भाग 3
अन्वी ने खुशी से कमीज फिर उठा ली। “देखा? कभी-कभी किस्मत भी साथ दे देती है।”
राजू ने प्रबंधक की तरफ देखा। प्रबंधक डर से पसीना पोंछ रहा था। आर्यन ने आंखों से इशारा किया—ज्यादा मत करना।
लेकिन बेचारा प्रबंधक डर और सम्मान के बीच फंस गया। जब वे जूतों की दुकान में गए, वहां भी छूट मिल गई। जब वे भोजन क्षेत्र में गए, वहां भी उन्हें मुफ्त पेय का कूपन मिला। अन्वी की खुशी बढ़ती गई और आर्यन की परेशानी भी।
बिलिंग काउंटर पर मॉल प्रबंधक खुद आ गया। उसने राजू को देखकर लगभग कहा, “सर…”
पर आर्यन ने जूते का डिब्बा गिराने का नाटक किया। प्रबंधक संभल गया।
“सर… मतलब भाईसाहब,” उसने कहा, “यह रंग आप पर बहुत अच्छा लगेगा।”
अन्वी ने भौंहें चढ़ाईं। “आप इन्हें सर क्यों कह रहे थे?”
प्रबंधक ने ऐसा चेहरा बनाया जैसे उसकी आत्मा शरीर छोड़ने वाली हो। “मैडम, हमारे यहां ग्राहक भगवान होता है। हम सभी को आदर से सर कहते हैं।”
अन्वी ने संतोष से कहा, “अच्छा है। आजकल हर जगह गरीब लोगों को ऐसे नहीं देखा जाता।”
प्रबंधक ने तुरंत कहा, “जी, बिल्कुल, गरीब… मतलब सभी ग्राहक बराबर।”
राजू ने नीचे देखकर हंसी रोक ली।
मॉल से निकलते हुए अन्वी बहुत खुश थी। उसने कहा, “आज अच्छा लगा। आपको भी अच्छा लगा?”
राजू ने कमीज का थैला हाथ में लेकर कहा, “बहुत।”
“सच?”
“हाँ। यह कमीज महंगी होने के कारण नहीं, आपके कारण अच्छी है।”
अन्वी चुप हो गई। उसे समझ नहीं आया वह क्या कहे। उसका अपराधबोध धीरे-धीरे किसी और भावना में बदल रहा था। वह राजू को दया से नहीं देखती थी। वह उसे एक अच्छे आदमी के रूप में देखने लगी थी। पर वह इस भावना को नाम देने से डरती थी।
उस रात जब वह सोने जा रही थी, उसने देखा कि राजू ने नई कमीज बहुत सावधानी से मोड़कर रखी है, जैसे वह कोई कीमती चीज हो।
“आपने पहनकर देखा नहीं,” उसने कहा।
“किसी खास दिन पहनूंगा,” राजू ने उत्तर दिया।
“कौन सा खास दिन?”
“जब आपको लगे कि मैं सच में अच्छा दिख सकता हूं।”
अन्वी की नजरें झुक गईं। “आप वैसे भी अच्छे हैं।”
यह सुनकर आर्यन के भीतर जो भाव उठा, वह किसी महंगे पुरस्कार से बड़ा था।
इधर कंपनी में रोहन बेचैन होने लगा था। उसे लग रहा था कि यह झाड़ूवाला जरूरत से ज्यादा जगहों पर दिखाई देता है। कभी अभिलेख कक्ष के बाहर, कभी बिलिंग विभाग के पास, कभी ठेकेदारों की बैठक के बाद। रोहन ने एक दिन अपने साथी से कहा, “इस पर नजर रखो। मुझे यह साधारण नहीं लगता।”
अन्वी भी अपने काम के दौरान कुछ फाइलों में गड़बड़ी देखने लगी थी। एक ही विक्रेता के नाम से तीन अलग-अलग बिल थे। सफाई सामग्री के नाम पर लाखों रुपये निकले थे, जबकि कार्यालय के सफाई कर्मियों को घटिया सामान दिया जाता था। उसने फाइलें संभालते हुए राजू से कहा, “अजीब है। जिस झाड़ू से आप लोग काम करते हैं वह इतना सस्ता है, फिर खातों में सफाई सामान इतना महंगा कैसे दिख रहा है?”
राजू ने सहज बनने की कोशिश की, “आपको खातों की अच्छी समझ है।”
“काम ही वही है,” अन्वी बोली। “लेकिन यह गलत लग रहा है।”
“गलत चीजों को याद रखिए,” राजू ने कहा।
“क्यों?”
