भाग 3
ईशानी ने डिब्बा खोला।
चाय की हल्की सुगंध हवा में फैल गई।
उसकी आँखें कुछ पल के लिए नम हो गईं।
“मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका धन नहीं, उसकी निष्ठा होती है।”
उसने पास रखे मिट्टी के कटोरे में पानी भरवाया। उसमें चाय की कुछ पत्तियाँ डालीं और कटोरा दोनों हाथों से उठाया।
“आकाश, इस सेवक की निष्ठा को स्वीकार करो। धरती, इसके शरीर में खोई हुई जीवन-शक्ति लौटा दो।”
कटोरे से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।
ईशानी ने कुछ बूँदें गोविंद की आँखों पर छिड़कीं।
गोविंद ने चीखकर आँखें बंद कर लीं।
जब उसने दोबारा आँखें खोलीं, सफेदी गायब हो चुकी थी।
उसके सामने ईशानी का चेहरा था।
“स्वामिनी!”
वह रोते हुए उनके चरणों में गिरना चाहता था, मगर उसके पैर नहीं थे।
ईशानी ने उसके घुटनों पर हाथ रखा।
“तुम्हारे पैर मनुष्य ने छीने थे। जीवन देने वाली धरती उन्हें लौटाएगी।”
धरती काँपी।
गोविंद के कटे हुए पैरों पर सुनहरी रोशनी फैल गई। धीरे-धीरे हड्डियाँ, मांस और त्वचा बनने लगे।
कुछ ही पलों में उसके दोनों पैर वापस आ चुके थे।
गोविंद काँपते हुए खड़ा हुआ।
“मैं चल सकता हूँ।”
वह बच्चे की तरह रोते हुए ईशानी के चरणों में गिर गया।
दोस्तों, जिस व्यक्ति को दुनिया ने भिखारी बनाकर सड़क पर फेंक दिया था, उसकी एक सच्ची भावना ने उसे वह सब लौटा दिया जो करोड़ों रुपये भी नहीं लौटा सकते थे।
गोविंद ईशानी को वर्मा परिवार की पुरानी हवेली ले गया। हवेली पर सरकारी मुहर लगी थी और उसे नीलाम किया जाने वाला था।
ईशानी ने केवल हाथ उठाया।
मुहर स्वयं टूटकर जमीन पर गिर गई और बंद दरवाजा खुल गया।
गोविंद ने तुरंत अपने पुराने परिचितों को संदेश भेजा।
कुछ ही घंटों में दो बूढ़े व्यक्ति वहाँ पहुँचे।
एक पहियों वाली कुर्सी पर बैठे महेंद्र ठाकुर थे। दूसरे राजनाथ मेहरा, जिनके परिवार के अधिकांश लोग मानसिक रोगों से पीड़ित हो चुके थे।
दोनों ने ईशानी को देखते ही खुद को जमीन पर गिरा दिया।
“स्वामिनी, आपने लौटने में बहुत देर कर दी।”
ईशानी ने कहा, “मेरे लिए यह केवल एक निद्रा थी। मुझे नहीं पता था कि तुम लोगों के लिए आधी शताब्दी गुजर जाएगी।”
महेंद्र ठाकुर रो पड़े।
“चौहान परिवार ने आपकी पांडुलिपि चुरा ली। उसी से आने वाले व्यापारिक अवसरों का पता लगाकर वे पूरे पूर्वी क्षेत्र के सबसे शक्तिशाली लोग बन गए।”
ईशानी ने पूछा, “पांडुलिपि किसने छीनी?”
