Emotional Story

दस साल प्रेम करने वाले पति को छोड़ा, दूसरी लड़की ने उसी को बना दिया महान

WATCH THE STORY

वीडियो में पूरी कहानी देखें

कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

निखिल ने आर्या के प्रेम में अपना परिवार, मित्र, पसंद और सुनहरा भविष्य तक छोड़ दिया। लेकिन बदले में उसे मिला केवल अपमान, उपेक्षा और अकेलापन। एक तूफानी रात आर्या उसे तेज बुखार में अकेला छोड़कर करण के साथ चली जाती है। उसी रात निखिल समझ जाता है कि जिस रिश्ते को वह प्रेम मानता रहा, उसमें उसका कोई सम्मान ही नहीं बचा।

सब कुछ पीछे छोड़कर निखिल अपने शहर लौट आता है, जहाँ मीरा वर्षों से उसकी प्रतीक्षा कर रही होती है। मीरा उसे बाँधने के बजाय उसके अधूरे सपनों को पूरा करने की शक्ति देती है। कुछ वर्षों बाद वही साधारण समझा जाने वाला निखिल देश की सबसे महत्त्वपूर्ण चिकित्सा परियोजना का प्रमुख वैज्ञानिक बनकर लौटता है।

लेकिन जब आर्या को अपनी गलतियों का एहसास होता है, तब तक निखिल किसी और के साथ नया जीवन शुरू कर चुका होता है। क्या आर्या निखिल को वापस पा सकेगी? क्या निखिल अपने पुराने प्रेम को एक अंतिम अवसर देगा? और करण की छिपी हुई सच्चाई सामने आने पर सबकी जिंदगी किस तरह बदल जाएगी?

पढ़ना शुरू करें ↓
आप भाग 1 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 57 मिनट

भाग 1

देवगढ़ की वह रात कुछ अलग ही थी।

आसमान में काले बादल ऐसे छाए हुए थे, मानो पहाड़ों के बीच दबे वर्षों पुराने दर्द को आज बरसकर बाहर निकलना हो। बिजली बार-बार चमक रही थी और वर्षा की मोटी बूँदें चिकित्सालय की खिड़कियों से टकराकर तेज आवाज कर रही थीं।

चिकित्सालय के मुख्य द्वार के बाहर निखिल एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में दवाइयों का छोटा-सा थैला लिए खड़ा था। उसके माथे पर हल्का बुखार था। शरीर टूट रहा था, मगर वह अपनी तकलीफ को अनदेखा कर रहा था।

पिछले पाँच वर्षों से वह ऐसा ही करता आया था।

अपनी तकलीफें छिपाना और आर्या की हर छोटी-बड़ी जरूरत को अपनी जिम्मेदारी मान लेना अब उसके स्वभाव का हिस्सा बन चुका था।

उसी समय आर्या चिकित्सालय से बाहर आई। सफेद वस्त्रों पर उसने हल्का भूरा ऊनी कोट पहन रखा था। उसके पीछे करण और उसकी माँ चल रहे थे। करण की आँखें लाल थीं। उसके पिता का उसी सुबह निधन हुआ था।

करण ने आर्या का हाथ पकड़ते हुए कहा,
“आर्या, क्या तुम हमारे साथ पिताजी के अंतिम संस्कार वाले स्थान तक चल सकती हो? माँ बहुत टूट गई हैं। इस समय मेरे पास तुम्हारे अलावा कोई नहीं है।”

आर्या ने सहानुभूति से उसकी ओर देखा।

निखिल ने धीमे स्वर में कहा,
“आर्या, मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही। शायद बुखार बढ़ गया है। घर दूर है और बारिश भी बहुत तेज हो रही है।”

आर्या ने एक पल के लिए निखिल को देखा, लेकिन अगले ही क्षण उसकी दृष्टि वापस करण पर चली गई।

“निखिल, करण के पिता अभी गए हैं। उसकी स्थिति समझने की कोशिश करो। तुम कोई गाड़ी कर लेना।”

