भाग 1
शहर की सबसे ऊंची इमारतों में से एक थी सिंघानिया समूह का मुख्य कार्यालय। बाहर से देखने पर वह इमारत शीशे की बनी हुई किसी चमकती हुई दीवार जैसी लगती थी। सुबह होते ही उसके सामने महंगी गाड़ियां रुकतीं, सजे हुए लोग अंदर जाते, रिसेप्शन पर मुस्कुराहटें बिखरतीं और लिफ्टों में खड़े लोग अपनी-अपनी मंजिलों की तरफ बढ़ जाते। पर उसी चमकदार इमारत के भीतर कुछ ऐसा था, जो किसी को दिखाई नहीं देता था।
कंपनी का नाम बहुत बड़ा था, मुनाफा बहुत बड़ा था, कारोबार कई शहरों तक फैला हुआ था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से कंपनी के खातों में अजीब गड़बड़ियां आ रही थीं। सामान के बिल बढ़ रहे थे, मजदूरों के भुगतान कम हो रहे थे, छोटे कर्मचारियों के वेतन देर से जा रहे थे और बड़े अधिकारी हर बैठक में यही कहते थे कि सब ठीक चल रहा है।
कागजों पर सब सही था, लेकिन सच्चाई में कहीं न कहीं धूल जमी हुई थी।
और वही धूल साफ करने के लिए सिंघानिया समूह का असली मालिक, सत्ताईस साल का आर्यन सिंघानिया, एक सुबह अपनी ही कंपनी में झाड़ूवाला बनकर दाखिल हुआ।
उसने अपना महंगा कोट, चमचमाती घड़ी और बड़ी गाड़ी सब पीछे छोड़ दी थी। उस दिन उसके बदन पर हल्की फीकी कमीज थी, पैरों में साधारण जूते थे, हाथ में पुराना झाड़ू और गले में एक पहचान पत्र लटक रहा था, जिस पर नाम लिखा था—राजू।

किसी ने उसे ध्यान से नहीं देखा। बड़े अधिकारियों के लिए वह बस सफाई करने वाला लड़का था। कुछ लोग उसके सामने कचरा गिराते हुए भी मुस्कुरा देते थे, जैसे उसका काम ही दूसरों की लापरवाही उठाना हो। कोई उसे रास्ते से हटने को कहता, कोई उसे नाम से नहीं, “ओए झाड़ूवाले” कहकर बुलाता।
आर्यन चुप रहता। वह झाड़ू लगाता, कूड़ेदान खाली करता, फर्श पोंछता और साथ ही हर चेहरे को पढ़ता। कौन किससे फुसफुसा रहा है, कौन किस कमरे में कौन सी फाइल छिपा रहा है, कौन मजदूरों की शिकायत सुनकर भी हंस रहा है—वह सब देख रहा था।
उसी कार्यालय में काम करती थी अन्वी शर्मा।
अन्वी कोई बहुत ऊंचे पद पर नहीं थी। वह खातों और अभिलेखों से जुड़ा काम करती थी। उसका स्वभाव शांत था, लेकिन कमजोर नहीं। वह किसी से बेवजह बहस नहीं करती थी, पर किसी छोटे कर्मचारी से गलत व्यवहार होते देख चुप भी नहीं रहती थी। चपरासी से लेकर सुरक्षा कर्मी तक उसे सम्मान से देखते थे, क्योंकि वह उनसे ऐसे बात करती थी जैसे वे भी इंसान हों, सिर्फ काम करने वाली मशीन नहीं।
पहले दिन ही जब आर्यन फर्श पोंछते हुए एक कोने में झुका हुआ था, तभी एक कर्मचारी तेज़ी से आया और उसकी बाल्टी से टकरा गया। पानी फैल गया। कर्मचारी ने अपनी गलती मानने की जगह चिढ़कर कहा, “देखकर काम नहीं कर सकता? पूरा रास्ता गंदा कर दिया।”
आर्यन ने सिर झुकाकर कहा, “माफ कीजिए, अभी साफ कर देता हूं।”

तभी पीछे से अन्वी की आवाज आई, “गलती इनकी नहीं थी। आप ही जल्दी में टकराए थे।”