“राजवीर चौहान ने। उसके पिता नरेंद्र चौहान कभी आपकी सेवा करना चाहते थे, मगर आपने उन्हें अस्वीकार कर दिया था।”
ईशानी की आँखों में पुरानी स्मृति उभरी।
कई दशक पहले नरेंद्र चौहान उसके सामने घुटनों पर बैठा था।
वह बहुत योग्य और बुद्धिमान था, मगर उसकी आँखों में सेवा नहीं, अधिकार पाने की इच्छा थी।
“मुझे अपना सेवक चुनिए,” उसने कहा था।
ईशानी ने उत्तर दिया था, “तुम सेवा नहीं करना चाहते। तुम मेरी शक्ति का उपयोग करके दूसरों पर शासन करना चाहते हो।”
नरेंद्र अपमानित होकर चला गया था।
जाते समय उसने कहा था, “एक दिन आपको पछताना पड़ेगा कि आपने मुझे छोड़कर उन साधारण परिवारों को चुना।”
ईशानी वर्तमान में लौट आई।
“उसका अहंकार उसकी अगली पीढ़ी में भी पहुँच गया।”
महेंद्र ठाकुर ने बताया कि राजवीर ने दिव्य पांडुलिपि का प्रयोग करके संपत्तियाँ खरीदीं, व्यापारिक प्रतिद्वंद्वियों को हराया और शहर के अधिकारियों को अपने नियंत्रण में कर लिया।
मगर चौहान परिवार के भीतर अजीब घटनाएँ हो रही थीं।
उनके बगीचे के पेड़ सूख रहे थे। परिवार में बच्चों का जन्म लगभग बंद हो गया था। जो बच्चे जन्म लेते, वे तीन महीने से अधिक जीवित नहीं रहते।
ईशानी ने आँखें बंद कीं।
“पांडुलिपि ने उनकी जीवन-शक्ति खाना शुरू कर दिया है।”
राजनाथ मेहरा ने पूछा, “क्या पांडुलिपि श्रापित है?”
“नहीं। वह जिसे दी जाती है, उसी की ऊर्जा से भविष्य दिखाती है। चुराकर इस्तेमाल करने वाला हर उत्तर की कीमत अपने परिवार के जीवन से चुकाता है।”
महेंद्र ने भय से पूछा, “उन्होंने उसका कई वर्षों से उपयोग किया है।”
“इसीलिए उनका वंश समाप्ति के करीब है।”
ईशानी ने महेंद्र की कुर्सी की ओर देखा।
“तुम्हारे पैर कैसे गए?”
“राजवीर ने मुझे पांडुलिपि देने के लिए मजबूर किया। विरोध किया तो मेरे पैरों की नसें कटवा दीं।”
ईशानी ने एक छोटी घंटी निकाली।
घंटी की आवाज बहुत हल्की थी, मगर पूरा कक्ष उस ध्वनि से भर गया।
“खड़े हो जाओ।”
महेंद्र की टाँगों में कंपन हुआ।
“मैं नहीं खड़ा हो सकता, स्वामिनी।”
“मैंने कहा, खड़े हो जाओ।”
महेंद्र ने कुर्सी के हत्थे पकड़े। वर्षों से निष्क्रिय उसके पैर धीरे-धीरे सीधे होने लगे। वह काँपता हुआ खड़ा हो गया।
उसका पोता, जो उसे लेकर आया था, आश्चर्य से मुँह खोले देखता रहा।
महेंद्र ने एक कदम बढ़ाया, फिर दूसरा।
वह रोते हुए बोला, “अब समझ आया कि हमारे पूर्वज आपकी सेवा के लिए क्यों लड़ते थे।”
गोविंद हँसा।
“सेवा के लिए नहीं, तुम्हारे जैसे लालची बूढ़े आशीर्वाद के लिए लड़ते थे।”
कई वर्षों बाद तीनों बूढ़ों के बीच हल्की हँसी गूँजी।
उसी समय बाहर कारें आकर रुकीं।
हरिशंकर नैना और मालती देवी को लेकर हवेली पहुँचा था।
मालती देवी को सहारा देकर अंदर लाया गया। नैना का चेहरा पट्टियों में छिपा था।
जैसे ही हरिशंकर ने ईशानी को देखा, वह दूर से ही घुटनों पर बैठ गया।
“स्वामिनी, राठौड़ परिवार से अपराध हुआ है।”
गोविंद ने क्रोध से कहा, “तुम्हारे पूर्वज इस दिन के लिए तरसते हुए मर गए और तुम्हारे घरवालों ने स्वामिनी का अपमान किया?”
हरिशंकर ने सिर झुका लिया।
“दोष मेरा है। मैंने उन्हें सच्चाई नहीं बताई।”
ईशानी ने कहा, “तुम्हारा अपराध केवल अज्ञान था। इन दोनों का अपराध अहंकार और छल है।”
नैना उनके चरणों में गिर गई।
“मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं डर गई थी।”
ईशानी ने पूछा, “तुम्हें अपने किए का पछतावा है या मृत्यु का भय?”
नैना चुप रही।
मालती देवी बोलीं, “आप बड़ी हैं, शक्तिशाली हैं। हमसे गलती हो गई। अब हमारी जान बचा दीजिए।”
गोविंद ने कटु स्वर में कहा, “अभी भी इनके शब्दों में विनम्रता नहीं है।”
मालती देवी भड़क गईं।
“मैं क्षमा माँगने आई हूँ। और क्या करूँ? जमीन पर सिर पटकूँ?”
