भाग 1
दोस्तों, कहते हैं कि किसी इंसान की असली पहचान उसके कपड़ों, पद या उसकी जेब में रखे पैसों से नहीं होती। उसकी पहचान तब सामने आती है, जब हालात उसके सामने दीवार बनकर खड़े हो जाएँ और फिर भी वह इंसान अपने सपनों की ओर बढ़ना न छोड़े।
यह कहानी भी एक ऐसे ही युवक की है, जिसे दुनिया एक मामूली दफ्तर सहायक समझती थी। लोग उसे चाय लाने वाला, फाइलें उठाने वाला और मेज साफ करने वाला नौकर कहते थे। मगर किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि दिनभर दूसरों के आदेश सुनने वाला वह युवक रात को अपनी किस्मत के खिलाफ कैसी लड़ाई लड़ रहा था।
दिल्ली के बाहरी हिस्से में फैली हुई एक विशाल औषधि निर्माण संस्था थी— राजवर्धन जीवन विज्ञान संस्थान । इस संस्था का नाम पूरे देश में सम्मान से लिया जाता था। यहाँ कैंसर, तंत्रिका रोग, नशे की लत और दुर्लभ बीमारियों की दवाओं पर शोध किया जाता था।
इस संस्था के मालिक थे राजवर्धन मेहरा ।

राजवर्धन लगभग साठ वर्ष के गंभीर, अनुशासित और दूरदर्शी व्यक्ति थे। उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत एक छोटे औषधि विक्रेता के रूप में की थी और अपनी मेहनत से इतनी बड़ी संस्था खड़ी की थी। उनके पास धन, प्रतिष्ठा और प्रभाव सब कुछ था, लेकिन उनके मन के भीतर एक ऐसी चिंता थी, जो उन्हें हर रात सोने नहीं देती थी।
उनकी दो बेटियाँ थीं।
बड़ी बेटी का नाम था आरोही ।
आरोही शांत, विनम्र और दयालु स्वभाव की थी। वह संस्था के सामाजिक कल्याण विभाग को संभालती थी। गरीब रोगियों की सहायता करना, कर्मचारियों के बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना और अस्पतालों में निःशुल्क औषधियाँ पहुँचाना उसके काम का हिस्सा था। वह जब भी दफ्तर में प्रवेश करती, तो चपरासी से लेकर बड़े अधिकारी तक उसे सम्मान से नमस्कार करते।
दूसरी बेटी का नाम था कियारा ।
कियारा अपनी बड़ी बहन से बिल्कुल अलग थी। वह सुंदर थी, शिक्षित थी और आधुनिक जीवन की सभी सुविधाएँ उसके पास थीं, लेकिन उसका स्वभाव अत्यंत कठोर और अहंकारी था। उसे लगता था कि संसार में हर व्यक्ति पैसे के लिए झुकता है। वह कर्मचारियों को नाम से नहीं, उनके पद से बुलाती थी।
“अरे, चाय वाले!”
“सुनो, फाइल उठाने वाले!”
“तुम्हें इतनी सी बात समझ नहीं आती?”
उसकी आवाज दफ्तर के गलियारों में अक्सर गूँजती रहती थी।
कर्मचारी उसके सामने चुप रहते थे, लेकिन उसके जाते ही राहत की साँस लेते।
इसी संस्था में काम करता था चौबीस वर्ष का एक युवक— अर्जुन ।
अर्जुन का चेहरा साधारण था, कपड़े साधारण थे और उसके जीवन की आवश्यकताएँ भी बहुत छोटी थीं। वह हर सुबह सबसे पहले दफ्तर पहुँचता। मुख्य द्वार खुलने से पहले वह स्वागत कक्ष की सफाई करता, पानी की बोतलें भरता, प्रयोगशाला के बाहर रखी फाइलें उचित विभागों तक पहुँचाता और फिर कर्मचारियों के लिए चाय तैयार करता।
लेकिन अर्जुन की एक आदत सबको हैरान करती थी।
वह कभी किसी से शिकायत नहीं करता था।
कोई अधिकारी उसे एक साथ पाँच काम दे देता, तो वह शांत स्वर में कहता, “जी, अभी करता हूँ।”
किसी कर्मचारी से गलती हो जाती और दोष अर्जुन पर डाल दिया जाता, तब भी वह बहस नहीं करता।
