भाग 4
वह बात केवल उसके और काव्या के बीच हुई थी।
ईशानी आगे बढ़ी।
“पिछले बारह वर्षों में तुमने पांडुलिपि से तीन सौ चौदह प्रश्न पूछे। हर उत्तर के बदले तुम्हारे परिवार की जीवन-शक्ति कम हुई। तुम्हारे बगीचे का पहला पेड़ सात वर्ष पहले सूखा था। उसी रात तुम्हारे बड़े भाई की नवजात बेटी मरी थी।”
काव्या के हाथ काँपने लगे।
“यह सब इन्हें कैसे पता है?”
राजवीर ने खुद को संभाला।
“तुमने किसी से जानकारी प्राप्त की होगी।”
ईशानी ने मेज पर रखा चाय का प्याला उठाया।
उसने एक बूँद हवा में उछाली।
राजवीर का सबसे ताकतवर अंगरक्षक अचानक कई कदम पीछे उड़कर दीवार से टकराया।
बाकी लोग डरकर पीछे हट गए।
ईशानी ने कहा, “मैं तुम्हें अपनी पहचान साबित करने नहीं आई। मैं तुम्हें घुटनों पर लाने आई हूँ।”
राजवीर खड़ा हो गया।
“मेरे पिता तुमसे अधिक योग्य थे। फिर भी तुमने इन तीन कमजोर परिवारों को चुना। आज चौहान परिवार की संपत्ति इन तीनों के कुल धन से दस गुना अधिक है। क्या अब भी मानोगी कि तुम्हारा निर्णय सही था?”
ईशानी ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारे पिता बुद्धिमान थे, मगर सेवा के योग्य नहीं थे।”
“क्यों?”
“क्योंकि वे मेरे साथ चलना नहीं चाहते थे। वे मेरी शक्ति के सहारे दूसरों पर शासन करना चाहते थे।”
राजवीर ने क्रोध से कहा, “और ये तीनों योग्य थे?”
“ये पूर्ण नहीं थे। ये लालची भी हुए, डरे भी और गलतियाँ भी कीं। मगर इनके भीतर किसी दूसरे का अधिकार छीनकर खुद को महान साबित करने की इच्छा नहीं थी।”
“मैंने केवल यह सिद्ध किया कि चौहान परिवार उनसे बेहतर है।”
ईशानी का स्वर कठोर हो गया।
“तुमने कुछ सिद्ध नहीं किया। तुमने केवल यह दिखाया कि तुम उनसे अधिक निर्दयी हो।”
वे शब्द राजवीर के भीतर उतर गए।
उसे पहली बार अपने पिता की पूरी जिंदगी दिखाई दी।
नरेंद्र चौहान ने सफलता नहीं चाही थी। वह ईशानी से स्वीकृति चाहता था। जब वह स्वीकृति नहीं मिली, तो उसने अपनी पूरी पीढ़ी को बदले की आग में डाल दिया।
राजवीर की आँखें राख बनी पांडुलिपि पर गईं।
“क्या मेरे परिवार के बच्चों की मृत्यु इसी कारण हुई?”
“हाँ। हर भविष्यवाणी ने उनकी आयु ली। अब पांडुलिपि जल चुकी है। तुम्हारे परिवार की जीवन-रेखा टूट गई है। तीन दिनों में चौहान वंश समाप्त हो जाएगा।”
काव्या रोते हुए ईशानी के सामने झुक गई।
“स्वामिनी, परिवार के सभी लोग दोषी नहीं हैं। नवजात बच्चों ने कोई अपराध नहीं किया।”
राजवीर ने भी पहली बार अपना सिर झुकाया।
“मैं तीनों परिवारों की सारी संपत्ति लौटाऊँगा। मैंने जो लिया, उसका दोगुना दूँगा। मेरे जीवन के बदले मेरे परिवार को बचा लीजिए।”
गोविंद ने महेंद्र की ओर देखा।
महेंद्र बोला, “इसने हमारे साथ बहुत बुरा किया है। मगर इसके परिवार के बच्चों का अपराध नहीं।”
ईशानी ने राजवीर से पूछा, “तुम अपना जीवन देने को तैयार हो?”
“हाँ।”
“केवल शब्दों में?”