वह कर्मचारी कुछ बड़बड़ाता हुआ चला गया। अन्वी ने झुककर बाल्टी सीधी कर दी और आर्यन से कहा, “आप रहने दीजिए, मैं कपड़ा उठा देती हूं।”
आर्यन ने पहली बार उसे गौर से देखा। उसकी आंखों में दया नहीं थी, बराबरी थी। जैसे वह किसी गरीब पर एहसान नहीं कर रही थी, बल्कि एक इंसान की मदद कर रही थी।
“धन्यवाद,” आर्यन ने धीरे से कहा।
अन्वी मुस्कुराई, “धन्यवाद की जरूरत नहीं। यहां लोग पद देखकर बात करते हैं, मुझे यह आदत पसंद नहीं।”
आर्यन ने कोई उत्तर नहीं दिया, पर उसके मन में यह बात कहीं बैठ गई।
अन्वी की जिंदगी बाहर से साधारण दिखती थी, लेकिन अंदर से वह टूट चुकी थी। कुछ ही दिन पहले उसका रिश्ता रोहन मल्होत्रा से टूटा था। रोहन उसी कंपनी में वरिष्ठ प्रबंधक था। वह तेज बोलता था, महंगे कपड़े पहनता था और हर किसी को अपनी हैसियत से तौलता था। कभी उसने अन्वी से शादी का वादा किया था, लेकिन जैसे ही उसे एक बड़े अधिकारी की बेटी से रिश्ता जुड़ने का मौका मिला, उसने अन्वी को एक तरफ कर दिया।
सबसे बड़ी चोट धोखे से नहीं, उसके बाद हुई बेइज्जती से लगी थी।
रोहन अब भी कार्यालय में अन्वी को देखकर ताना मारता। कभी कहता, “तुम्हें जिंदगी में आगे बढ़ना सीखना चाहिए।” कभी कहता, “भावनाओं से बिल नहीं भरते, अन्वी।” और कभी ऐसी मुस्कान देता जैसे वह उसे याद दिला रहा हो कि उसने उसे छोड़ा है।
अन्वी हर बार चुप रह जाती। वह लड़ना नहीं चाहती थी। वह बस अपनी इज्जत बचाकर जीना चाहती थी।
एक शाम कंपनी में छोटी सी दावत रखी गई। नए ग्राहकों के आने की खुशी में सभी कर्मचारियों को बुलाया गया था। रोशनियां थीं, संगीत था, महंगे पकवान थे और लोगों के चेहरों पर झूठी मुस्कानें थीं। अन्वी को ऐसे समारोह पसंद नहीं थे, पर उसे विभाग की तरफ से उपस्थित रहना था।
रोहन भी वहां था। उसके साथ वही लड़की थी जिससे उसकी सगाई होने वाली थी। वह बार-बार अन्वी की तरफ देखता और फिर अपने दोस्तों के साथ हंसता। अन्वी ने खुद को मजबूत बनाए रखा। वह एक कोने में खड़ी होकर पानी पी रही थी, तभी रोहन उसके पास आया।
“अरे अन्वी, तुम अकेली?” उसने ऊंची आवाज में कहा, ताकि आसपास के लोग सुन सकें। “मैंने सुना था तुम भी जिंदगी में आगे बढ़ गई हो।”
अन्वी ने शांत रहने की कोशिश की, “मुझे आपसे बात नहीं करनी।”
रोहन हंसा, “इतना अभिमान? अच्छा बताओ, कोई है तुम्हारी जिंदगी में? या अभी भी पुराने सपने संभालकर बैठी हो?”
कुछ लोग पास खड़े होकर सुनने लगे। अन्वी का चेहरा सफेद पड़ गया। वह झूठ बोलना नहीं चाहती थी, लेकिन रोहन की आवाज में इतना अपमान था कि उसके भीतर दबा हुआ दर्द अचानक बाहर आ गया।
उसने धीमे, पर साफ स्वर में कहा, “मैं अकेली नहीं हूं। मेरी शादी हो चुकी है।”
रोहन का चेहरा पल भर के लिए बदला, फिर वह जोर से हंसा। “सच? तुम्हारी शादी? पति कहां है तुम्हारा?”