ईशानी ने हरिशंकर की ओर देखा।
“अब समझे? शरीर झुक सकता है, मगर अहंकार अभी सीधा खड़ा है।”
हरिशंकर ने रोते हुए कहा, “स्वामिनी, इन्हें इनके भाग्य पर छोड़ दीजिए। मगर मेरे पूर्वजों की सेवा का संबंध पूरी तरह समाप्त मत कीजिए।”
ईशानी ने अपनी उँगली से एक लकड़ी की नई अंगूठी प्रकट की।
“यह तुम्हारी रक्षा करेगी। तुम्हारे परिवार के कर्मों का दंड तुम्हें नहीं मिलेगा।”
हरिशंकर ने अंगूठी स्वीकार की।
“अब चले जाओ।”
नैना ने हरिशंकर का हाथ पकड़ लिया।
“पापा, मैं नहीं जाऊँगी। उनसे कहिए मुझे बचा लें।”
हरिशंकर की आँखों में दर्द था।
“तुमने चेतावनी के बाद भी हर सीमा पार की। अब मैं भी तुम्हारे कर्मों के बीच नहीं आ सकता।”
वापसी में उनकी कार पहाड़ी सड़क से गुजर रही थी।
आकाश बिल्कुल साफ था।
अचानक एक बिजली सीधे कार पर गिरी।
हरिशंकर की अंगूठी चमकी और वह कार से दूर जा गिरा।
अगले ही पल कार में आग लग गई।
नैना और मालती देवी भीतर ही रह गईं।
हरिशंकर बेहोश होने से पहले केवल इतना सुन पाया—
दूर कहीं मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं।
ईशानी ने हवेली की खिड़की से जलता हुआ आकाश देखा।
“तीसरा जीवन भी ले लिया गया।”
उसने पीछे मुड़कर तीनों पुराने सेवकों से कहा, “अब चौहान परिवार के पास चलते हैं। पचास वर्षों से फैला यह अंधकार समाप्त करने का समय आ गया है।”
उसी समय देवगढ़ के दूसरे छोर पर चौहान भवन के भीतर रखी दिव्य पांडुलिपि अचानक जलने लगी।
राजवीर चौहान ने घबराकर उसे बचाने की कोशिश की, मगर कुछ ही पलों में वह राख बन गई।
राख के बीच केवल तीन शब्द उभरे—
“स्वामिनी लौट आई।”
चौहान भवन किसी महल से कम नहीं था।
सैकड़ों एकड़ में फैली जमीन, संगमरमर की दीवारें, निजी मंदिर, कृत्रिम झील और विदेशी पेड़ों से सजा विशाल बगीचा चौहान परिवार की शक्ति दिखाता था।
लेकिन उस दिन बगीचे के सारे पौधे सूख चुके थे।
हरा घास का मैदान भूरा पड़ गया था। तालाब की मछलियाँ पानी की सतह पर मृत पड़ी थीं। पेड़ों पर बैठे पक्षी उड़कर दूर जा चुके थे।
राजवीर चौहान अपने अध्ययन-कक्ष में राख बनी दिव्य पांडुलिपि को देख रहा था।
उसकी छोटी बहन काव्या ने कहा, “भैया, मैंने कई बार कहा था कि इसे वापस कर दीजिए। यह हमारी चीज नहीं थी।”
राजवीर ने मुट्ठी भींच ली।
“इसी पांडुलिपि ने चौहान परिवार को पूर्व का सबसे शक्तिशाली परिवार बनाया है।”
“और इसी ने हमारा परिवार समाप्त कर दिया। पिछले पाँच वर्षों में हमारे घर में जन्मा कोई बच्चा जीवित नहीं रहा। आपकी पत्नी के तीन गर्भ गिर चुके हैं। अब आपका एक महीने का बेटा अस्पताल में है।”
राजवीर की आँखों में दर्द उभरा, मगर अहंकार अभी भी जीवित था।
“यह सब संयोग है।”
काव्या ने पांडुलिपि की राख में उभरे शब्द दिखाए।
“स्वामिनी लौट आई। क्या यह भी संयोग है?”
