भाग 1
नवरंगपुर शहर की सुबह बाकी दिनों जैसी ही थी। सड़कों पर गाड़ियों का शोर था, दुकानों के शटर खुल रहे थे और बड़े-बड़े दफ्तरों की तरफ भागते लोगों के चेहरों पर वही रोज की जल्दी दिखाई दे रही थी। मगर उसी भीड़ के बीच एक छोटी-सी बच्ची बिल्कुल अकेली चली जा रही थी।
उसकी उम्र मुश्किल से सात वर्ष रही होगी। उसने हल्के पीले रंग की घेरदार पोशाक पहन रखी थी, जिसके किनारों पर लाल धागे से छोटे-छोटे फूल बने हुए थे। उसके लंबे काले बालों में एक पुरानी सुनहरी पिन लगी थी और गले में आधे चाँद जैसा हरे पत्थर का ताबीज लटक रहा था।
उसका नाम आर्या था।
आर्या के हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी। तस्वीर में एक नौजवान आदमी मुस्करा रहा था। उसकी आँखों में अजीब-सी उदासी थी, जैसे तस्वीर खिंचवाते समय भी वह किसी को खो देने से डर रहा हो।
आर्या हर कुछ कदम बाद तस्वीर को देखती और सामने गुजरते लोगों से पूछती, “क्या आपने इन्हें कहीं देखा है? मेरे गुरुजी ने कहा था कि यही मेरे पापा हैं।”
लोग उसे देखकर मुस्कराते, कुछ बिना जवाब दिए आगे बढ़ जाते और कुछ उसे भिखारी समझकर दो-चार रुपये पकड़ाने की कोशिश करते।
आर्या पैसे लेने से मना कर देती।
“मुझे पैसे नहीं चाहिए,” वह मासूमियत से कहती, “मुझे बस अपने पापा चाहिए।”
दोस्तों, अब कहानी में ध्यान देने वाली बात यह है कि आर्या कोई साधारण बच्ची नहीं थी। वह सात वर्ष तक हिमालय के पास एक गुप्त आश्रम में पली थी। उसके गुरु सिद्धनाथ ने उसे जड़ी-बूटियों, नाड़ियों, मंत्रों और अदृश्य शक्तियों को पहचानने की विद्या सिखाई थी। मगर आर्या को अपनी शक्तियों से ज्यादा इस बात की चिंता रहती थी कि उसे कभी भरपेट मिठाई क्यों नहीं मिलती और पहाड़ों पर मच्छर इतने ज्यादा क्यों होते हैं।
तीन दिन पहले गुरु सिद्धनाथ ने उसे वह तस्वीर देकर कहा था, “बेटी, अब समय आ गया है कि तू अपने पिता को खोजे। शहर का रास्ता कठिन है, मगर तेरे भाग्य की डोर वहीं बंधी है।”
आर्या ने पूछा था, “और माँ?”
गुरु सिद्धनाथ का चेहरा गंभीर हो गया था।
“तेरी माँ जीवित है, लेकिन ऐसी जगह कैद है जहाँ अभी तू नहीं पहुँच सकती।”
आर्या की आँखें भर आई थीं।
“तो मैं पहले पापा को ढूँढ़ूँगी। फिर हम दोनों मिलकर माँ को बचाएँगे।”
इसी विश्वास के साथ वह नवरंगपुर पहुँची थी।
उधर शहर के दूसरे छोर पर सिंघानिया समूह के मुख्य दफ्तर में हंगामा मचा हुआ था। यह समूह कभी देश की सबसे भरोसेमंद निर्माण और व्यापार कंपनियों में गिना जाता था। उसकी नींव लगभग चालीस वर्ष पहले हरिदत्त सिंघानिया ने अपने कुछ पुराने साथियों के साथ मिलकर रखी थी।
मगर अब कंपनी के भीतर ही सत्ता की लड़ाई शुरू हो चुकी थी।
हरिदत्त का छोटा पोता विक्रम सिंघानिया हाल ही में प्रशासन का मुखिया बना था। पद मिलते ही उसने उन पुराने कर्मचारियों को निकालना शुरू कर दिया जिन्होंने हरिदत्त के साथ मिलकर कंपनी को खड़ा किया था।
एक बुजुर्ग कर्मचारी रामसेवक अपने कागज हाथ में लिए हरिदत्त के सामने खड़ा रो रहा था।
“मालिक, हमने अपनी पूरी जिंदगी इस कंपनी को दी। विक्रम बाबू कहते हैं कि हम पुराने हो चुके हैं और नई दुनिया की रफ्तार नहीं समझ सकते।”
हरिदत्त की आँखों में गुस्सा उतर आया।
सफेद बालों और कमजोर शरीर के बावजूद उनकी आवाज अब भी पूरे कमरे को शांत कर सकती थी।
“मैं अभी मरा नहीं हूँ,” उन्होंने मेज पर हाथ मारते हुए कहा, “जिसे मैंने अपने हाथों से नौकरी दी, उसे निकालने का अधिकार विक्रम को किसने दिया? आप लोग वापस अपने काम पर जाइए। मैं देखता हूँ कौन आपको रोकता है।”
रामसेवक की आँखों से आँसू निकल पड़े।
“मालिक, भगवान आपको लंबी उम्र दे।”
