भाग 4
रोहन कांपती आवाज में बोला, “यह सब गलत है। यह साजिश है।”
आर्यन ने उसकी तरफ देखा। “साजिश हां, थी। लेकिन मेरी नहीं। तुम्हारी। फर्क बस इतना है कि तुमने सोचा था झाड़ूवाला कुछ नहीं देखता। जबकि सच यह है कि झाड़ूवाला सबसे ज्यादा देखता है। क्योंकि लोग उसके सामने अपनी असली औकात दिखा देते हैं।”
सभागार में कई कर्मचारियों की आंखें भर आईं। छोटे कर्मचारी, जिन्हें रोहन ने कभी इंसान नहीं समझा था, पहली बार सीधा खड़े हुए।
आर्यन ने आगे कहा, “रोहन मल्होत्रा को तत्काल प्रभाव से पद से हटाया जाता है। उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही शुरू होगी। जिन निदेशकों ने उनका साथ दिया, उन्हें भी बोर्ड से हटाया जाएगा। जिन कर्मचारियों का भुगतान रोका गया था, उन्हें पूरा भुगतान और अतिरिक्त सहायता दी जाएगी।”
रोहन घुटनों के बल नहीं गिरा, पर उसका अहंकार उसी क्षण गिर गया। वह कुछ बोलना चाहता था, पर उसके पास कोई शब्द नहीं थे।
फिर आर्यन की नजर अन्वी पर गई।
वह अब भी स्तब्ध खड़ी थी। उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी। राहत भी नहीं। उसकी आंखों में चोट थी।
बैठक खत्म हुई। लोग आर्यन को घेरने लगे। कुछ माफी मांग रहे थे, कुछ सम्मान से झुक रहे थे, कुछ अवसर देख रहे थे। पर आर्यन की नजर केवल अन्वी को ढूंढ रही थी। वह चुपचाप सभागार से बाहर निकल गई।
आर्यन उसके पीछे गया। सीढ़ियों के पास उसने उसे पुकारा, “अन्वी।”
अन्वी रुकी, पर मुड़ी नहीं।
“मुझे तुमसे बात करनी है,” आर्यन ने कहा।
अन्वी धीरे से मुड़ी। उसकी आंखें भीगी थीं, पर आवाज मजबूत थी। “किससे बात करनी है आपको? अन्वी से, जिसने राजू पर भरोसा किया था? या उस लड़की से, जिसे आर्यन सिंघानिया ने अपनी जांच का हिस्सा बना दिया?”
आर्यन के पास तुरंत उत्तर नहीं था।
“मैंने तुम्हें कभी छोटा नहीं समझा,” अन्वी बोली। “तुम्हें झाड़ूवाला समझकर भी तुम्हारी इज्जत की। तुम्हारी नौकरी के लिए डरती रही। तुम्हें खाना खिलाया, कपड़े दिलाए, तुम्हारे लिए लोगों से लड़ी। और तुम सब जानते हुए भी चुप रहे।”
आर्यन ने धीमे से कहा, “मैं मजबूर था। मेरी पहचान खुलती तो जांच खराब हो जाती।”
“कंपनी से पहचान छिपानी जरूरी थी,” अन्वी ने कहा। “मुझसे क्यों?”
यह प्रश्न आर्यन के सीने में चुभ गया।
“क्योंकि मुझे डर था,” उसने कहा।
अन्वी ने कड़वाहट से पूछा, “आपको? डर?”
“हां,” आर्यन बोला। “डर था कि अगर तुमने आर्यन सिंघानिया को देख लिया, तो राजू को भूल जाओगी। मैं जानना चाहता था कि तुम्हारी आंखों में मेरे लिए जो सम्मान है, वह आदमी के लिए है या नाम के लिए।”
अन्वी की आंखों से आंसू गिर पड़े। “तो आपने मेरी परीक्षा ली?”