राजवीर ने अपनी तलवार उठाकर उसके चरणों में रख दी।
“मेरे पिता के अहंकार और मेरे अपराधों का मूल्य मेरे जीवन से लिया जाए।”
ईशानी ने कुछ देर तक उसे देखा।
“जिसने अपराध किया, दंड उसे ही मिलना चाहिए। लेकिन परिवार को बचाने के लिए केवल तुम्हारा मरना काफी नहीं होगा। वर्षों से जमा मृत ऊर्जा को शुद्ध करना पड़ेगा।”
उसने चौहान परिवार को दो दिन का समय दिया।
पहली शर्त थी कि तीनों सेवक परिवारों की सारी संपत्ति उसी दिन वापस की जाए।
दूसरी शर्त थी कि चौहान परिवार के हर सदस्य को अपने हाथ से पश्चाताप के शब्द लिखने होंगे। कुल दस हजार पन्ने पूरे होने थे।
तीसरी शर्त थी कि पुराने शिव मंदिर से सौ वर्ष पुराना पवित्र जल लाकर बंद पात्र में रखा जाए। उस जल की एक बूँद भी कम नहीं होनी चाहिए।
“तीसरे दिन मैं अनुष्ठान करूँगी,” ईशानी ने कहा, “पर किसी ने छल किया तो पूरा परिवार अपने भाग्य पर छोड़ दिया जाएगा।”
राजवीर ने तुरंत आदेश जारी किए।
वर्मा, ठाकुर और मेहरा परिवारों की हवेलियाँ, खदानें और कंपनियाँ वापस की जाने लगीं।
चौहान भवन के बड़े कक्ष में परिवार के सभी लोग बैठकर पश्चाताप लिखने लगे।
कुछ लोग सच्चे मन से लिख रहे थे, मगर कुछ के चेहरों पर क्रोध था।
“हमने क्या अपराध किया है?” एक चाचा ने कहा, “राजवीर ने जो किया, उसकी सजा हम क्यों भुगतें?”
राजवीर ने पहली बार अपने परिवार पर कठोरता दिखाई।
“क्योंकि तुम सबने उस संपत्ति का लाभ लिया था।”
उसकी पत्नी साक्षी अपने एक महीने के बीमार बेटे वेद को गोद में लेकर बैठी थी। बच्चे को रक्त की गंभीर बीमारी थी और चिकित्सकों ने उसके बचने की आशा लगभग छोड़ दी थी।
रात को साक्षी ने सुना कि पवित्र जल में जीवन बचाने की शक्ति हो सकती है।
उसका मातृत्व उसके भय पर भारी पड़ गया।
वह चुपके से मंदिर वाले कक्ष में पहुँची। पात्र से एक छोटी चम्मच जल निकाला और बच्चे को पिला दिया।
वेद की साँस तुरंत सामान्य होने लगी।
साक्षी की आँखों में आशा जग गई।
मगर पात्र में जल कम हो गया था।
कमी छिपाने के लिए उसने उसमें सामान्य पानी मिला दिया।
अगले दिन दस हजार पन्ने पूरे हो गए।
राजवीर ने अपने सारे अधिकार काव्या के नाम करने शुरू कर दिए।
“मेरे बाद परिवार को संभालना,” उसने कहा।
काव्या रो पड़ी।
“शायद स्वामिनी आपको क्षमा कर दें।”
“मैंने क्षमा पाने के लिए यह सब नहीं किया। पहली बार सही काम करने के लिए कर रहा हूँ।”
तीसरे दिन ईशानी ने भवन के आँगन में अनुष्ठान आरंभ किया।
चारों दिशाओं में दीपक रखे गए। बीच में पवित्र जल का पात्र था। परिवार के सभी सदस्य सफेद वस्त्र पहनकर बैठे थे।
ईशानी ने मंत्र बोलकर पात्र उठाया।
जैसे ही उसने जल की पहली बूँद अग्नि में डाली, अग्नि हरी हो गई।
आकाश में बिजली चमकने लगी।
ईशानी का चेहरा कठोर हो गया।
“जल को किसने छुआ?”
सब चुप रहे।
राजवीर ने परिवार की ओर देखा।
“सच बताओ!”
साक्षी काँपती हुई आगे आई।
“मैंने थोड़ी-सी बूँद वेद को पिला दी थी। वह मर रहा था। फिर मैंने कमी छिपाने के लिए सामान्य पानी मिला दिया।”
राजवीर की आँखें बंद हो गईं।
“तुमने हमें अंतिम अवसर से वंचित कर दिया।”
साक्षी रोते हुए बोली, “मैं एक माँ हूँ। अपने बच्चे को मरते हुए कैसे देखती?”