“कभी जरूरत पड़ सकती है।”
अन्वी ने उसे देखा। फिर पूछा, “आप कभी-कभी बहुत अलग बात करते हैं, राजू जी। जैसे आप सब समझते हैं।”
राजू ने मुस्कुराकर कहा, “झाड़ूवाला हूं। धूल कहां जमी है, पहचान लेता हूं।”
अन्वी को यह बात मजाक जैसी लगी, पर वह उसके भीतर छिपे अर्थ को समझ नहीं पाई।
धीरे-धीरे दोनों के बीच एक अजीब अपनापन पनपने लगा। वे पति-पत्नी की तरह नहीं, पहले दो सहयात्रियों की तरह करीब आए। अन्वी उसे चाय देती, वह मां की दवा लाता। अन्वी थककर बैठती, तो वह बिना पूछे पानी रख देता। वह बाजार से अन्वी की पसंद की इमली की गोली ले आता। अन्वी उसे डांटती, “अपने पैसे क्यों खर्च किए?” वह कहता, “झाड़ूवाले की भी कमाई होती है।”
एक रात बारिश हो रही थी। बिजली चली गई थी। मां सो चुकी थीं। अन्वी मोमबत्ती जलाकर बैठी थी। राजू बरामदे में बैठा बूंदें देख रहा था।
अन्वी ने पूछा, “अगर आप सच में झाड़ूवाले ही रहे, अगर कभी बड़ी नौकरी नहीं मिली, तो भी क्या आप खुश रह पाएंगे?”
राजू ने पलटकर पूछा, “आप रह पाएंगी?”
अन्वी ने लंबी सांस ली। “पहले शायद नहीं। क्योंकि मुझे डर लगता था कि लोग क्या कहेंगे। लेकिन अब लगता है, आदमी की कमाई से ज्यादा जरूरी उसका दिल है। गरीबी मुश्किल है, लेकिन घटिया इंसान के साथ अमीरी उससे ज्यादा मुश्किल है।”
आर्यन ने उसे देखा। उसकी आंखों में कोई दिखावा नहीं था।
“अगर मैं हमेशा ऐसा ही रहा तो?” उसने फिर पूछा।
अन्वी ने धीरे से कहा, “तो भी आप बुरे नहीं हो जाएंगे।”
यह वाक्य आर्यन के सीने में उतर गया। उसकी पूरी जिंदगी में लोग उससे इसलिए जुड़े थे क्योंकि वह सिंघानिया था। यह पहली आवाज थी जो कह रही थी कि अगर वह कुछ भी न रहे, तब भी वह किसी की नजर में अच्छा रह सकता है।
लेकिन जितना यह रिश्ता भीतर से सच्चा हो रहा था, उतना ही बाहर का झूठ खतरनाक हो रहा था।
रोहन ने योजना बना ली थी। वह चाहता था कि राजू को चोरी के आरोप में फंसाया जाए और अन्वी को भी इस मामले में घसीटा जाए। उसके पास दो कारण थे। पहला, वह अपने खिलाफ सबूत छिपाना चाहता था। दूसरा, वह अन्वी को सबके सामने झुकते देखना चाहता था।
एक दिन शाम को उसने अभिलेख कक्ष की एक महत्वपूर्ण फाइल गायब करवाई और सुरक्षा विभाग को सूचना दी कि एक सफाई कर्मचारी फाइलों के पास घूमता पाया गया है। नाम बताया गया—राजू।
अगली सुबह कार्यालय में हलचल थी। रोहन ने सबके सामने आवाज उठाई, “मैंने पहले ही कहा था, यह आदमी साधारण नहीं है। झाड़ू लगाने के बहाने फाइलें चुराता है। और इसकी पत्नी खातों में काम करती है। दोनों मिलकर कंपनी को नुकसान पहुंचा रहे हैं।”
अन्वी का चेहरा फक पड़ गया। वह आगे बढ़ी और बोली, “यह झूठ है। राजू ऐसा नहीं कर सकते।”
रोहन ने ठंडी हंसी के साथ कहा, “तुम्हें तो अपने पति पर विश्वास होगा ही। लेकिन कंपनी को प्रमाण चाहिए।”
राजू चुप खड़ा था। उसके चेहरे पर डर नहीं था। अन्वी ने उसकी तरफ देखा और पहली बार उसे लगा कि राजू किसी ऐसी शांति में खड़ा है, जो एक साधारण आदमी के पास नहीं हो सकती। जैसे वह तूफान से डर नहीं रहा, बल्कि तूफान का इंतजार कर रहा है।
रोहन ने घोषणा की, “आज दोपहर निदेशक मंडल के सामने दोनों से पूछताछ होगी। फिर पता चलेगा किसकी औकात क्या है।”
अन्वी कांप गई। उसे लगा, उसकी गलती अब राजू की जिंदगी सचमुच बर्बाद कर देगी।
वह राजू के पास आई। उसकी आंखों में आंसू थे। “मुझे माफ कर दीजिए। यह सब मेरी वजह से हुआ।”
राजू ने बहुत धीरे से कहा, “नहीं। यह सब उनकी वजह से हो रहा है जो सच से डरते हैं।”
“लेकिन आप क्या करेंगे?”
