब आदमी का जीवन अपनी इज्जत बचाने के लिए उलझा दिया है।

दूसरी तरफ आर्यन भी जाग रहा था। उसे कंपनी की फाइलें, चोरी, रोहन और जांच सब याद था, लेकिन सबसे ज्यादा याद था अन्वी का वह वाक्य—“आप इस घर में सम्मान से रहेंगे।”

उसने पहली बार सोचा, क्या कोई इंसान सच में इतना अच्छा हो सकता है कि जिसे वह गरीब समझता हो, उसके लिए भी अच्छे कपड़े, अच्छा खाना, अच्छी नींद और अच्छी इज्जत सोच सके?

और इसी सवाल के साथ उनकी अनोखी शादी की शुरुआत हुई—एक ऐसी शादी, जिसमें प्यार नहीं था, पर मनुष्यता थी। झूठ था, पर अपमान नहीं था। मजबूरी थी, पर उसमें धीरे-धीरे पनपने वाली सच्चाई की मिट्टी भी थी।

शादी के बाद अन्वी की जिंदगी बाहर से शांत दिखने लगी, पर उसके भीतर अपराधबोध का एक छोटा सा पत्थर हर समय पड़ा रहता था। सुबह वह चाय बनाती, तो दो कप बनाती। खाना परोसती, तो राजू की थाली में पहले रखती। मां की दवा देती, तो उसके बाद पूछती, “आपने नाश्ता किया?” और जब राजू कार्यालय जाने के लिए झाड़ू और पुराना थैला उठाता, तो उसका मन कस जाता।

उसे लगता, यह आदमी उसकी वजह से हर दिन और ज्यादा अपमान सहने जा रहा है।

राजू यानी आर्यन, इस घर में बहुत सादगी से रहता था। वह कम बोलता, ज्यादा सुनता। अन्वी की मां से आदर से बात करता, घर के छोटे-मोटे कामों में मदद कर देता और कभी किसी चीज की मांग नहीं करता। अन्वी कई बार उसे देखती और सोचती—जिस आदमी को उसने अचानक अपने जीवन में खींच लिया, वह एक बार भी शिकायत क्यों नहीं करता?

एक सुबह अन्वी ने देखा कि राजू अपनी कमीज पर बटन लगाने की कोशिश कर रहा है। कमीज पुरानी थी और एक जगह से धागा उधड़ गया था। अन्वी चुपचाप उसके पास आई।

“रुकिए, मैं सिल देती हूं,” उसने कहा।

“नहीं, रहने दीजिए,” राजू ने कहा। “ऐसे ही ठीक है।”

“ठीक नहीं है,” अन्वी ने सुई-धागा निकालते हुए कहा। “कार्यालय में लोग वैसे ही आपका मजाक उड़ाते हैं। कम से कम कपड़े तो ठीक होने चाहिए।”

राजू ने हल्के से पूछा, “आपको बुरा लगता है जब लोग मेरा मजाक उड़ाते हैं?”

अन्वी ने सिलाई करते हुए कहा, “किसी का भी मजाक उड़ाना गलत है। और आपका तो बिल्कुल नहीं। आपने मेरे लिए इतना सहा है।”

राजू ने उसकी झुकी हुई आंखों को देखा। उसे पहली बार लगा कि अन्वी सिर्फ गलती सुधारना नहीं चाहती, वह सचमुच उसके दुख को कम करना चाहती है।

उस दिन कार्यालय में रोहन ने फिर उसे देखा। राजू गलियारे में सफाई कर रहा था। रोहन उसके पास आया और जानबूझकर एक कागज फर्श पर गिरा दिया।

“उठा,” उसने कहा।

राजू ने शांत भाव से कागज उठाया।

रोहन झुका और धीमे से बोला, “बहुत मजा आ रहा है न पति बनने में? याद रखना, नौकरी मेरी मुट्ठी में है। एक दिन बाहर फेंक दूंगा।”

राजू ने पहली बार उसकी आंखों में सीधा देखा। “जो आपकी मुट्ठी में है, वह नौकरी होगी। इंसान की इज्जत नहीं।”

रोहन का चेहरा तमतमा गया। “ज्यादा बोलने लगा है।”

तभी अन्वी वहां आ गई। उसने रोहन की बात सुन ली थी। वह राजू के सामने खड़ी हो गई और बोली, “इनसे ऐसे बात मत कीजिए।”

रोहन हंसा, “अब तुम अपने झाड़ूवाले पति की रखवाली करोगी?”

