भाग 1
दोस्तों, कुछ कहानियाँ समय के साथ समाप्त हो जाती हैं, लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जिनका अंत समय भी नहीं कर पाता। वे वर्षों तक धरती की गहराइयों में दबी रहती हैं और सही घड़ी आने पर फिर से जाग उठती हैं।
यह कहानी भी एक ऐसी ही रहस्यमयी स्त्री की है, जिसके लिए मनुष्य का पूरा जीवन केवल एक छोटी-सी ऋतु के बराबर था।
उत्तराखंड के पहाड़ों के बीच बसा देवगढ़ शहर बाहर से शांत दिखाई देता था। ऊँचे पहाड़, देवदार के घने जंगल और बादलों में छिपे पुराने मंदिर इस शहर की पहचान थे। मगर शहर के पूर्वी किनारे पर कई महीनों से एक विशाल होटल बनाने का काम चल रहा था।
उस सुबह मजदूर जमीन की खुदाई कर रहे थे कि अचानक एक मशीन का लोहे का दाँत किसी कठोर चीज से टकराया।
तेज आवाज हुई और आसपास की जमीन काँपने लगी।
मजदूरों ने काम रोक दिया।
“नीचे कोई बड़ी चट्टान है क्या?” एक मजदूर ने घबराकर पूछा।
ठेकेदार ने मशीन हटवाकर खुदाई करने का आदेश दिया। कुछ ही देर में मिट्टी के भीतर से पत्थर का एक विशाल दरवाजा दिखाई देने लगा। उसके ऊपर पुराने अक्षरों में कुछ लिखा था, मगर कोई उसे पढ़ नहीं पा रहा था।
निर्माण का मालिक हरिशंकर राठौड़ उसी समय वहाँ पहुँचा।
हरिशंकर देवगढ़ के पुराने व्यापारिक परिवार से था। कभी राठौड़ परिवार शहर के सबसे बड़े परिवारों में गिना जाता था, मगर पिछले कुछ वर्षों से उनका कारोबार लगातार घाटे में जा रहा था।
हरिशंकर ने पत्थर के उस दरवाजे को ध्यान से देखा।
“इसे खोलो,” उसने कहा।
“मालिक, अंदर कोई पुरानी समाधि भी हो सकती है,” ठेकेदार ने सावधान किया।
“इसीलिए तो देखना जरूरी है। शहर के अधिकारियों को बुलाने से पहले पता कर लेते हैं कि अंदर क्या है।”
मजदूरों ने लोहे की छड़ों से दरवाजा हटाने की कोशिश की। काफी मेहनत के बाद पत्थर का दरवाजा धीरे-धीरे खुला। अंदर से इतनी ठंडी हवा निकली कि सबके शरीर काँप उठे।
अंदर उतरती हुई लंबी सीढ़ियाँ थीं।
हरिशंकर ने एक टॉर्च ली और दो मजदूरों के साथ नीचे उतर गया।
सीढ़ियों के अंत में एक विशाल कक्ष था। चारों ओर पत्थर के दीपक बने थे, मगर किसी में तेल नहीं था। फिर भी कक्ष में हल्की नीली रोशनी फैली हुई थी।
कक्ष के बीचों-बीच काले पत्थर का एक चबूतरा था।
उस चबूतरे पर सफेद वस्त्र पहने एक युवती लेटी हुई थी।
उसका चेहरा इतना शांत था जैसे वह अभी-अभी सोई हो। उसके लंबे काले बाल चबूतरे से नीचे तक फैले हुए थे। उसके चेहरे पर न समय का कोई निशान था और न मृत्यु की कठोरता।
हरिशंकर उसके पास पहुँचा।
“यह जीवित है या…” एक मजदूर ने फुसफुसाते हुए पूछा।
हरिशंकर ने हाथ आगे बढ़ाया, मगर जैसे ही उसकी उँगलियाँ युवती की कलाई के पास पहुँचीं, पूरा कक्ष जोर से काँप उठा।
ऊपर की छत से पत्थर गिरने लगे।
“भागो!” मजदूर चिल्लाए।
दोनों मजदूर सीढ़ियों की ओर दौड़ गए। हरिशंकर भी पीछे मुड़ा, मगर उसके पैरों के नीचे का पत्थर टूट गया। वह संतुलन खोकर गहरी दरार की ओर गिरने लगा।
तभी किसी ने उसकी कलाई पकड़ ली।
हरिशंकर ने ऊपर देखा।
वही युवती, जो कुछ पल पहले चबूतरे पर निश्चल पड़ी थी, अब उसकी कलाई थामे खड़ी थी।
उसकी आँखें खुल चुकी थीं।
वे आँखें साधारण नहीं थीं। उनमें ऐसी गहराई थी जैसे हजारों वर्षों का समय उनके भीतर ठहरा हुआ हो।
युवती ने बिना किसी कठिनाई के हरिशंकर को ऊपर खींच लिया।
अगले ही पल पूरा कक्ष सफेद रोशनी से भर गया।
जब हरिशंकर ने दोबारा आँखें खोलीं, वह जमीन के ऊपर पड़ा था। मजदूर उसके आसपास खड़े थे और सफेद वस्त्र वाली वह युवती कुछ दूरी पर शांत भाव से आकाश को देख रही थी।
“आप कौन हैं?” हरिशंकर ने काँपती आवाज में पूछा।
युवती ने उसकी ओर देखा।
“यह कौन-सा वर्ष चल रहा है?”