“नहीं,” आर्यन ने तुरंत कहा। “मैंने खुद को बचाया। शायद गलत किया।”
“गलत?” अन्वी ने दर्द से कहा। “मैंने तुम्हें अपने झूठ में खींचा था, इसलिए हर दिन अपराधबोध में जीती रही। और तुम जानते थे कि तुम्हारी नौकरी नहीं जाएगी, तुम्हारा घर नहीं उजड़ेगा, तुम्हारी जिंदगी मेरी वजह से बर्बाद नहीं होगी। फिर भी तुमने मुझे उस अपराधबोध में जीने दिया।”
आर्यन चुप हो गया। यह सच था। वह कंपनी बचाने में इतना लगा रहा कि उसने यह नहीं सोचा कि अन्वी हर दिन खुद को दोष दे रही है।
अन्वी ने धीरे से कहा, “मैंने राजू को पति मानना शुरू किया था, क्योंकि वह सच्चा लगा। लेकिन आज समझ नहीं आ रहा कि राजू सच था या आर्यन का अभिनय।”
आर्यन ने दुख से कहा, “राजू मेरा अभिनय था, पर तुम्हारे लिए जो महसूस किया, वह अभिनय नहीं था।”
अन्वी ने आंखें पोंछीं। “शायद। लेकिन अभी मैं यह मान नहीं पा रही।”
वह चली गई।
आर्यन ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। पहली बार उसे समझ आया कि सच्चाई छिपाना कभी-कभी झूठ बोलने से भी ज्यादा दर्द देता है।
अगले कुछ दिन अन्वी अपने घर में रही। मां ने पूछा भी, पर उसने पूरी बात नहीं बताई। मां अब जान चुकी थीं कि राजू कोई साधारण आदमी नहीं है, लेकिन बेटी की आंखों का दर्द देखकर चुप रहीं।
दूसरी तरफ आर्यन ने कंपनी की सफाई शुरू कर दी। रोहन और उसके साथियों पर मामला दर्ज हुआ। छोटे कर्मचारियों को भुगतान मिला। सफाई कर्मियों के लिए नई व्यवस्था बनी। मजदूरों की शिकायत सुनने के लिए अलग विभाग बनाया गया। पर इन सब सुधारों के बीच आर्यन के कमरे में एक खालीपन था।
उसकी मेज पर वही नीली कमीज रखी थी। वह कमीज जिसे अन्वी ने छूट समझकर खरीदा था। वह उसे पहन नहीं पा रहा था। वह उसे देखता और उसे अन्वी की आवाज सुनाई देती—“यह आप पर अच्छी लगेगी।”
एक दिन नीलिमा ने उसे बताया, “अन्वी जी को मॉल वाली बात का सच पता चल गया है।”
आर्यन ने चौंककर पूछा, “कौन सा सच?”
“कि प्रबंधक ने आपको पहचानकर छूट दिलवाई थी। लेकिन आपने बाद में पूरा भुगतान करवाया, ताकि दुकान के कर्मचारियों का नुकसान न हो। और आपने यह भी कहा था कि अन्वी जी को कभी पता न चले, क्योंकि उनकी खुशी सच्ची थी।”
आर्यन ने गहरी सांस ली। “उन्हें यह कैसे पता चला?”
“मॉल प्रबंधक खुद उनसे माफी मांगने गए थे। शायद अपराधबोध में।”
आर्यन ने सिर झुका लिया।
उसी शाम अन्वी उस मॉल में गई। वही दुकान। वही रोशनियां। वही नीली कमीज जैसी कई कमीजें सामने टंगी थीं। प्रबंधक उसे देखते ही घबरा गया।
“मैडम, मुझे माफ कर दीजिए,” उसने कहा। “उस दिन मैंने मालिक को पहचान लिया था। छूट असली नहीं थी। पर मालिक ने बाद में पूरा पैसा जमा करवा दिया था। उन्होंने कहा था कि आपकी खुशी पर मेरा डर भारी नहीं पड़ना चाहिए।”
अन्वी चुप रही।
“उन्होंने यह भी कहा था,” प्रबंधक बोला, “कि आपने उन्हें जो कमीज दी है, वह उनके लिए किसी भी महंगी चीज से ज्यादा कीमती है।”
अन्वी की आंखें भर आईं।
मॉल से बाहर निकलते समय उसे उस दिन का हर पल याद आया—राजू का अनजान बनने का अभिनय, प्रबंधक का पसीना, उसकी अपनी खुशी, और राजू का वह वाक्य—यह कमीज आपके कारण अच्छी है।
उसी रात मां ने अन्वी को अपने पास बैठाया। “बेटी,” उन्होंने कहा, “सच छिपाना गलत था। पर हर झूठ का मतलब बुरा दिल नहीं होता। तूने उसे गरीब समझकर सम्मान दिया। उसने तुझे कमजोर समझकर नहीं छोड़ा। अब फैसला तेरे हाथ में है कि तू उसके झूठ को देखेगी या उसके मन को।”