अन्वी ने बिना आवाज ऊंची किए कहा, “हां, अगर जरूरत पड़ी तो करूंगी। क्योंकि इन्होंने कभी किसी को धोखा नहीं दिया।”

यह वाक्य रोहन को चुभ गया। वह चला गया, पर जाते-जाते कह गया, “बहुत जल्द तुम्हें पता चलेगा कि किसकी औकात क्या है।”

अन्वी ने राजू की तरफ मुड़कर कहा, “आप ठीक हैं?”

राजू ने हल्के से मुस्कुराकर कहा, “आप हर बार मेरी ढाल बनेंगी तो मुझे झाड़ू की जगह तलवार पकड़नी पड़ेगी।”

अन्वी पहली बार खुलकर हंस दी। “आप मजाक भी करते हैं?”

“थोड़ा-थोड़ा सीख रहा हूं,” राजू बोला।

शाम को अन्वी ने तय किया कि वह राजू को शहर घुमाने ले जाएगी। उसे लगता था कि उसके कारण राजू की जिंदगी में बोझ आ गया है, इसलिए वह कुछ छोटे-छोटे सुख उसे देना चाहती थी। उसने कहा, “आज जल्दी तैयार हो जाइए। हम बाहर चलेंगे।”

“कहां?” राजू ने पूछा।

“पहले अच्छी चाय, फिर सड़क किनारे गरम मोमोज, फिर थोड़ी सैर।”

राजू ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “यह तो बहुत बड़ा कार्यक्रम है।”

अन्वी ने चुटकी ली, “हाँ, राजू जी, बड़े लोगों की तरह घूमने नहीं जा रहे, अपने बजट की खुशी ढूंढने जा रहे हैं।”

आर्यन ने मन ही मन सोचा कि उसने दुनिया के सबसे महंगे होटलों में भोजन किया था, पर ऐसे उत्साह से किसी ने उसे कभी चाय पिलाने नहीं बुलाया था।

वे दोनों बस से गए। अन्वी ने टिकट लिया। राजू ने बस की खिड़की से शहर देखा। सामान्य लोगों की भीड़, बच्चों की आवाजें, सब्जी वालों की पुकार, हवा में धूल और चाय की खुशबू—ये सब उसकी दुनिया से बहुत दूर हो चुके थे। वह अरबों का मालिक था, पर इस भीड़ में बैठकर उसे पहली बार लगा कि वह सचमुच जी रहा है।

अन्वी ने पूछा, “आप इतना बाहर क्यों देख रहे हैं?”

“शहर अलग लगता है,” उसने कहा।

“क्यों? आपने पहले कभी बस में सफर नहीं किया?”

राजू ने तुरंत खांसकर कहा, “किया है… बस बहुत साल पहले।”

“आपकी अंग्रेजी कैसी है?” अन्वी ने अचानक पूछा।

आर्यन चौंका। “क्यों?”

“मुझे लगा, कभी आपको दूसरी नौकरी ढूंढनी पड़े तो मैं आपको थोड़ा पढ़ा दूं। कम से कम आप किसी दुकान या दफ्तर में काम कर सकेंगे।”

आर्यन के भीतर कुछ पिघला। किसी ने उसे नौकरी दिलाने की चिंता कभी नहीं की थी।

“ठीक है,” उसने कहा। “आप सिखा दीजिए।”

अगली रात से अन्वी ने सच में उसे अंग्रेजी सिखाना शुरू किया। वह पुरानी कॉपी लेकर बैठती और कहती, “बोलिए—मेरा नाम राजू है।”

राजू ने एक पल में इतने अच्छे उच्चारण में कहा, “मेरा नाम राजू है,” कि अन्वी ने आंखें सिकोड़ लीं।

“आपने पहले पढ़ाई की है?”

राजू ने तुरंत अपने स्वर को साधारण बनाते हुए कहा, “थोड़ा… मतलब बहुत थोड़ा। गांव में मास्टर जी अच्छे थे।”

अन्वी को हंसी आ गई। “आप हर बात में इतने सीधे क्यों लगते हैं और फिर अचानक होशियार क्यों हो जाते हैं?”