हरिशंकर को प्रश्न अजीब लगा, मगर उसने वर्ष बता दिया।
युवती कुछ पल तक चुप रही।
“तो इस बार पचास वर्ष बीत गए,” उसने धीमे स्वर में कहा।
दोस्तों, हरिशंकर के लिए वह बात एक पहेली थी, लेकिन उस युवती के चेहरे पर ऐसा भाव था जैसे पचास वर्ष उसके लिए केवल एक लंबी रात रही हो।
हरिशंकर ने अपना परिचय दिया।
“मेरा नाम हरिशंकर राठौड़ है। आपने मेरी जान बचाई है। कृपया मुझे अपना नाम बताइए।”
युवती ने पहाड़ों की ओर देखते हुए कहा, “लोग मुझे अलग-अलग समय में अलग-अलग नामों से बुलाते रहे हैं। इस समय तुम मुझे ईशानी कह सकते हो।”
हरिशंकर ने उसे अपने घर चलने का आग्रह किया। ईशानी ने पहले कोई उत्तर नहीं दिया, मगर राठौड़ नाम सुनते ही उसकी आँखों में हल्का-सा परिवर्तन आया।
“राठौड़…” उसने जैसे किसी पुरानी स्मृति को दोहराया, “क्या केशव राठौड़ का रक्त अब भी जीवित है?”
हरिशंकर चौंक गया।
केशव राठौड़ उसके परदादा के पिता थे। उनकी मृत्यु लगभग पचास वर्ष पहले हुई थी।
“आप उन्हें कैसे जानती हैं?”
ईशानी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
“मुझे तुम्हारे घर चलना होगा।”
हरिशंकर उसे अपनी कार में लेकर राठौड़ भवन पहुँचा। यह भवन शहर के बाहरी हिस्से में बना एक बड़ा पुराना घर था। हरिशंकर की पत्नी का दो वर्ष पहले देहांत हो चुका था। घर में उसकी बेटी नैना, बहू रिया और कुछ नौकर रहते थे।
नैना ने खिड़की से अपने पिता को एक सुंदर युवती के साथ उतरते देखा तो उसके चेहरे का रंग बदल गया।
“पापा किसी लड़की को घर क्यों लाए हैं?” उसने रिया से पूछा।
रिया भी चौंक गई।
हरिशंकर ने दोनों को बैठक में बुलाकर बताया कि ईशानी ने उसकी जान बचाई है और कुछ समय तक वह उनके घर में रहेगी।
“घर में?” नैना ने तुरंत पूछा।
“हाँ। और इस घर में उन्हें पूरा सम्मान मिलेगा।”
नैना ने ईशानी को सिर से पैर तक देखा। ईशानी साधारण सफेद वस्त्रों में थी, लेकिन उसके व्यक्तित्व में ऐसी शांति और अधिकार था कि कोई भी उसके सामने सहज महसूस नहीं कर सकता था।
“इनका परिवार कहाँ है?” नैना ने पूछा।
“यह सवाल पूछना जरूरी नहीं,” हरिशंकर ने कठोर स्वर में कहा।
ईशानी ने नैना की ओर देखा, मगर कुछ नहीं बोली।
उसी शाम हरिशंकर ने अपने पुराने पुश्तैनी कागज निकाले। उनमें एक धुंधली तस्वीर थी जिसमें उसके परदादा केशव राठौड़ किसी सफेद वस्त्र पहने स्त्री के चरणों में बैठे थे।
तस्वीर बहुत पुरानी थी, मगर उस स्त्री का चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।
वह चेहरा बिल्कुल ईशानी जैसा था।