अन्वी ने सिर मां की गोद में रख दिया। “मां, मैं उससे नाराज हूं। बहुत नाराज।”
मां ने उसके बाल सहलाए। “नाराजगी प्यार के रास्ते में दीवार है, अंत नहीं।”
अगले दिन सिंघानिया समूह में नई घोषणा हुई। अन्वी को खातों विभाग में विशेष जांच दल में स्थान दिया गया था। वह कंपनी आई, पर सीधे आर्यन से नहीं मिली। वह अपना काम करती रही। आर्यन दूर से उसे देखता, लेकिन पास नहीं जाता। उसने तय कर लिया था कि वह अन्वी पर कोई दबाव नहीं डालेगा।
कई दिन ऐसे ही गुजर गए।
फिर एक शाम कार्यालय में बारिश शुरू हो गई। अधिकांश कर्मचारी जा चुके थे। अन्वी नीचे आने लगी तो उसने देखा कि बाहर वही पुराना झाड़ू रखा है, जिससे राजू काम करता था। उसके पास नीली कमीज पहने आर्यन खड़ा था। महंगी घड़ी नहीं, कोई सुरक्षा घेरा नहीं, बस वही शांत चेहरा।
अन्वी रुकी।
आर्यन ने धीरे से कहा, “आज मैंने यह कमीज पहन ली। खास दिन का इंतजार था।”
अन्वी ने पूछा, “और आज खास दिन है?”
“हो सकता है,” आर्यन बोला, “अगर तुम मुझे दोबारा सुनने को तैयार हो।”
अन्वी कुछ पल चुप रही। बारिश शीशे की दीवारों पर फिसल रही थी।
आर्यन ने आगे कहा, “मैंने तुमसे सच छिपाया। उसके लिए कोई बहाना काफी नहीं। मैं कंपनी को बचाते-बचाते यह भूल गया कि तुम्हारा दिल भी सच का हकदार था। तुमने जिस अपराधबोध में दिन बिताए, वह मेरी गलती थी। मैं उसके लिए माफी चाहता हूं।”
अन्वी ने उसकी आंखों में देखा। वहां मालिक का अभिमान नहीं था। वहां वही राजू था, जो बरामदे में चुपचाप चाय पीता था।
“आपने मुझे चोट पहुंचाई,” अन्वी ने कहा।
“जानता हूं।”
“मैंने राजू पर भरोसा किया था।”
“वह भरोसा झूठा नहीं था,” आर्यन बोला। “नाम झूठा था, पद झूठा था, गरीबी झूठी थी। लेकिन तुम्हारे सामने मेरा मन पहली बार सच्चा था। मैं आर्यन सिंघानिया होकर भी बहुत अकेला था। राजू बनकर तुम्हारे घर में पहली बार मुझे लगा कि कोई मुझे नाम से नहीं, इंसान समझकर देख रहा है।”
अन्वी की आंखें भर आईं। “मैंने तुम्हें दया से नहीं अपनाया था।”
“मुझे पता है,” आर्यन ने कहा। “तुमने मुझे इज्जत दी थी। और शायद मैं उसी इज्जत के काबिल बनने में देर कर गया।”
अन्वी ने अपने थैले से कुछ निकाला। वह उसी कमीज का बिल था, जिसे उसने संभालकर रखा था। उसने आर्यन को दिया और कहा, “मैं यह बिल इसलिए रखती थी कि एक दिन जब आपकी हालत ठीक हो जाए, तो आपको याद दिलाऊंगी कि मैंने आपको आपकी पहली अच्छी कमीज दिलाई थी।”
आर्यन की आंखें भी नम हो गईं।
अन्वी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “अब पता चला, आपकी हालत तो पहले से बहुत ठीक थी।”
आर्यन भी मुस्कुराया, पर उसकी मुस्कान में दुख था। “लेकिन मेरा दिल ठीक नहीं था। वह तुमने ठीक किया।”
दोनों के बीच कुछ क्षण खामोशी रही।
फिर अन्वी ने धीरे से कहा, “मुझे अरबपति पति नहीं चाहिए था।”
आर्यन ने सिर झुका लिया।
अन्वी ने आगे कहा, “मुझे वह आदमी चाहिए था जो मेरे टूटे हुए सम्मान को अपने नाम से नहीं, अपने साथ से बचाए। वह आदमी राजू था। अगर आर्यन सिंघानिया उसके अंदर अब भी जिंदा है, तो मैं कोशिश कर सकती हूं।”
आर्यन ने उसकी तरफ देखा। “क्या मैं फिर से शुरू कर सकता हूं?”