हरिदत्त दफ्तर से बाहर निकले ही थे कि अचानक ऊपर से भारी लोहे का बोर्ड टूटकर उनकी तरफ गिरने लगा।
आसपास खड़े लोग चिल्लाए, लेकिन किसी को कुछ करने का मौका नहीं मिला।
तभी भीड़ के बीच से पीली पोशाक पहने आर्या दौड़ती हुई आई। उसने जमीन से एक छोटा-सा पत्थर उठाया, आँखें बंद कीं और धीरे से कुछ बोली। पत्थर उसके हाथ से निकला और गिरते हुए बोर्ड की दिशा बदल गई।
बोर्ड हरिदत्त से कुछ ही दूरी पर जा गिरा।
चारों ओर धूल फैल गई।
हरिदत्त ने हैरानी से आर्या को देखा।
“तुमने मेरी जान बचाई?”
आर्या ने मुस्कराकर कहा, “हाँ, लेकिन आपको आगे से ऊपर देखकर चलना चाहिए। हर बार मैं पास नहीं रहूँगी।”
हरिदत्त अनायास हँस पड़े।
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“आर्या।”
“तुम्हारे माता-पिता कहाँ हैं?”
आर्या के चेहरे की मुस्कान हल्की पड़ गई।
“मेरी माँ बहुत दूर हैं। गुरुजी कहते हैं कि वह आसमान के पार एक जगह बंद हैं। और मैं अपने पापा को ढूँढ़ रही हूँ।”
उसने तस्वीर हरिदत्त के सामने कर दी।
तस्वीर देखते ही हरिदत्त के चेहरे का रंग बदल गया।
तस्वीर में उनका बड़ा पोता विराज था।
उन्होंने आर्या को ध्यान से देखा। वही गहरी आँखें, वही भौंहों का आकार और मुस्कराते समय गाल पर पड़ने वाला हल्का गड्ढा।
उनके दिल में एक पल के लिए उम्मीद जागी, मगर फिर उन्होंने खुद को समझाया कि यह केवल संयोग भी हो सकता है।
“तुम्हें यह तस्वीर किसने दी?”
“मेरे गुरुजी ने। उन्होंने कहा कि तस्वीर वाले आदमी मेरे पापा हैं।”
हरिदत्त ने तुरंत अपने सहायक को आर्या की देखभाल करने के लिए कहा और तेजी से अपनी कार में बैठ गए। उन्हें घर पहुँचना था, क्योंकि पिछले कई दिनों से विराज की हालत लगातार बिगड़ रही थी।
सात वर्ष पहले विराज अपनी पत्नी देवयानी और नवजात बेटी के साथ पहाड़ी रास्ते से लौट रहा था। तभी उनकी कार नियंत्रण खोकर नदी में जा गिरी। विराज को किसी तरह बचा लिया गया, लेकिन उसकी कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न हो गया। देवयानी और बच्ची का कोई पता नहीं चला।
लोगों ने मान लिया कि वे दोनों नदी में बह गईं।
मगर विराज ने कभी यह सच स्वीकार नहीं किया।
उसने सात वर्षों तक देश के हर कोने में उन्हें खोजा। पैसे, ताकत और संपर्क होने के बावजूद उसे एक भी पक्का सुराग नहीं मिला। धीरे-धीरे उसका शरीर और मन दोनों टूटने लगे।
उस दिन विराज अपने कमरे में व्हीलचेयर पर बैठा खिड़की से बाहर देख रहा था। उसके सामने देवयानी और बच्ची की पुरानी तस्वीर रखी थी।
हरिदत्त अंदर आए।
“विराज, तुम्हें अपने आप को सँभालना होगा। झील किनारा परियोजना की बोली अगले सप्ताह है। अगर वह काम हमारे हाथ से निकल गया, तो कंपनी भारी संकट में पड़ जाएगी।”
विराज ने थकी हुई आवाज में कहा, “मैं कोशिश कर रहा हूँ, दादाजी।”
“सिर्फ कोशिश से काम नहीं चलेगा। तुम्हें जीना होगा।”
विराज कुछ कहता, उससे पहले उसके सीने में तेज दर्द उठा। वह व्हीलचेयर से नीचे गिर पड़ा।
घर में अफरा-तफरी मच गई।
डॉक्टर बुलाए गए। जाँच के बाद डॉक्टर ने हरिदत्त से कहा, “शरीर की बीमारी से ज्यादा समस्या इनके मन में है। इन्होंने खुद को काम और दुख में इतना झोंक दिया है कि शरीर जवाब दे रहा है। कभी-कभी जीने की कोई मजबूत वजह दवा से ज्यादा असर करती है।”
हरिदत्त के मन में तुरंत आर्या का चेहरा उभरा।
अगले दिन उन्होंने आर्या को अपने घर बुलाया।
आर्या सिंघानिया भवन की ऊँची छतों और चमकते फर्श को देखकर कुछ देर तक चुप रही। फिर बोली, “आपका घर बहुत बड़ा है। इसमें लुकाछिपी खेलना बहुत मजेदार होगा।”
हरिदत्त मुस्कराए, लेकिन उनकी आँखें चिंतित थीं।
“आर्या, मुझे तुमसे एक मदद चाहिए।”
“कैसी मदद?”