“लेकिन इस समय यहाँ कोई गाड़ी—”

निखिल अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि आर्या ने गाड़ी की चाबी निकालते हुए कहा,
“मैं करण और माताजी को पहले छोड़ देती हूँ। लौटकर तुम्हें ले जाऊँगी।”

करण ने बनावटी संकोच दिखाते हुए कहा,
“रहने दो आर्या, निखिल को पहले घर छोड़ दो।”

“नहीं,” आर्या ने तुरंत कहा, “तुम्हें अभी मेरी ज्यादा जरूरत है।”

कुछ ही क्षणों बाद गाड़ी वर्षा से भीगी सड़क पर आगे बढ़ गई।

निखिल वहीं खड़ा उसे जाते हुए देखता रहा।

दोस्तों, कभी-कभी जीवन में सबसे ज्यादा चोट किसी के जाने से नहीं लगती। चोट तब लगती है, जब वह व्यक्ति जाते समय एक बार पीछे मुड़कर भी नहीं देखता, जिसके लिए हमने अपना सब कुछ पीछे छोड़ दिया हो।

निखिल ने लगभग आधे घंटे तक प्रतीक्षा की। उसका बुखार बढ़ता जा रहा था। दूर तक कोई गाड़ी दिखाई नहीं दी। अंततः उसने छाता खोला और पैदल ही घर की ओर चल पड़ा।

हवा इतनी तेज थी कि कुछ ही देर में छाता उलट गया। उसके कपड़े पूरी तरह भीग चुके थे। जूते पानी से भर गए थे। हर कदम के साथ शरीर भारी होता जा रहा था।

वह पहाड़ी रास्तों पर लगभग चार किलोमीटर पैदल चलकर अपने किराए के घर पहुँचा।

दरवाजा खोलते ही उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। उसने किसी तरह भीगे कपड़े बदले और बिस्तर पर गिर पड़ा। बुखार की गर्मी में उसका पूरा शरीर काँप रहा था।

उसे लगा था कि आर्या लौटकर आएगी।

वह उसके माथे पर हाथ रखेगी।

शायद डाँटेगी कि उसने गाड़ी की प्रतीक्षा क्यों नहीं की।

मगर पूरी रात बीत गई। दरवाजा नहीं खुला।

अगली दोपहर निखिल की आँख खुली। कमरे में वही अकेलापन था। मोबाइल पर आर्या का केवल एक संदेश पड़ा था—

“करण की हालत ठीक नहीं है। मैं कुछ दिन उसके साथ रहूँगी। जरूरत हो तो संदेश कर देना।”

निखिल फीकी हँसी हँस पड़ा।

“जरूरत हो तो संदेश कर देना…”

जिस व्यक्ति के सामने वह कल बुखार में काँप रहा था, उसने उसकी हालत देखी तक नहीं। अब वह संदेश भेजकर पूछ रही थी कि कोई जरूरत तो नहीं।

तभी उसके एक पुराने मित्र ने उसे सामाजिक माध्यम पर एक चित्र भेजा।

चित्र में आर्या और करण एक छोटी-सी चाय की दुकान पर बैठे थे। करण ने दो कुल्हड़ हाथ में ले रखे थे और आर्या मुस्करा रही थी।

चित्र के नीचे करण ने लिखा था—

“जिसे हम चाहते हैं, उसके साथ साधारण चाय भी जीवन की सबसे मीठी चीज बन जाती है।”

निखिल बहुत देर तक उस चित्र को देखता रहा।

पाँच वर्षों में उसने आर्या को न जाने कितने महँगे भोजनालयों में ले जाने की कोशिश की थी। उसके जन्मदिन पर स्वयं भोजन बनाया था। उसके लिए घर सजाया था। लेकिन आर्या ने उसके साथ कभी इस तरह खुलकर मुस्कराते हुए कोई चित्र नहीं खिंचवाया।

वह मुस्कान, जिसके लिए निखिल ने अपने जीवन के पाँच वर्ष लगा दिए थे, करण को एक कुल्हड़ चाय के साथ मिल गई थी।

निखिल ने मोबाइल बंद कर दिया।

उसी समय एक अज्ञात संख्या से उसे फोन आया।

“क्या मैं निखिल त्रिपाठी से बात कर रहा हूँ?”