राजू ने पहली बार उसकी आंखों में वैसी नजर से देखा जैसे कोई बहुत देर से छिपा हुआ आदमी अब सामने आने वाला हो।
“आज शायद झाड़ू थोड़ा बड़ा काम करेगा,” उसने कहा।
अन्वी कुछ समझी नहीं।
दोपहर की बैठक तय हो चुकी थी। कंपनी का बड़ा सभागार लोगों से भरने लगा। रोहन आत्मविश्वास से भरा हुआ था। अन्वी डरी हुई थी। और राजू शांत था।
उसके हाथ में झाड़ू नहीं था।
आज उसके हाथ खाली थे।
जैसे वह किसी सफाई के लिए नहीं, किसी फैसले के लिए आया हो।
दोपहर होते-होते सिंघानिया समूह का बड़ा सभागार कर्मचारियों, अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों से भर गया। सामने लंबी मेज पर निदेशक मंडल के सदस्य बैठे थे। दीवार पर कंपनी का बड़ा चिन्ह चमक रहा था। उसी चिन्ह के नीचे अन्वी खड़ी थी, चेहरे पर घबराहट और आंखों में आंसू रोके हुए। उसके पास राजू खड़ा था, शांत, स्थिर और अजीब तरह से निडर।
रोहन मेज के पास खड़ा था। उसकी आवाज में वही पुराना अभिमान था।
“माननीय सदस्यों,” उसने कहा, “पिछले कुछ दिनों से कंपनी की गोपनीय फाइलें बाहर जाने की कोशिश हो रही थीं। हमारे पास संदेह है कि इसमें सफाई कर्मचारी राजू और खातों विभाग की कर्मचारी अन्वी शर्मा शामिल हैं। दोनों पति-पत्नी हैं, इसलिए इनके बीच जानकारी साझा करना आसान था।”
अन्वी ने तुरंत कहा, “यह झूठ है। मैंने कोई फाइल बाहर नहीं भेजी।”
रोहन ने हंसकर कहा, “हर दोषी यही कहता है।”
अन्वी का चेहरा लाल हो गया, पर उसने खुद को संभाला। “आप मेरे बारे में जो कहना चाहें कहिए, पर राजू को इसमें मत घसीटिए। वह निर्दोष हैं।”
रोहन ने ताना मारा, “वाह, कितना भरोसा है झाड़ूवाले पति पर। लेकिन भरोसे से कंपनी नहीं चलती, प्रमाण से चलती है।”
राजू ने अब तक कुछ नहीं कहा था। वह केवल सबको देख रहा था। निदेशक मंडल के कुछ सदस्य बेचैन लग रहे थे। उनमें से दो लोग रोहन के साथी थे। उनके चेहरों पर घबराहट छिपी हुई थी। उन्हें डर था कि कहीं बात उनके फर्जी बिलों तक न पहुंच जाए।
रोहन ने सुरक्षा कर्मी को इशारा किया। “फाइल दिखाइए।”
एक फाइल मेज पर रखी गई। रोहन ने कहा, “यह फाइल कल अभिलेख कक्ष से गायब हुई थी। और सुरक्षा कैमरे में राजू उस कमरे के आसपास दिखाई दिया।”
राजू ने पहली बार सिर उठाया। “सुरक्षा कैमरे की पूरी रिकॉर्डिंग है आपके पास?”
रोहन चौंका। “तू सवाल करेगा?”