मगर दोस्तों, उसकी यह चुप्पी कमजोरी नहीं थी। वह अपनी ऊर्जा उन बातों पर खर्च नहीं करना चाहता था, जो उसके लक्ष्य को छोटा कर दें।
अर्जुन एक छोटे किराए के कमरे में रहता था। कमरे में एक टूटी चारपाई, पुराना पंखा, मिट्टी का घड़ा और किताबों से भरी दो लकड़ी की पेटियाँ थीं। दिनभर दफ्तर में काम करने के बाद वह रात नौ बजे अपने कमरे में लौटता, जल्दी से खाना बनाता और फिर किताबें खोलकर बैठ जाता।
उसकी किताबों पर लिखे विषय किसी सामान्य विद्यार्थी के नहीं थे।
मानव मस्तिष्क की रासायनिक संरचना।
नशे की निर्भरता का तंत्र।
स्मृति कोशिकाओं की क्षति।
औषधीय पुनर्वास की नई पद्धतियाँ।
अर्जुन कभी चिकित्सा महाविद्यालय का विद्यार्थी था। उसने प्रवेश परीक्षा में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त किया था, लेकिन दूसरे वर्ष में ही उसकी माँ गंभीर बीमारी से पीड़ित हो गई थीं। उनके उपचार के लिए अर्जुन को पढ़ाई छोड़कर काम करना पड़ा।
उसकी माँ एक दुर्लभ तंत्रिका रोग से पीड़ित थीं। धीरे-धीरे उनकी स्मृति चली गई। कभी वह अर्जुन को पहचानतीं और कभी उसे अजनबी समझकर डर जातीं। महँगी दवाओं के बावजूद उनकी स्थिति बिगड़ती गई और अंत में एक रात उन्होंने अर्जुन की गोद में दम तोड़ दिया।
मृत्यु से कुछ समय पहले उन्होंने उसका हाथ पकड़कर कहा था—
“बेटा, मेरी बीमारी को अपनी हार मत बनाना। कभी इतना बड़ा बनना कि किसी गरीब का बच्चा अपनी माँ को सिर्फ पैसे की कमी के कारण न खोए।”
बस, वही शब्द अर्जुन के जीवन का उद्देश्य बन गए थे।
वह दिन में काम करता और रात को पढ़ता। उसने चिकित्सा महाविद्यालय छोड़ दिया था, लेकिन चिकित्सा का सपना नहीं छोड़ा था।
अब कहानी में एक रात ऐसा मोड़ आया, जिसने अर्जुन की दुनिया बदल दी।
उस दिन संस्था में विदेशी वैज्ञानिकों का एक प्रतिनिधिमंडल आया था। देर रात तक बैठक चली। सभी अधिकारी जा चुके थे, लेकिन राजवर्धन किसी आवश्यक फाइल के लिए वापस अपने कक्ष में आए।
मुख्य भवन की अधिकांश बत्तियाँ बंद थीं।
चलते-चलते उन्हें भंडार कक्ष के भीतर हल्की रोशनी दिखाई दी।
उन्होंने दरवाजा खोला।
अंदर अर्जुन जमीन पर बैठा था। उसके सामने पुराने शोध पत्र फैले हुए थे। एक हाथ में कलम और दूसरे हाथ में मानव मस्तिष्क का चित्र था। पास ही एक छोटा दीपक जल रहा था, क्योंकि कमरे की मुख्य बत्ती खराब थी।
राजवर्धन ने कठोर स्वर में पूछा, “इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे हो?”
अर्जुन घबरा गया। वह तुरंत खड़ा हो गया।
“मालिक, मैं… मैं पुराने कागज देख रहा था।”
राजवर्धन की नजर मेज पर रखे संस्थान के शोध पत्रों पर गई।
“क्या तुम गोपनीय कागज चुरा रहे हो?”
“नहीं मालिक!” अर्जुन के चेहरे का रंग उड़ गया, “ये वे कागज हैं जिन्हें प्रयोगशाला ने बेकार घोषित करके फेंक दिया था। मैंने किसी गोपनीय फाइल को हाथ नहीं लगाया।”
“तुम्हें इनमें क्या समझ आता है?”
अर्जुन कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला, “थोड़ा-बहुत समझने की कोशिश करता हूँ।”
राजवर्धन ने एक शोध पत्र उठाया। वह नशे की लत के उपचार से संबंधित था।
उन्होंने पूछा, “इसमें क्या लिखा है?”