हरिशंकर देर तक तस्वीर को देखता रहा। उसने खुद को समझाया कि शायद यह केवल संयोग है।
अगली सुबह से ही राठौड़ परिवार की किस्मत बदलने लगी।
जो ग्राहक महीनों से भुगतान रोककर बैठे थे, उन्होंने अचानक पैसे भेज दिए। राठौड़ कपड़ा कंपनी को एक बहुत बड़ा आदेश मिला। एक बंद पड़ा गोदाम अच्छे दामों में किराए पर चला गया।
तीन दिनों में जितना लाभ हुआ, उतना पिछले छह महीनों में नहीं हुआ था।
हरिशंकर समझ गया कि ईशानी कोई सामान्य स्त्री नहीं है।
दूसरी ओर, नैना के मन में ईर्ष्या बढ़ती जा रही थी।
हरिशंकर ईशानी के लिए शहर से महँगी चीजें मँगवाता। कभी दुर्लभ चाय, कभी कश्मीरी कपड़ा और कभी पुराने मंदिरों से प्राप्त धूप।
ईशानी इन वस्तुओं को देखकर केवल इतना कहती, “पहले जैसी गुणवत्ता नहीं रही।”
यह सुनकर नैना को और क्रोध आता।
“माँ के रहते पापा ने उनके लिए इतनी महँगी चीजें नहीं खरीदीं,” उसने रिया से कहा, “और इस अनजान लड़की के लिए लाखों खर्च कर रहे हैं।”
रिया ने धीरे से कहा, “कहीं पापा उससे शादी करने की तो नहीं सोच रहे?”
यह बात नैना के मन में तीर की तरह लगी।
“ऐसा कभी नहीं होगा। यह घर और कारोबार मेरा है। मैं किसी बाहरी लड़की को सब कुछ नहीं लेने दूँगी।”
उधर उसी रात देवगढ़ के सबसे बड़े होटल में राज्य के प्रसिद्ध उद्योगपति देवेंद्र सूद के सम्मान में भव्य समारोह रखा गया था।
देवेंद्र सूद व्यापार मंडल का नया अध्यक्ष चुना गया था। शहर के बड़े व्यापारी उसके आसपास खड़े थे।
“बहुत जल्द सूद परिवार पूरे राज्य का सबसे अमीर परिवार होगा,” एक व्यापारी ने जाम उठाते हुए कहा।
देवेंद्र गर्व से मुस्कराया।
उसी समय होटल के विशाल दरवाजे खुल गए।
सफेद साड़ी पहने ईशानी भीतर आई।
हॉल में अचानक ऐसी शांति छा गई जैसे किसी ने सबकी आवाज छीन ली हो।
ईशानी सीधे देवेंद्र के सामने पहुँची।
“देवेंद्र सूद।”
कई लोग चौंक गए। शहर में कोई उसे पूरे नाम से बुलाने की हिम्मत नहीं करता था।
देवेंद्र ने आँखें सिकोड़कर पूछा, “तुम कौन हो?”
“पचास वर्ष पहले भागीरथी नदी में चल रहे जहाज पर एक भोज हुआ था। क्या तुम्हें वह रात याद है?”
देवेंद्र के हाथ में पकड़ा प्याला हल्का-सा काँप गया।
ईशानी आगे बोली, “उस रात केशव राठौड़ और उसके परिवार के बाईस लोगों को मार दिया गया था। जहाज में आग लगाकर उसे दुर्घटना बताया गया। उनकी संपत्ति पर कब्जा करके तुमने अपने व्यापार की नींव रखी।”
देवेंद्र का चेहरा पीला पड़ गया, मगर उसने तुरंत खुद को संभाल लिया।
“तुम राठौड़ परिवार की कोई बची हुई संतान हो?”