“जी।”

दूसरी ओर से गंभीर मगर स्नेहपूर्ण आवाज आई—

“मैं आचार्य देवेंद्र राव बोल रहा हूँ। राष्ट्रीय सूक्ष्म चिकित्सा अनुसंधान केंद्र से।”

निखिल अचानक सीधा बैठ गया।

पाँच वर्ष पहले आचार्य देवेंद्र ने उसे अपने विशेष अनुसंधान दल में शामिल होने का प्रस्ताव दिया था। पूरे देश से केवल चार युवाओं का चयन हुआ था और निखिल उनमें से एक था।

लेकिन उसी समय आर्या ने कहा था—

“तुम उस केंद्र में गए तो कई वर्षों तक हम अलग रहेंगे। मैं दूरी वाला संबंध नहीं निभा सकती। तुम्हें जाना है तो चले जाओ, मगर हमारा रिश्ता उसी दिन समाप्त हो जाएगा।”

तब निखिल ने बिना कुछ सोचे अवसर ठुकरा दिया था।

वह आर्या के साथ देवगढ़ आ गया। अपने ज्ञान और योग्यता के बावजूद उसने स्थानीय चिकित्सालय में एक साधारण तकनीकी सहायक का काम स्वीकार कर लिया, क्योंकि आर्या वहीं चिकित्सक थी।

फोन पर आचार्य देवेंद्र ने कहा,
“निखिल, हमें तुम्हारे साथ जो हुआ, उसके बारे में जानकारी मिली। जीवन में कुछ झटके मनुष्य को तोड़ने नहीं, जगाने आते हैं। पाँच वर्ष पहले तुमने हमारा प्रस्ताव ठुकरा दिया था। हमारे केंद्र में अब भी तुम्हारे लिए स्थान है। क्या तुम लौटना चाहोगे?”

निखिल की आँखें भर आईं।

जिस अवसर को उसने स्वयं ठुकरा दिया था, वह अवसर पाँच वर्ष बाद फिर उसके दरवाजे पर खड़ा था।

“आचार्य जी, आपने मुझे दोबारा याद किया, यही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। मुझे कुछ अधूरे संबंध समाप्त करने हैं। कृपया मुझे कुछ दिन दीजिए।”

“सोचने के लिए नहीं,” आचार्य देवेंद्र ने कहा, “अपने पुराने जीवन को सम्मानपूर्वक विदा करने के लिए समय लो। निर्णय तुम्हारी आवाज में सुनाई दे रहा है।”

फोन कटने के बाद निखिल ने पहली बार अपने कमरे को ध्यान से देखा।

हर वस्तु आर्या से जुड़ी हुई थी।

दीवार पर उनकी सगाई का चित्र था, जिसे आर्या ने कभी पसंद नहीं किया था।

अलमारी में दो एक जैसे रात्रि-वस्त्र रखे थे, जिन्हें उसने पाँच वर्ष पहले खरीदा था। निखिल ने अपना वस्त्र कई बार पहना था, लेकिन आर्या वाला वस्त्र अब तक तह लगा हुआ नया पड़ा था।

रसोई में आर्या की पसंद के मसाले थे।

औषधियों के डिब्बे पर निखिल के हाथ से लिखे छोटे-छोटे कागज चिपके थे—

“पेट में जलन हो तो भोजन के बाद लेना।”

“अधिक देर खाली पेट मत रहना।”

“ठंडी वस्तुएँ खाने के बाद यह औषधि लेना।”

निखिल ने धीमे स्वर में कहा,
“मैंने अपना घर नहीं बनाया था। मैंने केवल आर्या की सुविधा के लिए एक स्थान तैयार किया था।”

अगली सुबह वह चिकित्सालय पहुँचा और अपना त्यागपत्र विभागाध्यक्ष के सामने रख दिया।

विभागाध्यक्ष ने हैरानी से पूछा,
“निखिल, अचानक यह निर्णय क्यों? यहाँ सब तुम्हें पसंद करते हैं।”

“मैं बहुत समय से अपने घर से दूर हूँ। अब वापस जाना चाहता हूँ।”

“आर्या को पता है?”