अर्जुन ने धीरे से उत्तर दिया, “इस पद्धति में रोगी के मस्तिष्क में आनंद उत्पन्न करने वाले रसायन को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है। लेकिन मात्रा की गणना में एक कठिनाई है। अगर दवा अचानक कम की जाए तो रोगी में हिंसक प्रतिक्रिया हो सकती है।”
राजवर्धन उसे देखते रह गए।
“यह बात तुम्हें कैसे पता?”
अर्जुन ने एक पुरानी कॉपी खोली। उसमें दर्जनों सूत्र और टिप्पणियाँ लिखी थीं।
“मैं पिछले तीन वर्षों से इस विषय को पढ़ रहा हूँ।”
राजवर्धन ने उसकी कॉपी अपने हाथ में ली। कुछ पन्नों पर इतनी जटिल गणनाएँ थीं कि सामान्य व्यक्ति उन्हें समझ भी नहीं सकता था।
उन्होंने पूछा, “तुमने शिक्षा कहाँ तक प्राप्त की?”
अर्जुन ने अपने जीवन की पूरी बात बता दी।
उस रात राजवर्धन कुछ नहीं बोले। उन्होंने केवल इतना कहा—
“ये कागज समेटो और घर जाओ।”
अर्जुन को लगा कि अगली सुबह उसे नौकरी से निकाल दिया जाएगा।
लेकिन अगले दिन राजवर्धन ने उसके सामने एक परीक्षा रखी।
उन्होंने प्रयोगशाला की एक पुरानी शोध रिपोर्ट अर्जुन तक पहुँचवाई, जिसमें जानबूझकर एक गलत रासायनिक अनुपात लिखा गया था। अर्जुन को लगा कि रिपोर्ट कूड़े में फेंकी जाने वाली है। उसने उसे पढ़ा और लाल कलम से किनारे पर लिख दिया—
“यह मात्रा रोगी के हृदय पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है। अनुपात आधा होना चाहिए।”
रिपोर्ट बाद में संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक के पास पहुँची।
वैज्ञानिक ने टिप्पणी पढ़ी और तुरंत राजवर्धन से पूछा, “यह सुधार किसने लिखा है?”
राजवर्धन ने काँच की दीवार के पार देखा। अर्जुन वहाँ मेज साफ कर रहा था।
“हमारे दफ्तर सहायक ने।”
वैज्ञानिक हँस पड़ा।
“आप मजाक कर रहे हैं।”
लेकिन जब अर्जुन को बुलाकर प्रश्न किए गए, तो उसने न केवल अपने सुधार को समझाया, बल्कि उस प्रयोग की तीन अन्य कमजोरियाँ भी बता दीं।
उस दिन के बाद राजवर्धन ने अर्जुन की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का निर्णय लिया।
उन्होंने उसे अपने कक्ष में बुलाया और कहा—
“आज से तुम शाम के बाद हमारे प्रशिक्षण केंद्र में पढ़ोगे। तुम्हें शिक्षक, पुस्तकें और प्रयोगशाला की सुविधा दी जाएगी।”
अर्जुन की आँखें भर आईं।
“मालिक, मैं आपका यह कर्ज कैसे चुकाऊँगा?”
राजवर्धन ने कहा, “इसे कर्ज मत समझना। किसी योग्य व्यक्ति को अवसर देना दान नहीं होता। यह समाज की जिम्मेदारी होती है।”
यह बात जल्द ही आरोही को पता चली। वह अर्जुन की प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुई। उसने उसके लिए नई पुस्तकें मँगवाईं और कहा—
“तुम्हें कभी किसी सामग्री की आवश्यकता हो तो मुझसे कहना।”
अर्जुन ने विनम्रता से धन्यवाद दिया।
लेकिन कियारा को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं आया।
एक दिन उसने अर्जुन को प्रशिक्षण केंद्र में सफेद प्रयोगशाला वस्त्र पहने देखा। उसके सामने सूक्ष्मदर्शी रखा था।
कियारा ने व्यंग्य से पूछा, “तो अब चाय बनाने वाले वैज्ञानिक भी बनने लगे?”