अन्वी चुप हो गई। उसकी आंखें इधर-उधर भागीं। उसे समझ नहीं आया वह क्या करे। तभी उसकी नजर हाल के किनारे पर खड़े राजू पर पड़ी। वह चुपचाप कूड़ेदान बदल रहा था। किसी ने उसे बुलाया भी नहीं था, फिर भी वह वहां काम कर रहा था, जैसे उस चमकदार दावत का हिस्सा नहीं, उसका अदृश्य किनारा हो।
अन्वी की सांस अटक गई। उसे पता था यह गलत है। बहुत गलत। पर रोहन की हंसी, आसपास खड़े लोगों की नजरें और अपनी डूबती इज्जत ने उसे एक पल के लिए कमजोर कर दिया।
उसने कांपती आवाज में कहा, “वही हैं मेरे पति।”
सभी की नजरें राजू पर घूम गईं।
राजू ने हाथ में पकड़ा कूड़ेदान धीरे से नीचे रखा। रोहन पहले तो हैरान हुआ, फिर ऐसी हंसी हंसा जैसे उसे कोई खिलौना मिल गया हो।
“यह?” रोहन ने कहा। “तुमने इस झाड़ूवाले से शादी की है?”
हाल में कई लोग हंसने लगे। अन्वी की आंखों में पानी आ गया। उसे तुरंत अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने एक निर्दोष आदमी को अपने झूठ में खींच लिया था।
राजू धीरे-धीरे उनके पास आया। वह चाह सकता था कि सच बोल दे। वह कह सकता था कि अन्वी झूठ बोल रही है। वह सबके सामने अपनी गर्दन बचा सकता था। लेकिन उसने अन्वी की आंखों में वह डर देखा, जो इज्जत टूटने से पहले आता है।
उसने बहुत शांत स्वर में कहा, “अगर इन्होंने कहा है, तो मैं इनका साथ दूंगा।”
हाल में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।
अन्वी ने उसे देखा। उसे समझ नहीं आया कि एक अनजान आदमी उसके लिए यह अपमान क्यों सह रहा है।
रोहन का चेहरा कसैला हो गया। “वाह, बहुत बढ़िया। अब कंपनी में झाड़ूवाला भी दामाद बनकर घूमेगा।”
राजू ने उसकी तरफ देखा, पर कुछ नहीं कहा। उसकी आंखों में गुस्सा नहीं था, पर एक ऐसी स्थिरता थी जिससे रोहन को अनजाना असहजपन हुआ।
दावत खत्म होते ही अन्वी राजू को बाहर बरामदे में ले गई। वहां हवा थोड़ी ठंडी थी और दूर सड़क पर गाड़ियों की रोशनी बह रही थी। अन्वी ने हाथ जोड़ दिए।
“मुझे माफ कर दीजिए,” वह बोली। “मैंने आपको इस्तेमाल किया। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। मैंने अपने डर में आपकी इज्जत भी दांव पर लगा दी।”
राजू ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आपने डर में झूठ बोला, लेकिन किसी को चोट पहुंचाने के लिए नहीं।”
“लेकिन अब रोहन आपको नौकरी से निकलवा देगा,” अन्वी की आवाज भर्रा गई। “वह बहुत बदला लेने वाला आदमी है। मैं जानती हूं उसे। उसने पहले भी छोटे कर्मचारियों को परेशान किया है।”
राजू ने शांत होकर कहा, “नौकरी चली भी गई तो दूसरी मिल जाएगी।”
“आप ऐसा कैसे कह सकते हैं?” अन्वी ने दुख से कहा। “आपके लिए यह नौकरी बहुत जरूरी होगी। मेरे एक झूठ की वजह से आपका घर कैसे चलेगा?”