ईशानी ने कहा, “तुम्हारा अपने बच्चे को बचाना अपराध नहीं था। अपराध था छल करना। तुम मुझे बता सकती थीं। लेकिन तुमने सोचा कि मुझे धोखा दिया जा सकता है।”
परिवार के कई लोग साक्षी पर चिल्लाने लगे।
ईशानी ने हाथ उठाकर सबको शांत किया।
“तुममें से किसी को उसे दोष देने का अधिकार नहीं। तुम सबने भी केवल मृत्यु के भय से पश्चाताप लिखा है।”
एक वृद्ध बोला, “हमने आपकी हर शर्त पूरी की। संपत्ति भी दे दी। क्या एक बूँद पानी के कारण आप पूरे परिवार को मरने देंगी?”
ईशानी ने उसकी ओर देखा।
“तुमने संपत्ति मुझे नहीं दी। उसे असली मालिकों को लौटाया है। चोरी की वस्तु वापस करना दान नहीं होता।”
दूसरा व्यक्ति बोला, “आधी जिंदगी की कमाई चली गई। अब और क्या चाहिए?”
ईशानी ने आँखें बंद कर लीं।
“यही कारण है कि अनुष्ठान असफल हुआ। तुम्हें अभी भी लगता है कि वह संपत्ति तुम्हारी थी।”
वह जाने के लिए मुड़ी।
राजवीर उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।
“स्वामिनी, मेरे परिवार को एक और अवसर दीजिए।”
“अवसर दिया जा चुका था।”
“मेरा जीवन ले लीजिए।”
“तुम्हारा जीवन पहले ही तय हो चुका है।”
काव्या भी ईशानी के सामने बैठ गई।
“मैं परिवार को बचाने की प्रार्थना नहीं करूँगी। आपने हमें चेतावनी दी, फिर भी हम सच्चे नहीं बन सके। मैं केवल इतना चाहती हूँ कि वेद को उसकी माँ के छल का दंड न मिले।”
ईशानी ने पहली बार उसकी ओर नरमी से देखा।
“तुम अपने लिए कुछ नहीं माँगोगी?”
“नहीं। यदि हमारे कर्मों का अंत यही है, तो मैं उसे स्वीकार करती हूँ।”
ईशानी ने अपनी हथेली खोली।
उसमें दो छोटी लकड़ी की अंगूठियाँ थीं।
एक उसने काव्या को दी और दूसरी वेद की छोटी कलाई में पहना दी।
“तुम दोनों इस विनाश से सुरक्षित रहोगे।”
साक्षी ने पूछा, “और मैं?”
ईशानी ने कहा, “तुम्हारा पुत्र जीवित रहेगा। मगर छल का परिणाम तुम्हें स्वीकार करना होगा।”
राजवीर ने सिर झुका लिया।
“धन्यवाद, स्वामिनी। कम से कम चौहान परिवार का रक्त पूरी तरह समाप्त नहीं होगा।”
रात होते ही चौहान भवन के ऊपर काले बादल जमा हो गए।
तेज हवा चलने लगी।
परिवार के लोग अलग-अलग कमरों में बंद हो गए, मगर मृत्यु के लिए दरवाजों का कोई अर्थ नहीं था।
कहीं बिजली गिरी, कहीं दीवार ढही, कहीं अचानक आग लगी। कुछ लोगों की साँस सोते-सोते रुक गई। कुछ वाहन दुर्घटना में मारे गए।
सुबह होने तक चौहान परिवार के तिरपन सदस्य मर चुके थे।
राजवीर मुख्य आँगन में मृत मिला। उसके चेहरे पर भय नहीं था। उसके हाथ में अपने पिता की पुरानी तस्वीर थी।
साक्षी ने वेद को काव्या की गोद में दिया और खुद बंद होते हुए दरवाजे के पीछे चली गई।
कुछ देर बाद कमरे से कोई आवाज नहीं आई।
काव्या और वेद पूरे भवन में केवल दो जीवित लोग बचे थे।
ईशानी दूर पहाड़ी पर खड़ी उगते सूर्य को देख रही थी।
गोविंद ने पूछा, “क्या चौहान परिवार का दंड पूरा हो गया?”