“सवाल तो पूछना पड़ेगा,” राजू ने शांत स्वर में कहा। “क्योंकि आधा सच अक्सर पूरा झूठ होता है।”
सभागार में हल्की फुसफुसाहट फैल गई। रोहन चिढ़ गया। “अपनी हैसियत में रह।”
अन्वी आगे आई। “कृपया इन्हें बोलने दीजिए।”
रोहन ने कठोर स्वर में कहा, “तुम चुप रहो। तुम्हारी वजह से यह झाड़ूवाला अपने आपको बहुत बड़ा समझने लगा है।”
राजू ने उसकी तरफ देखा और धीरे से कहा, “नहीं रोहन जी। मुझे बड़ा किसी ने नहीं बनाया। मैं बस छोटा बनने का अभिनय कर रहा था।”
यह वाक्य सभागार में अजीब सा गिरा। लोग एक-दूसरे को देखने लगे।
उसी समय सभागार का पिछला दरवाजा खुला। अंदर कंपनी की विधिक सलाहकार नीलिमा आईं। उनके साथ दो बाहरी लेखा परीक्षक और सुरक्षा विभाग का वरिष्ठ अधिकारी था। रोहन का चेहरा बदल गया।
“नीलिमा मैडम?” उसने कहा। “आप यहां?”
नीलिमा ने सीधा उत्तर दिया, “मालिक के निर्देश पर।”
रोहन ने बनावटी हंसी के साथ कहा, “मालिक? पर मालिक तो विदेश में हैं।”
नीलिमा ने शांत स्वर में कहा, “नहीं। मालिक पिछले कई सप्ताह से यहीं हैं।”
पूरा सभागार खामोश हो गया।
रोहन ने घबराकर कहा, “क्या मतलब?”
नीलिमा ने मंच की तरफ देखा और कहा, “सिंघानिया समूह के वास्तविक स्वामी, श्री आर्यन सिंघानिया, आज स्वयं जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे।”
सबकी नजरें दरवाजे की तरफ घूम गईं। लोग किसी महंगे सूट वाले, सुरक्षा घेरे में आने वाले युवक को ढूंढने लगे।
पर कोई नहीं आया।
फिर राजू धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
रोहन ने हंसने की कोशिश की, पर उसकी हंसी गले में अटक गई। “अबे तू कहां जा रहा है?”
राजू ने बिना रुके कहा, “वहीं, जहां मेरी जगह है।”
वह मंच पर चढ़ा। उसने अपनी पुरानी टोपी उतारी। फिर जेब से एक छोटा पहचान पत्र निकाला। सुरक्षा अधिकारी ने सामने लगे परदे पर दस्तावेज दिखाया।
नाम चमका—आर्यन सिंघानिया, स्वामी, सिंघानिया समूह।
सभागार में ऐसी खामोशी छाई कि किसी की सांस भी सुनाई दे सकती थी।
अन्वी स्तब्ध रह गई। उसके हाथ से वह कपड़ों वाला थैला गिर गया, जिसमें वही नीली कमीज थी जो उसने मॉल से खरीदी थी। उसे लगा जैसे उसके पैरों के नीचे की जमीन हिल गई हो। जिस आदमी को वह गरीब समझकर बचाती रही, जिसे नौकरी छूटने के डर से खाना खिलाती रही, जिसके लिए मॉल से कमीज खरीदकर खुश हुई—वह इस पूरी कंपनी का मालिक था।
रोहन के चेहरे से रंग उड़ गया। उसने पीछे हटना चाहा, पर कुर्सी से टकरा गया।
आर्यन ने मंच से कहा, “मैं इस कंपनी में झाड़ू लगाने आया था। लेकिन फर्श पर जमी धूल साफ करने नहीं। मैं उन चेहरों की धूल साफ करने आया था, जो ईमानदारी की चमक में चोरी छिपाए बैठे थे।”
किसी ने कुछ नहीं कहा।
नीलिमा ने इशारा किया। परदे पर फर्जी बिल, नकली विक्रेता, बढ़े हुए भुगतान, मजदूरों के रोके गए वेतन और रोहन के हस्ताक्षर वाले दस्तावेज दिखने लगे। हर दस्तावेज के साथ तारीखें थीं, बैंक भुगतान थे, संदेश थे और रिकॉर्डिंग थीं। रोहन का नाम बार-बार सामने आ रहा था। उसके साथ दो निदेशकों के नाम भी जुड़े थे।
आर्यन ने कहा, “सफाई सामग्री के नाम पर लाखों रुपये निकाले गए, जबकि कर्मचारियों को घटिया सामान दिया गया। मजदूरों का भुगतान काटा गया, पर कागजों में पूरा दिखाया गया। तीन नकली विक्रेता बनाए गए। और जब जांच करीब आई, तो एक सफाई कर्मचारी और एक निर्दोष लड़की पर चोरी का आरोप लगाने की कोशिश की गई।”