राजू कुछ क्षण उसे देखता रहा। इस शहर में उसने करोड़ों की संपत्ति वाले लोगों को एक रुपये के लिए दूसरे का हक मारते देखा था। और यह लड़की, जो खुद टूटी हुई थी, एक झाड़ूवाले की नौकरी के लिए रो रही थी।
“आप बहुत ज्यादा सोचती हैं,” उसने कहा।
“क्योंकि गलती मेरी है,” अन्वी बोली। “और गलती करने के बाद चैन से खाना मुझे नहीं आता।”
उस रात अन्वी घर लौटकर सो नहीं सकी। उसे बार-बार वही दृश्य याद आता रहा—राजू का शांत चेहरा, लोगों की हंसी, रोहन का ताना, और वह वाक्य—अगर इन्होंने कहा है, तो मैं इनका साथ दूंगा।
अगले दिन अन्वी ने दोपहर के भोजन के समय राजू को खोजा। वह पीछे के गलियारे में फर्श साफ कर रहा था। अन्वी उसके पास गई और बोली, “आज आप मेरे साथ खाना खाएंगे।”
राजू ने झाड़ू रोककर कहा, “नहीं, मैं यहां कर्मचारियों के साथ खा लेता हूं।”
“नहीं,” अन्वी ने दृढ़ता से कहा। “आज मेरी तरफ से। आपने कल मेरी इज्जत बचाई थी। मुझे कुछ करने दीजिए, नहीं तो मेरा मन और भारी रहेगा।”
राजू ने मना करने की कोशिश की, पर अन्वी की आंखों में ऐसी सच्चाई थी कि वह चुप हो गया।
वह उसे कार्यालय के पास एक अच्छे भोजनालय में ले गई। जगह बहुत महंगी नहीं थी, पर साफ-सुथरी थी। अन्वी ने मेनू उसके सामने रखा और कहा, “जो पसंद हो, वही लीजिए। कीमत मत देखिए।”
आर्यन ने मेनू देखा। वह उन जगहों का मालिक रहा था जहां एक कप चाय की कीमत में गरीब घर का राशन आ जाता था, पर आज यह साधारण भोजनालय उसे अजीब तरह से गर्म लगा। क्योंकि यहां कोई उसे प्रभावित करने नहीं लाया था। यहां एक लड़की अपने अपराधबोध को हल्का करने के लिए नहीं, बल्कि सच में उसे खुश देखने के लिए बैठी थी।
“आप क्या खाएंगी?” उसने पूछा।
“आज आपकी पसंद,” अन्वी बोली।
“तो दाल, रोटी और खीर,” उसने कहा।
अन्वी मुस्कुराई, “इतना साधारण?”
राजू ने कहा, “साधारण चीजें अक्सर सबसे ज्यादा याद रहती हैं।”
खाना आया। अन्वी बीच-बीच में उसे देखती रही, जैसे यह परख रही हो कि उसे अच्छा लग रहा है या नहीं। राजू धीरे-धीरे खा रहा था। वह किसी महंगे स्वाद से नहीं, उस अपनत्व से भर रहा था जो उसे वर्षों से नहीं मिला था।
उसी समय भोजनालय का मालिक पीछे से गुजरा। उसने राजू को देखा और ठिठक गया। उसकी आंखों में पहचान की चमक आई। वह लगभग झुकने ही वाला था कि आर्यन ने मेज के नीचे हाथ से बहुत हल्का इशारा किया—चुप।
मालिक तुरंत संभल गया।
“कुछ और चाहिए, मैडम?” उसने अन्वी से पूछा।
अन्वी ने कहा, “नहीं, सब अच्छा है।”
मालिक ने घबराकर कहा, “आज आपकी मेज के लिए खीर हमारी तरफ से।”
अन्वी चौंकी, “लेकिन हमने तो खीर मंगाई है।”
“तो दूसरी भी हमारी तरफ से,” वह कह गया और तुरंत भाग गया।
अन्वी ने आश्चर्य से राजू को देखा, “यह लोग इतने अच्छे हैं?”
राजू ने मासूम चेहरा बनाकर कहा, “शायद आज इनका मन अच्छा है।”
अन्वी हंस दी। उस हंसी में दर्द अभी भी था, पर पहली बार हल्कापन भी था।
लेकिन रोहन इतनी आसानी से चुप बैठने वाला नहीं था। अगले कुछ दिनों में उसने कंपनी में बातें फैलानी शुरू कर दीं। कोई कहता, अन्वी ने झूठ बोला है। कोई कहता, वह झाड़ूवाले को पति कहकर रोहन को जलाना चाहती थी। कोई कहता, अगर सच में शादी हुई है तो प्रमाण कहां है।
अन्वी ने उन बातों को अनसुना करने की कोशिश की, लेकिन अफवाहें धीरे-धीरे उसके घर तक पहुंच गईं। उसकी मां, जो पहले से कमजोर रहती थीं, एक दिन रोते हुए बोलीं, “बेटी, लोग क्या-क्या कह रहे हैं? तूने शादी की है तो हमें क्यों नहीं बताया?”
अन्वी टूट गई। उसने मां को सच बताना चाहा, लेकिन मां की हालत देखकर रुक गई। बाहर समाज था, अंदर मां की चिंता थी, और बीच में एक निर्दोष आदमी था जिसे उसने अपने झूठ में खड़ा कर दिया था।