“शायद झाड़ू लगाते-लगाते दिमाग भी साफ हो गया है,” राजू ने कहा।

दोनों हंस पड़े।

इन्हीं हल्के पलों के बीच कंपनी की जांच आगे बढ़ रही थी। आर्यन रात में सबूत देखता। उसके पास एक छोटा छिपा हुआ फोन था, जिसे वह बहुत संभालकर रखता। उस फोन पर उसकी विश्वस्त विधिक सलाहकार नीलिमा और सुरक्षा विभाग का एक पुराना अधिकारी उससे संपर्क करते थे। वे जानते थे कि मालिक स्वयं वेश बदलकर कंपनी में काम कर रहा है।

एक रात अन्वी पानी लेने उठी तो उसने देखा कि राजू आंगन में धीमे स्वर में किसी से बात कर रहा है।

“तीन फर्जी विक्रेता हैं,” वह कह रहा था। “भुगतान रोकना मत। अभी उन्हें लगता रहे कि सब चल रहा है।”

अन्वी ने केवल इतना सुना और चौंक गई। राजू ने उसकी आहट सुनी और तुरंत फोन छिपा लिया।

“किससे बात कर रहे थे?” अन्वी ने पूछा।

राजू पल भर को रुका, फिर बोला, “एक दोस्त है। उसे नौकरी चाहिए थी।”

“आपने कहा भुगतान रोकना मत?”

“वह… मजदूरी का भुगतान,” राजू ने कहा। “वह ठेके पर काम करता है।”

अन्वी को थोड़ा संदेह हुआ, लेकिन उसने बात आगे नहीं बढ़ाई। वह राजू पर शक नहीं करना चाहती थी। वह सोचती थी कि शायद उसने सच में गलत सुना होगा।

कुछ दिनों बाद अन्वी ने तय किया कि वह राजू के लिए अच्छे कपड़े खरीदेगी। उसकी कमीज बार-बार सिलते हुए उसका मन भर गया था। उसने अपनी थोड़ी बचत निकाली और कहा, “आज हम मॉल चलेंगे।”

राजू ने आंखें बड़ी कर लीं, “मॉल?”

“हाँ,” अन्वी बोली। “डरिए मत। मैं कोई महंगी चीज नहीं खरीदूंगी। बस एक अच्छी कमीज और जूते।”

“मेरे पास जूते हैं।”

“वे जूते कम और दुख की जीवनी ज्यादा लगते हैं,” अन्वी ने कहा।

राजू हंस पड़ा।

वे शहर के सबसे बड़े मॉल पहुंचे। चमकती हुई रोशनियां, शीशे की दुकानें, सुगंधित हवा और महंगे कपड़ों की कतारें देखकर राजू ने ऐसा चेहरा बनाया जैसे वह पहली बार ऐसी जगह आया हो। अन्वी ने उसका हाथ हल्के से पकड़ा, ताकि वह भीड़ में असहज न हो।

“घबराइए मत,” उसने कहा। “किसी को फर्क नहीं पड़ता।”

आर्यन ने सोचा—मुझे फर्क नहीं पड़ता, अन्वी। पर तुम्हें फर्क पड़ता है कि मुझे कोई छोटा महसूस न कराए।

वे एक कपड़ों की दुकान में गए। अन्वी ने नीली कमीज उठाई। उसने राजू के कंधे से लगाकर देखा। “यह आप पर अच्छी लगेगी।”

राजू ने कीमत देखी। कीमत अन्वी के बजट से बहुत ज्यादा थी। अन्वी का चेहरा उतर गया। उसने धीरे से कमीज वापस रख दी।

“बहुत महंगी है,” उसने कहा। “बाहर से ऐसी ही मिल जाएगी।”

राजू ने कमीज को देखा। वह कीमत के कारण नहीं, अन्वी की इच्छा के कारण उसे लेना चाहता था। “कभी-कभी अपने लिए अच्छा लेना गलत नहीं होता,” उसने कहा।

अन्वी मुस्कुराई, “यह बात अमीर लोग कहते होंगे। हमें हिसाब से चलना पड़ता है।”

उसी समय दुकान के बाहर से मॉल प्रबंधक गुजरा। उसने राजू को देखा और जैसे उसके पैरों के नीचे से जमीन निकल गई। वह आर्यन सिंघानिया को पहचानता था। यह मॉल भी सिंघानिया समूह की संपत्तियों में से एक था। उसने तुरंत अपने कर्मचारियों को इशारा किया।

कुछ ही पलों में दुकान की लड़की अन्वी के पास आई और बोली, “मैडम, आज विशेष ग्राहक छूट चल रही है। यह कमीज सत्तर प्रतिशत छूट पर है।”

अन्वी की आंखें चमक उठीं। “सच में?”

“जी मैडम,” लड़की बोली, पर उसकी नजर बार-बार राजू की तरफ जा रही थी।