भाग 2
ईशानी ने डिब्बे की ओर देखा।
उसकी आँखों में एक पल के लिए सुनहरी चमक उभरी।
“तुम्हारे पिता ने भेजा है?”
“हाँ।”
“वहीं रख दो।”
नैना और रिया बाहर चली गईं।
रात को नैना बार-बार ईशानी के कमरे की ओर देखती रही। मगर कोई चीख सुनाई नहीं दी।
सुबह जब वह अपने कमरे में पहुँची, उसने देखा कि उसके मेज पर वैसी ही एक शीशी रखी है। उसे लगा रिया ने उसके लिए भी मँगवाई होगी।
उसने लेप अपने चेहरे पर लगा लिया।
कुछ ही क्षणों में उसका चेहरा जलने लगा।
नैना दर्द से चीख उठी।
रिया दौड़कर आई।
“मेरा चेहरा! इसे हटाओ!”
पानी डालने के बाद भी जलन नहीं रुकी। चेहरे पर लाल और काले घाव उभर आए।
रिया ने शीशी सूँघी और घबरा गई।
“यह तो वही तेजाब वाला लेप है।”
नैना समझ गई कि ईशानी ने डिब्बा बदल दिया था।
“उसने जानबूझकर मेरा चेहरा जला दिया। मैं उसे नहीं छोड़ूँगी।”
दोपहर को नैना की नानी मालती देवी घर पहुँच गईं। नैना ने रोते हुए पूरी घटना उलटी करके सुनाई।
उसने कहा कि ईशानी ने जलन वाला लेप उसके कमरे में रख दिया था।
मालती देवी पहले ही ईशानी को हरिशंकर की प्रेमिका मान चुकी थीं।
“एक बाहरी लड़की ने मेरी नातिन का चेहरा बिगाड़ दिया और वह इस घर में आराम से रह रही है?”
मालती देवी ने ईशानी को बैठक में बुलवाया।
ईशानी धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरी।
मालती देवी ने उसे देखते ही कहा, “चेहरा तो सच में किसी जादूगरनी जैसा है। इसी चेहरे से तुमने मेरे दामाद को फँसाया है?”
ईशानी शांत रही।
“हरिशंकर ने तुम्हें नहीं बताया कि मैं कौन हूँ?”
“तुम कौन हो, यह मैं अच्छी तरह जानती हूँ। अमीर घरों में घुसकर विधुर पुरुषों को फँसाने वाली लड़की।”
ईशानी ने मालती देवी को ध्यान से देखा।
“तुम्हारी जीभ तुम्हारे भाग्य से अधिक तेज चल रही है।”
मालती देवी क्रोधित हो गईं।
“नैना के सामने घुटनों पर बैठकर क्षमा माँगो। फिर उसे अपने हाथ से चाय परोसोगी।”
ईशानी ने कहा, “मेरे हाथ से दी गई चाय सामान्य नहीं होती।”
नैना हँसी।
“चाय में भी जादू करोगी?”
“जब मैं किसी को प्याला देती हूँ, तब आकाश और धरती उसके जीवन का निर्णय करते हैं। तुम्हारे शरीर में कोई जानलेवा रोग नहीं है। तुम्हारे भाग्य में इस समय जीवन माँगने का अवसर नहीं है। इसलिए केवल मृत्यु माँगी जा सकती है।”
मालती देवी ने मेज पर हाथ मारा।
“बहुत हुआ यह नाटक। चाय परोसो।”
ईशानी ने आखिरी बार पूछा, “तुम तीनों सच में यह प्याला चाहती हो?”
मालती देवी, नैना और रिया ने एक-दूसरे को देखा।
“हाँ,” नैना बोली, “और मेरे सामने झुककर क्षमा भी माँगो।”
ईशानी ने चाय का प्याला उठाया।
“मैं किसी मनुष्य के सामने नहीं झुकती।”
उसने चाय भूमि पर डाल दी।
“आकाश और धरती के द्वार खुलें। इन तीनों के कर्मों का मूल्य इनके जीवन से लिया जाए।”
अचानक घर के सारे दरवाजे बंद हो गए।
खिड़कियों के बाहर काले बादल छा गए।
झूमर जोर से हिलने लगा।
रिया ने घबराकर कहा, “यह क्या हो रहा है?”