“हाँ।”
महेंद्र ने कहा, “राजवीर अंत में बदल गया था।”
“मनुष्य के भीतर परिवर्तन की संभावना अंतिम साँस तक रहती है। इसलिए उसके पुत्र को जीवन मिला।”
राजनाथ ने पूछा, “अब आप हमारे साथ रहेंगी?”
ईशानी ने तीनों बूढ़ों को देखा।
“तुम्हें मेरी छाया में रहने की आवश्यकता नहीं। मैंने तुम्हें संपत्ति सँभालने के लिए चुना था, मेरे नाम पर लड़ने के लिए नहीं।”
गोविंद ने बच्चे की तरह कहा, “आप फिर से सोने चली जाएँगी?”
“अभी नहीं।”
हरिशंकर भी वहाँ पहुँच चुका था। दुर्घटना में बचने के बाद उसने राठौड़ परिवार की बची हुई संपत्ति का एक हिस्सा अनाथ बच्चों और गरीब परिवारों के लिए दान कर दिया था।
वह ईशानी के सामने झुका।
“स्वामिनी, मुझे सेवा का अवसर दीजिए।”
ईशानी ने कहा, “सेवा मेरे पीछे चलने का नाम नहीं। अपने अधिकार में आए लोगों की रक्षा करना ही सच्ची सेवा है।”
उसने चारों परिवारों को उनकी जिम्मेदारियाँ सौंप दीं।
वर्मा परिवार जरूरतमंदों के उपचार में सहायता करेगा।
ठाकुर परिवार किसी कमजोर व्यक्ति की जमीन बलपूर्वक नहीं खरीदेगा।
मेहरा परिवार दिव्य वस्तुओं को धन कमाने का साधन नहीं बनाएगा।
राठौड़ परिवार अपने व्यापार का एक हिस्सा उन परिवारों के नाम रखेगा जिनके पूर्वज सूद परिवार के अपराधों में मारे गए थे।
सभी ने सिर झुकाकर वचन दिया।
ईशानी वहाँ से जाने लगी।
गोविंद ने पीछे से पुकारा, “स्वामिनी, क्या हम आपको फिर देखेंगे?”
ईशानी ने मुड़कर हल्की मुस्कान दी।
“तुम्हारे लिए शायद कई वर्ष बीत जाएँ। मेरे लिए शायद केवल एक रात।”
वह सफेद धुंध के बीच आगे बढ़ती चली गई।
कुछ ही पलों में उसका शरीर धुंध में विलीन हो गया।
दोस्तों, लोग कहते हैं कि उसके बाद देवगढ़ शहर में कई वर्षों तक शांति रही। चारों परिवार फिर से समृद्ध हुए, मगर इस बार उन्होंने अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने के बजाय उनकी सहायता करने में किया।
काव्या ने वेद को अपने बेटे की तरह पाला। बड़ा होकर वेद एक चिकित्सक बना और उसने गरीब बच्चों के उपचार के लिए बड़ा अस्पताल बनवाया।
हरिशंकर ने अपनी सुरक्षा-अंगूठी कभी हाथ से नहीं उतारी।
लेकिन कहानी यहीं पूरी नहीं होती।
देवगढ़ से हजारों किलोमीटर दूर समुद्र के बीच एक पुराने द्वीप पर पत्थर का मंदिर था।
उस मंदिर में एक वृद्ध साधु वर्षों से ध्यान में बैठा था।
अचानक उसके सामने रखी लकड़ी की अंगूठी चमक उठी।
साधु ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
उसकी आँखों में भय और प्रसन्नता दोनों थे।
उसने आकाश की ओर देखते हुए कहा—
“स्वामिनी ईशानी… तो आप सच में लौट आई हैं।”
मंदिर के बाहर समुद्र की लहरें अचानक शांत हो गईं।
आकाश में सफेद पक्षियों का झुंड उड़ता हुआ दिखाई दिया।
और धरती के किसी अनजान कोने में ईशानी एक बार फिर आगे बढ़ रही थी।
क्योंकि जहाँ भी निर्दोषों की पुकार अधूरी रह जाती थी, वहाँ किसी न किसी दिन जीवन और मृत्यु की वह स्वामिनी अवश्य पहुँचती थी।