निखिल कुछ क्षण चुप रहा।

“जब मैं यहाँ आया था, तब मेरा हर निर्णय आर्या से शुरू होता था। अब पहली बार कोई निर्णय केवल मेरा है।”

विभागाध्यक्ष ने त्यागपत्र पर हस्ताक्षर करते हुए कहा,
“तुमने उसके लिए अपना भविष्य छोड़ा था। आशा है अब अपने भविष्य के लिए स्वयं को नहीं छोड़ोगे।”

जब निखिल अपना सामान लेकर घर पहुँचा तो आर्या और करण पहले से वहाँ बैठे थे।

करण ने निखिल के बक्से देखकर पूछा,
“तुम चिकित्सालय का सामान घर क्यों ले आए?”

“अब उसकी जरूरत नहीं है।”

आर्या ने उसकी ओर देखा भी नहीं। वह करण के लिए चाय बना रही थी।

करण मुस्कराकर बोला,
“निखिल, उस रात तुम्हें बारिश में चलकर आना पड़ा, बहुत कठिन रहा होगा। मैंने बस इतना कहा कि मन बहुत भारी है और आर्या तुरंत मेरे पास आ गई। तुम इतने वर्षों से उसकी चिंता करते रहे, फिर भी वह तुम्हारी चिंता समझ नहीं पाई। अजीब है न?”

निखिल ने शांत स्वर में कहा,
“तुम्हें अभिनय करना चाहिए, करण। दुखी चेहरा बनाकर दूसरों की जिंदगी नियंत्रित करना तुम्हें अच्छी तरह आता है।”

करण तुरंत उदास हो गया।

आर्या ने तेज स्वर में कहा,
“निखिल! तुम्हें शर्म नहीं आती? उसके पिता का निधन हुआ है।”

“उसके पिता का निधन हुआ है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह मेरे सामने बैठकर मेरे संबंध का मजाक बनाए।”

“करण ने केवल सच कहा है।”

निखिल ने आर्या की आँखों में देखा।

“हाँ, सच ही कहा है। और सच का क्या बुरा मानना?”

वह अपने कमरे की ओर चल पड़ा।

आर्या ने पीछे से कहा,
“एक कदम और बढ़ाया तो मैं तुमसे बात नहीं करूँगी।”

पहले कभी आर्या की ऐसी बात सुनकर निखिल तुरंत रुक जाता था।

लेकिन इस बार वह बिना पलटे कमरे में चला गया।

आर्या कुछ क्षण स्तब्ध खड़ी रही। उसे विश्वास नहीं हुआ कि निखिल ने उसकी चेतावनी अनसुनी कर दी।

शाम को आर्या ने समुद्री भोजन बनाने के लिए सामग्री मँगवाई। करण को झींगे और मछली बहुत पसंद थे।

आर्या ने रसोई में जाकर कहा,
“आज करण यहीं भोजन करेगा। तुम अच्छा-सा झींगा और मछली का भोजन बना दो।”

निखिल ने उसकी ओर देखा।

“मैं नहीं बनाऊँगा।”

“क्यों?”

“मेरा मन नहीं है।”

“तुम प्रतिदिन भोजन बनाते हो। एक व्यक्ति अधिक हो गया तो इतनी परेशानी क्यों?”