अगले ही पल झूमर का एक हिस्सा टूटकर जमीन पर गिरा।
मालती देवी ने खुद को संभालते हुए कहा, “पुराना झूमर था। कोई जादू नहीं हुआ।”
बिजली चली गई।
एक नौकर तेल का दीपक और लाइटर लेकर आया।
मालती देवी ने लाइटर जलाने की कोशिश की। जैसे ही चिंगारी निकली, लाइटर उनके चेहरे के सामने फट गया।
वह चीखते हुए पीछे गिर पड़ीं।
“मेरी आँखें! मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा!”
रिया दौड़कर उनकी ओर गई, मगर उसका पैर कालीन में उलझ गया। वह मेज के नुकीले कोने से टकराई और जमीन पर गिर गई।
नैना ने उसे उठाने की कोशिश की।
“रिया! आँखें खोलो!”
रिया की साँस बंद हो चुकी थी।
ईशानी ने शांत स्वर में कहा, “पहला जीवन लिया जा चुका है।”
नैना काँपने लगी।
उसी समय छत से पत्थर का एक भारी टुकड़ा सीधे उसके ऊपर गिरा। उसने आँखें बंद कर लीं, मगर उसके हाथ में पहनी पुरानी लकड़ी की अंगूठी अचानक चमकी।
पत्थर उसके सिर से कुछ इंच दूर दिशा बदलकर गिर गया।
अंगूठी बीच से टूट गई।
ईशानी ने नैना के हाथ की ओर देखा।
“यह सुरक्षा-अंगूठी मैंने केशव राठौड़ को दी थी। उसने इसे अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा। आज इसने तुम्हें एक बार बचा लिया।”
नैना की आँखें भय से फैल गईं।
“आपने दी थी? मगर यह अंगूठी पचास वर्ष से भी पुरानी है।”
“इसीलिए तुम्हें चेतावनी दी थी कि हर युवा चेहरा कम आयु का नहीं होता।”
ईशानी ऊपर अपने कमरे में गई। उसने चंदन की पेटी खोली और देखा कि भीतर रखी दिव्य पांडुलिपि टुकड़ों में फटी पड़ी है।
नैना पहले उसके कमरे में जाकर उसे साधारण कागज समझकर नष्ट कर चुकी थी।
ईशानी ने टुकड़ों को हाथ में उठाया।
“मैं यह तुम्हारे पिता को देकर जाना चाहती थी। इससे राठौड़ परिवार सौ वर्षों तक अपने शुभ और अशुभ समय को पहचान सकता था।”
नैना के होंठ काँपने लगे।
ईशानी ने उसके पास से गुजरते हुए कहा, “तुमने केवल कागज नहीं फाड़ा। तुमने अपने परिवार का भविष्य फाड़ दिया है।”
उसने एक छोटा पत्र लिखा और नौकर को देते हुए कहा, “यह हरिशंकर को दे देना।”
“आप कहाँ जा रही हैं?”
“राठौड़ परिवार के साथ मेरा संबंध समाप्त हो चुका है।”
दोस्तों, जिस घर में ईशानी के कदम पड़ते ही धन की वर्षा होने लगी थी, उसी घर के दरवाजे से जब वह बाहर निकली तो आकाश पर ऐसे बादल छा गए जैसे भाग्य स्वयं उस घर से विदा हो रहा हो।
और कहानी का असली रहस्य तो अभी शुरू ही हुआ था।
दिल्ली में हरिशंकर को आधी रात को नैना का फोन आया।
उसकी आवाज काँप रही थी।
“पापा… रिया मर गई। नानी की आँखें चली गईं।”
हरिशंकर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
“ईशानी जी कहाँ हैं?”
नैना कुछ पल चुप रही।
“वह चली गई।”
“चली गई? क्यों?”