अन्वी ने कहा, “एक शर्त पर।”
“जो कहो।”
“अब कोई झूठ नहीं। चाहे सच कितना भी बड़ा हो या छोटा।”
आर्यन ने बिना देर किए कहा, “कसम।”
अन्वी ने हल्के से पूछा, “और दूसरी बात।”
“दूसरी भी है?” आर्यन ने आश्चर्य से कहा।
अन्वी के चेहरे पर पहली बार वही पुरानी शरारती मुस्कान आई। “हाँ। मॉल में अगली बार सचमुच की छूट होगी। मालिक वाली छूट नहीं।”
आर्यन हंस पड़ा। “ठीक है। लेकिन अगर मॉल मेरा हुआ तो?”
“तो आप बाहर वाली दुकान से खरीदेंगे,” अन्वी ने कहा।
दोनों हंस पड़े। बारिश अब धीमी हो गई थी। बाहर सड़क पर रोशनियां पानी में चमक रही थीं।
कुछ महीनों बाद सिंघानिया समूह में बहुत बदलाव आ चुका था। छोटे कर्मचारियों के लिए अलग भोजनालय बना। सफाई कर्मियों को नई वर्दी, उचित वेतन और सम्मान मिला। कंपनी के मुख्य द्वार पर एक पंक्ति लिखी गई—“किसी काम से इंसान छोटा नहीं होता, सोच से होता है।”
यह पंक्ति अन्वी ने सुझाई थी।
रोहन की कहानी वहीं खत्म नहीं हुई, पर उसका अभिमान खत्म हो चुका था। कानूनी प्रक्रिया चल रही थी। वह कई बार आर्यन से माफी मांगना चाहता था, पर आर्यन ने कहा, “माफी मुझसे नहीं, उन लोगों से मांगो जिन्हें तुमने छोटा समझा।”
अन्वी अब कंपनी में विशेष जांच विभाग संभालती थी। वह कठोर भी थी, पर न्यायपूर्ण। लोग उससे डरते नहीं, भरोसा करते थे। आर्यन अक्सर कहता, “कंपनी को मैंने बचाया, लेकिन इसकी आत्मा अन्वी ने बचाई।”
एक दिन वही पुराना भोजनालय, जहां अन्वी पहली बार राजू को खाना खिलाने लाई थी, फिर से सजाया गया। इस बार वहां कोई छिपी पहचान नहीं थी। आर्यन और अन्वी साथ बैठे। मालिक फिर आया, पर इस बार बिना डर के मुस्कुराया।
“आज खीर हमारी तरफ से,” उसने कहा।
अन्वी ने हंसकर कहा, “फिर कोई गुप्त छूट तो नहीं?”
आर्यन ने हाथ उठाकर कहा, “मैंने कुछ नहीं किया।”
मालिक बोला, “नहीं मैडम, इस बार सचमुच हमारी तरफ से। उस दिन आप दोनों को देखकर लगा था कि इज्जत का रिश्ता सबसे अलग होता है।”
अन्वी ने आर्यन की तरफ देखा। आर्यन ने धीरे से कहा, “साधारण चीजें सबसे ज्यादा याद रहती हैं।”
अन्वी मुस्कुराई। “और झाड़ूवाले?”
आर्यन ने कहा, “वे धूल भी साफ करते हैं और कभी-कभी जिंदगी भी।”
अन्वी ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया। आर्यन ने वह हाथ थाम लिया।
अब यह शादी मजबूरी नहीं थी। अब यह झूठ का बोझ नहीं थी। यह दो लोगों की स्वीकृति थी—एक लड़की जिसने अपराधबोध से शुरू होकर सम्मान में प्यार पाया, और एक युवक जिसने अरबों की दुनिया छोड़कर एक साधारण घर में अपना असली चेहरा पाया।
कहानी का अंत किसी महल में नहीं हुआ। वह उसी छोटी मेज पर हुआ, जहां दाल, रोटी और खीर रखी थी। जहां कोई मालिक नहीं था, कोई झाड़ूवाला नहीं था, कोई अमीर या गरीब नहीं था।
बस आर्यन था।
बस अन्वी थी।
और उनके बीच वह सच्चाई थी, जो देर से आई, पर जब आई तो दोनों की जिंदगी की धूल हमेशा के लिए साफ कर गई।