“नहीं।”
ईशानी की आँखें शांत थीं।
“वे मेरे सेवक थे।”
हॉल में मौजूद लोग हँस पड़े।
एक युवक बोला, “लगता है कोई पागल लड़की समारोह में घुस आई है।”
देवेंद्र ने भी व्यंग्य से कहा, “तुम्हारी उम्र मुश्किल से पच्चीस वर्ष होगी और पचास वर्ष पहले मारे गए लोग तुम्हारे सेवक थे?”
ईशानी ने कहा, “मनुष्य अपनी छोटी आयु से समय को मापता है। समय मुझे नहीं मापता।”
देवेंद्र का धैर्य टूटने लगा।
“आज मेरे सम्मान का दिन है। तुमने यहाँ आकर मेरा अपमान किया है। घुटनों पर बैठकर मुझे जाम पेश करो और क्षमा माँगो। शायद मैं तुम्हें जीवित जाने दूँ।”
ईशानी ने मेज से शराब का प्याला उठा लिया।
देवेंद्र के चेहरे पर विजयी मुस्कान आई।
मगर ईशानी ने प्याला उसके सामने रखने के बजाय शराब भूमि पर उँडेल दी।
“आकाश साक्षी रहे, धरती साक्षी रहे। केशव राठौड़ के रक्त का ऋण आज चुकाया जाए। देवेंद्र सूद और उसके अपराध में भागीदार पूरे वंश का जीवन आज समाप्त हो।”
उसी क्षण बाहर जोरदार बिजली चमकी।
साफ आकाश के बावजूद होटल की छत के ऊपर काले बादल जमा हो गए।
देवेंद्र ने हँसने की कोशिश की।
“तुम्हें लगता है कुछ शब्द बोलकर तुम मुझे मार सकती हो?”
ईशानी मुड़ गई।
“मृत्यु आने से पहले मनुष्य अक्सर यही सोचता है।”
उसके बाहर निकलते ही होटल की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।
कुछ पल बाद जब रोशनी लौटी, देवेंद्र अपनी कुर्सी पर बैठा था। उसकी आँखें खुली थीं, मगर शरीर में कोई हलचल नहीं थी।
चिकित्सक को बुलाया गया।
देवेंद्र मर चुका था।
उसी रात सूद परिवार के एक सदस्य की कार पहाड़ी से गिर गई। दूसरे के घर में आग लग गई। तीसरे को अचानक दिल का दौरा पड़ा। सुबह होने से पहले परिवार के सत्रह सदस्य अलग-अलग घटनाओं में मारे जा चुके थे।
शहर में भय फैल गया।
समाचारों में इसे अजीब संयोग कहा गया, मगर कुछ बूढ़े लोग समझ गए थे कि पचास वर्ष पुराना न्याय लौट आया है।
ईशानी शांत भाव से राठौड़ भवन वापस आ गई।
हरिशंकर ने पूछा, “आप कहाँ गई थीं?”
ईशानी ने केवल इतना कहा, “तुम्हारे पूर्वजों का एक अधूरा काम पूरा करने।”
अगले दिन हरिशंकर को व्यापार के काम से दो दिनों के लिए दिल्ली जाना पड़ा।
जाने से पहले उसने नैना और रिया को साफ चेतावनी दी।
“ईशानी जी के साथ कोई बदतमीजी नहीं होगी। वे मेरी जान बचाने वाली हैं। उन्हें जो चाहिए, वह दिया जाए।”
नैना ने मुस्कराकर कहा, “आप चिंता मत कीजिए पापा। हम उनका बहुत ध्यान रखेंगे।”
हरिशंकर के जाते ही उसका चेहरा बदल गया।
उसने रिया को अपने कमरे में बुलाया और दराज से एक सुंदर शीशी निकाली।
“इसमें क्या है?” रिया ने पूछा।
“चेहरे पर लगाने वाला लेप। इसमें तेजाब मिला हुआ है। एक बार लगाने के बाद उसका सुंदर चेहरा हमेशा के लिए बिगड़ जाएगा।”
रिया घबरा गई।
“नैना, यह बहुत खतरनाक है।”
“उसकी सुंदरता ही उसकी ताकत है। चेहरा बिगड़ जाएगा तो पापा खुद उसे बाहर निकाल देंगे।”
दोनों ईशानी के कमरे में पहुँचीं।
नैना ने मीठी आवाज में कहा, “पापा ने आपके लिए यह खास लेप मँगवाया था। शहर की बड़ी महिलाएँ इसे इस्तेमाल करती हैं।”