“उन्होंने ही सब किया है। उन्होंने हमें श्राप दिया था।”
हरिशंकर का दिल जोर से धड़कने लगा।
वह उसी समय देवगढ़ के लिए निकल पड़ा।
अस्पताल पहुँचने पर उसने रिया के शव को देखा। मालती देवी की आँखों पर पट्टी बँधी थी और नैना का चेहरा पट्टियों से ढका था।
“यह सब कैसे हुआ?” उसने पूछा।
मालती देवी तुरंत बोलीं, “उस लड़की ने हमें मारने की कोशिश की। मैंने केवल उसे नैना से क्षमा माँगने को कहा था।”
हरिशंकर ने नैना की ओर देखा।
“सच बताओ।”
नैना रोने लगी।
“उसने मेरा चेहरा जलाया।”
हरिशंकर को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ।
उसने घर के नौकर को फोन करके निगरानी कैमरे की रिकॉर्डिंग अस्पताल मँगवाई।
कुछ देर बाद कंप्यूटर पर रिकॉर्डिंग चलाई गई।
नैना और रिया साफ दिखाई दे रही थीं। वे तेजाब वाले लेप की शीशी लेकर ईशानी के कमरे की ओर जा रही थीं।
हरिशंकर के चेहरे पर क्रोध उभर आया।
“तुम दोनों ने यह किया था?”
नैना ने सिर झुका लिया।
रिकॉर्डिंग आगे बढ़ी, मगर जैसे ही ईशानी चित्र में आती, स्क्रीन पूरी तरह काली हो जाती।
फिर कुछ पल बाद बाकी लोग दिखाई देने लगते।
हरिशंकर ने होटल के एक परिचित अधिकारी को फोन किया और देवेंद्र सूद के समारोह की रिकॉर्डिंग मँगवाई।
वहाँ भी वही हुआ था।
जिस समय ईशानी हॉल में थी, कैमरे में केवल काला पर्दा दिखाई दे रहा था।
हरिशंकर को अपने पुराने पुश्तैनी कागज याद आए।
वह घर गया और वह तस्वीर लेकर आया जिसमें केशव राठौड़ सफेद वस्त्र वाली स्त्री के चरणों में बैठे थे।
तस्वीर में दिख रही स्त्री और ईशानी के चेहरे में एक रेखा का भी अंतर नहीं था।
हरिशंकर के हाथ काँपने लगे।
नौकर ने उसे ईशानी का पत्र दिया।
उसमें केवल दो पंक्तियाँ लिखी थीं—
“राठौड़ परिवार के साथ मेरा स्वामी और सेवक का संबंध समाप्त हुआ। अपने कर्मों से सावधान रहना।”
हरिशंकर की आँखों से आँसू निकल आए।
उसे अपने दादा की कही बातें याद आने लगीं।
बचपन में दादा कहा करते थे कि राठौड़ परिवार की समृद्धि उनके व्यापार से नहीं, बल्कि एक दिव्य स्वामिनी की कृपा से आई थी। वह स्त्री कभी बूढ़ी नहीं होती थी। वह कई दशकों तक सोती और फिर अचानक लौट आती।
हरिशंकर ने तब उन बातों को कहानी समझा था।
अब उसके सामने सत्य खड़ा था।
वह अस्पताल लौटकर मालती देवी के सामने खड़ा हुआ।
“आपको पता है आपने किसका अपमान किया है?”
“उस धोखेबाज लड़की का?”
हरिशंकर ने गुस्से में कहा, “वह हमारे परिवार की स्वामिनी हैं। हमारे पूर्वज जिनके चरणों में बैठना अपना सम्मान समझते थे।”
नैना ने अविश्वास से पूछा, “वह इतनी जवान हैं।”
“उनकी तस्वीर पचास वर्ष पुरानी है। चेहरा आज भी वैसा ही है। कैमरे उन्हें दर्ज नहीं कर सकते। उनके घर में आने के बाद हमारा कारोबार रातोंरात बढ़ गया। और तुमने उन्हें लालची लड़की समझकर तेजाब भेज दिया?”
नैना का शरीर काँपने लगा।
हरिशंकर ने आगे कहा, “जिस दिव्य पांडुलिपि को तुमने फाड़ा, वह हमारे परिवार को सौ वर्षों तक बचा सकती थी।”
मालती देवी ने कमजोर स्वर में पूछा, “क्या वह हमारी जान बचा सकती हैं?”
“आपने उन्हें चाय परोसने को मजबूर किया था?”