राजवीर ने तुरंत अपने लोगों को बुलाया।
“पता लगाओ वर्मा, ठाकुर और मेहरा परिवार में क्या हुआ है।”
कुछ देर बाद खबर आई कि अंधे और अपाहिज गोविंद वर्मा को किसी रहस्यमयी युवती ने स्वस्थ कर दिया है। सरकारी अधिकारियों ने वर्मा हवेली की नीलामी रोककर संपत्ति वापस करने का आदेश भी जारी कर दिया था।
राजवीर क्रोध में खड़ा हो गया।
“मेरे आदेश के बिना किसी ने वर्मा की संपत्ति कैसे लौटाई?”
“ऊपर से आदेश आया है। कारण गोपनीय बताया गया है।”
काव्या ने धीमे स्वर में कहा, “वह लौट चुकी हैं।”
राजवीर के मन में अपने पिता नरेंद्र चौहान की आखिरी रात याद आई।
नरेंद्र मृत्युशय्या पर पड़ा था।
वह बार-बार एक ही नाम ले रहा था।
“ईशानी… मैंने तुम्हें साबित करके दिखाया। मेरा परिवार उन चारों से बेहतर है।”
बचपन में राजवीर ने पूछा था, “पिताजी, ईशानी कौन हैं?”
नरेंद्र ने कहा था, “एक ऐसी स्त्री जिसने मेरी योग्यता का अपमान किया। मैंने उसके सामने सेवा का प्रस्ताव रखा, मगर उसने चार कमजोर परिवारों को चुन लिया। तुम एक दिन उन चारों परिवारों को अपने पैरों के नीचे झुकाना। तभी मेरी आत्मा को शांति मिलेगी।”
राजवीर ने अपने पिता की इच्छा को ही अपना जीवन बना लिया था।
उसने राठौड़ परिवार की बची संपत्तियों को खरीदा, मेहरा परिवार की पांडुलिपि छीनी, ठाकुर परिवार को अपाहिज किया और वर्मा परिवार को सड़क पर ला दिया।
उसे लगता था कि वह अपने पिता का सम्मान लौटा रहा है।
वह यह नहीं समझ पाया था कि वह केवल अपने पिता का अहंकार आगे बढ़ा रहा था।
चौहान भवन के मुख्य द्वार पर ईशानी की कार आकर रुकी।
कार से पहले गोविंद उतरा, फिर महेंद्र और राजनाथ।
तीनों में इस बात को लेकर झगड़ा चल रहा था कि ईशानी के लिए दरवाजा कौन खोलेगा।
“पहले मैंने उन्हें पहचाना था,” गोविंद बोला, “दरवाजा मैं खोलूँगा।”
महेंद्र ने उसे हटाते हुए कहा, “तुम कल तक सड़क पर भीख माँग रहे थे। सेवा के तरीके भूल चुके हो।”
राजनाथ ने दोनों को पीछे किया।
“तुम दोनों हटो। मेहरा परिवार के पास सबसे पुराने नियम लिखे हैं।”
कार के अंदर बैठी ईशानी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “पचास वर्ष बीत गए, मगर तुम तीनों की बच्चों जैसी लड़ाई नहीं बदली।”
तीनों तुरंत शांत हो गए।
दोस्तों, कहानी में यह छोटा-सा पल जरूरी था। क्योंकि ईशानी के आसपास केवल भय और मृत्यु नहीं थी। इन बूढ़ों के लिए वह उनके बीते हुए अच्छे समय की याद, सुरक्षा और परिवार की तरह थी।
चौहान परिवार के नौकर उन्हें मुख्य कक्ष में ले गए।
राजवीर ऊँची कुर्सी पर बैठा था।
उसने ईशानी को देखा।
“तो तुम वही रहस्यमयी युवती हो जिसने इन तीन बूढ़ों को मेरे विरुद्ध खड़ा किया है?”
गोविंद ने डाँटते हुए कहा, “खड़े होकर बात करो। तुम्हारे पिता भी इनके सामने घुटनों पर बैठते थे।”
राजवीर हँसा।
“मेरे पिता जिस स्त्री का नाम लेते थे, वह अब सत्तर या अस्सी वर्ष की होगी। यह लड़की मुश्किल से पच्चीस वर्ष की है।”
ईशानी ने शांत स्वर में पूछा, “तुम्हें लगता है मैं नकली हूँ?”
“बिल्कुल।”
“फिर तुमने पांडुलिपि की राख में लिखा संदेश क्यों छिपाया?”
राजवीर का चेहरा बदल गया।