करण ने तुरंत कहा,
“रहने दो आर्या। निखिल मुझे पसंद नहीं करता। सामग्री व्यर्थ चली जाएगी, लेकिन कोई बात नहीं।”

आर्या की आवाज कठोर हो गई।

“निखिल, चाहे कुछ भी हो, आज भोजन तुम ही बनाओगे।”

निखिल कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर बोला,
“तुम्हें याद है कि मुझे झींगे से गंभीर एलर्जी है?”

आर्या ने असहज होकर कहा,
“तुम्हें खाना थोड़े ही है। केवल बनाना है। हाथ धो लेना।”

निखिल की आँखों में एक अजीब-सी शांति उतर आई।

उसे अचानक वह दिन याद आया, जब आर्या के लिए उसने पूरे घर से मूँगफली हटवा दी थी क्योंकि आर्या को उससे हल्की-सी परेशानी होती थी।

लेकिन उसकी जानलेवा एलर्जी आर्या के लिए केवल हाथ धो लेने जितनी साधारण बात थी।

“ठीक है,” उसने कहा, “आज मैं बना दूँगा। आखिरी बार।”

रसोई में झींगे साफ करते समय उसके हाथों पर लाल चकत्ते उभरने लगे। साँस भारी होने लगी, लेकिन उसने भोजन पूरा किया।

मेज पर करण ने पहला निवाला खाते ही नाटक करते हुए कहा,
“यह बहुत तीखा है।”

निखिल ने उसके सामने सूप रख दिया।

करण ने सूप पीकर खाँसते हुए कहा,
“यह तो उससे भी ज्यादा तीखा है।”

आर्या तुरंत निखिल पर बरस पड़ी।

“तुम इतने बचकाने कैसे हो सकते हो? तुम्हें पता था करण परेशान है, फिर भी तुमने जान-बूझकर भोजन खराब किया।”

निखिल कुछ बोलता, उससे पहले उसकी साँस अटकने लगी। गर्दन और चेहरे पर सूजन फैल चुकी थी।

आर्या ने पहली बार ध्यान से उसकी ओर देखा।

“तुम्हें तो केवल खाने से परेशानी होती थी। छूने से भी हो सकती है, यह तुमने बताया क्यों नहीं?”

निखिल ने मुश्किल से कहा,
“बताता तो क्या तुम करण के लिए भोजन बनवाने का निर्णय बदल देतीं?”

आर्या चुप हो गई।

दोस्तों, सबसे दर्दनाक प्रश्न वही होता है, जिसका उत्तर सामने वाला जानता तो है, मगर स्वीकार नहीं कर पाता।

निखिल औषधि लेकर किसी तरह चिकित्सालय पहुँचा। उपचार के बाद वह वहीं बैठा रहा।

अगले दिन आर्या ने भोजनालय में मेज आरक्षित करके उसे संदेश भेजा—

“कल जो हुआ उसके लिए क्षमा चाहती हूँ। शाम को साथ भोजन करेंगे।”

निखिल ने उत्तर दिया—

“आज मैं अपने पुराने मित्रों से मिलने जा रहा हूँ।”

आर्या ने तुरंत फोन किया।

“पाँच साल में तुम कभी मित्रों से मिलने नहीं गए। आज अचानक?”

“क्योंकि पाँच वर्षों में पहली बार मैं अपने लिए समय निकाल रहा हूँ।”

शाम को निखिल अपने महाविद्यालय के मित्रों से मिला। वे उसे देखकर उत्साहित भी हुए और हैरान भी।

एक मित्र ने कहा,
“निखिल, महाविद्यालय के बाद यह पहली बार है जब तुमने स्वयं हमें बुलाया है।”

भाग 1/5 अगला →
SHARE THE STORY

यह कहानी किसी अपने के साथ साझा करें

0 बार पढ़ी गई
Whatsapp Telegram
DILFEVER YOUTUBE

ऐसी ही नई कहानियाँ वीडियो में सुनें

@DilFever

Subscribe करें
आपकी राय

अगर आप मुख्य किरदार की जगह होते, तो क्या फैसला लेते?

अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर लिखें।

Leave a Comment