नैना ने सिर हिला दिया।
हरिशंकर का चेहरा सफेद पड़ गया।
“दादा बताते थे कि स्वामिनी जब किसी के लिए प्याला भूमि पर चढ़ाती हैं, तो आकाश और धरती उसके जीवन का निर्णय करते हैं। फैसला होने के बाद उसे कोई मनुष्य नहीं बदल सकता।”
नैना रोते हुए हरिशंकर के पैरों में गिर गई।
“पापा, हमें उनके पास ले चलिए। हम क्षमा माँगेंगे।”
मालती देवी ने पहले विरोध किया।
“मैं इतनी उम्र में किसी जवान लड़की के सामने घुटनों पर नहीं बैठूँगी।”
हरिशंकर ने कठोर स्वर में कहा, “तो मृत्यु की प्रतीक्षा कीजिए।”
उधर ईशानी अकेली पुराने शहर की गलियों से गुजर रही थी।
उसे उस संसार को देखे पचास वर्ष हो चुके थे। अब सड़कों पर दौड़ती कारें थीं, हर हाथ में मोबाइल था और ऊँची इमारतों पर चमकते विज्ञापन।
फिर भी मनुष्य का स्वभाव नहीं बदला था।
अहंकार पहले भी था। लालच पहले भी था। अंतर केवल वस्त्रों और साधनों का था।
वह शहर के बाहरी इलाके में पहुँची तो सड़क किनारे कुछ लड़के एक बूढ़े भिखारी को परेशान कर रहे थे।
बूढ़े के दोनों पैर घुटनों से नीचे नहीं थे। उसकी आँखें भी सफेद पड़ चुकी थीं। वह जमीन पर पड़े भोजन के टुकड़े उठाने की कोशिश कर रहा था और एक कुत्ता उसके हाथ से रोटी खींच रहा था।
एक लड़के ने उसे लात मारी।
“कुत्ते का खाना क्यों चुरा रहा है?”
ईशानी की आँखें कठोर हो गईं।
उसने केवल जमीन पर अपनी उँगली से हल्का-सा संकेत किया।
अचानक लड़कों के पैरों के नीचे की मिट्टी धँस गई और वे घुटनों तक कीचड़ में फँस गए।
“भागो!” वे चिल्लाने लगे।
ईशानी बूढ़े के पास पहुँची।
बूढ़े ने उसकी आहट सुनी।
“कौन है?”
“तुम्हारा नाम क्या है?”
उस आवाज को सुनते ही बूढ़े का पूरा शरीर काँप उठा।
उसने जमीन टटोलते हुए सिर उठाया।
“यह आवाज… नहीं… ऐसा कैसे हो सकता है?”
ईशानी कुछ पल चुप रही।
बूढ़े की आँखों से आँसू बहने लगे।
“स्वामिनी?”
ईशानी का चेहरा बदल गया।
“तुम कौन हो?”
“मैं गोविंद वर्मा हूँ। जगदीश वर्मा का पोता।”
ईशानी उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई।
“वर्मा परिवार का वंशज इस हालत में?”
गोविंद रोने लगा।
“आपके जाने के बाद सब बिखर गया। पहले राठौड़ परिवार का विनाश हुआ। फिर चौहान परिवार ने मेहरा परिवार से दिव्य पांडुलिपि छीन ली। उन्होंने हमारे व्यापार, जमीन और खदानों पर कब्जा कर लिया। विरोध करने पर मेरी गाड़ी का हादसा कराया गया। मेरी आँखें चली गईं और दोनों पैर काटने पड़े।”
ईशानी की आँखों में पहली बार दर्द दिखाई दिया।
“मैंने चार परिवारों को अपनी संपत्ति सँभालने के लिए चुना था। तुम लोग एक-दूसरे की रक्षा क्यों नहीं कर सके?”
गोविंद ने सिर झुका लिया।
“हम कमजोर पड़ गए थे, स्वामिनी। आपकी कृपा पर भरोसा किया, मगर आपकी दी सीख भूल गए।”
उसने अपने फटे थैले में हाथ डाला और कपड़े में लिपटा एक छोटा डिब्बा निकाला।
“यह क्या है?”
“दुर्लभ चाय। मेरे दादा कहते थे कि आपको इसकी सुगंध पसंद थी। जब हमारा घर छीना गया, तब मैं इसे छिपाकर ले आया। वर्षों तक कूड़े से खाना खाया, मगर इसे कभी खराब नहीं होने दिया। सोचता था कि आप लौटेंगी तो अपने हाथों से बनाकर दूँगा।”