अर्जुन शांत रहा।
“मैडम, मैं केवल सीख रहा हूँ।”
“अपनी औकात से बड़ा सपना देखने वालों का अंत बहुत बुरा होता है।”
पास खड़ी आरोही ने कहा, “कियारा, किसी की मेहनत का मजाक मत उड़ाओ।”
कियारा चिढ़ गई।
“दीदी, आपको तो हर गरीब व्यक्ति महान लगता है।”
अर्जुन वहाँ से चला गया, मगर कियारा की बात उसके मन में नहीं, आरोही के मन में चुभ गई।
दोस्तों, यहाँ यह समझना जरूरी है कि कियारा हमेशा से ऐसी नहीं थी।
कुछ वर्ष पहले वह हँसमुख और संवेदनशील लड़की हुआ करती थी। उसके जीवन में एक युवक आया था— रोहन मल्होत्रा ।
रोहन आकर्षक व्यक्तित्व वाला, मीठी बातें करने वाला और बड़े सपने दिखाने वाला युवक था। उसने कियारा को विश्वास दिलाया था कि वह अमेरिका में विशाल औषधि व्यापार स्थापित करेगा। उसने कहा था—
“जब मैं सफल होकर लौटूँगा, तो तुम्हारे पिता भी हमारे विवाह से इनकार नहीं कर पाएँगे।”
कियारा ने उस पर आँख बंद करके विश्वास किया।
उसने अपने पिता से छिपाकर उसे बड़ी रकम दी। कुछ धन उसने अपने नाम के संस्था अंश गिरवी रखकर जुटाया था।
लेकिन अमेरिका पहुँचने के बाद रोहन के संदेश कम होते गए।
फिर एक दिन उसका संपर्क पूरी तरह टूट गया।
कियारा ने महीनों उसका इंतजार किया। वह हर रात अपना दूरभाष यंत्र हाथ में लेकर बैठी रहती। फिर एक परिचित ने उसे बताया कि रोहन वहाँ किसी दूसरी स्त्री के साथ रह रहा है।
उस दिन कियारा के भीतर कुछ टूट गया।
उसने पहले नींद की गोलियाँ लेना शुरू किया। फिर चिंता कम करने वाली औषधियाँ। धीरे-धीरे एक भ्रष्ट चिकित्सक ने उसे ऐसी नशीली दवाओं का आदी बना दिया, जिनके बिना उसका शरीर काँपने लगता था।
वह अपनी पीड़ा छिपाने के लिए और अधिक कठोर होती गई।
एक शाम संस्था की स्थापना दिवस की बड़ी सभा थी। शहर के प्रतिष्ठित लोग वहाँ उपस्थित थे। कियारा को मंच पर भाषण देना था, लेकिन कार्यक्रम से पहले उसने नशीली दवा ले ली।
मंच पर जाते समय उसके कदम लड़खड़ा गए।
राजवर्धन ने उसे संभालना चाहा, मगर वह सबके सामने चिल्लाई—
“मुझे किसी की सहायता नहीं चाहिए!”
वह सभा से बाहर निकली और अपनी गाड़ी लेकर चली गई।
बाहर तेज वर्षा हो रही थी।
अर्जुन ने उसकी हालत देखी थी। उसने राजवर्धन से कहा, “मालिक, वह इस अवस्था में गाड़ी नहीं चला पाएँगी।”
राजवर्धन जब तक बाहर आते, कियारा जा चुकी थी।
अर्जुन संस्था की पुरानी मोटरसाइकिल लेकर उसके पीछे निकल पड़ा।
वर्षा इतनी तेज थी कि सड़क साफ दिखाई नहीं दे रही थी। कुछ दूर जाकर अर्जुन ने देखा कि कियारा की गाड़ी अनियंत्रित होकर एक निर्माणाधीन पुल की रेलिंग से टकरा गई।
गाड़ी का अगला हिस्सा नीचे की ओर लटक रहा था।
अर्जुन ने मोटरसाइकिल रोकी और दौड़कर पहुँचा।
कियारा भीतर बेहोश थी।
गाड़ी किसी भी क्षण नीचे नाले में गिर सकती थी।
अर्जुन ने शीशा तोड़ा। उसके हाथ से खून बहने लगा। उसने कियारा की सुरक्षा पट्टी खोली और उसे बाहर खींचने लगा।
जैसे ही वह उसे लेकर कुछ दूर पहुँचा, गाड़ी रेलिंग तोड़कर नीचे जा गिरी।
कियारा को होश आया तो उसने अर्जुन को अपने ऊपर झुका देखा।
कुछ देर बाद पुलिस और समाचारकर्मी पहुँच गए। गाड़ी के भीतर नशीली दवाओं का पैकेट मिला।
पुलिस अधिकारी ने पूछा, “गाड़ी कौन चला रहा था?”