“मेरा पोता सात वर्ष पहले अपनी बेटी को खो चुका है। वह उसी दुख में मरता जा रहा है। मैं चाहता हूँ कि कुछ दिनों के लिए तुम उसकी बेटी बनकर रहो। शायद तुम्हें देखकर उसके मन में जीने की इच्छा लौट आए।”
आर्या ने गंभीर होकर पूछा, “क्या वह अच्छे आदमी हैं?”
“बहुत अच्छे। बस दुख ने उन्हें कठोर बना दिया है।”
“और अगर उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया?”
“तब मैं तुम्हारे साथ बाहर चला जाऊँगा।”
आर्या कुछ पल सोचती रही। फिर उसने तस्वीर को अपने सीने से लगाया।
“ठीक है। मैं उन्हें पापा कहूँगी। लेकिन बदले में आप मेरे असली पापा को खोजने में मेरी मदद करेंगे।”
हरिदत्त ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“यह मेरा वादा है।”
उस शाम विराज अपने कमरे में बेहोशी और जागने के बीच पड़ा था। हरिदत्त आर्या का हाथ पकड़कर उसे अंदर लाए।
“विराज,” उन्होंने धीमे से कहा, “देखो, मैं किसे लेकर आया हूँ।”
आर्या बिस्तर के पास पहुँची। उसने विराज को ध्यान से देखा। तस्वीर में दिखाई देने वाला आदमी उसके सामने था, मगर अब उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे और चेहरा बहुत कमजोर लग रहा था।
आर्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।
उसे अभिनय करने की जरूरत ही नहीं पड़ी।
उसके मुँह से अपने आप निकला, “पापा…”
विराज की बंद आँखें खुल गईं।
उसने आर्या की तरफ देखा। कुछ क्षणों तक वह साँस लेना तक भूल गया।
“तुमने… मुझे क्या कहा?”
आर्या की आँखें भर आईं।
“पापा। मैं आपकी आर्या हूँ। मैं आपको बहुत दिनों से ढूँढ़ रही थी।”
हरिदत्त ने बात सँभालते हुए कहा, “विराज, देखो इसकी आँखें। बिल्कुल तुम्हारी तरह हैं।”
विराज काँपते हाथ से आर्या का चेहरा छूने लगा।
“सात वर्ष… मैंने तुम्हें सात वर्ष खोजा।”
उसने आर्या को अपने सीने से लगा लिया।
उस पल आर्या को पहली बार पिता की बाँहों का एहसास हुआ। उसका छोटा-सा दिल जैसे लंबे समय बाद अपने घर पहुँचा था।
मगर दरवाजे पर खड़ा विक्रम यह सब देखकर जल उठा।
विक्रम रिश्ते में विराज का चचेरा भाई था। उसके पिता की मृत्यु बहुत पहले हो चुकी थी और उसकी माँ को सिंघानिया परिवार में कभी बराबरी का सम्मान नहीं मिला था। यही बात वर्षों से उसके मन में जहर बनकर जमा थी।
वह कमरे में आया और ताली बजाते हुए बोला, “वाह! कितना भावुक दृश्य है। सड़क से किसी बच्ची को उठाया और खोई हुई बेटी बनाकर ले आए।”
विराज की आँखें लाल हो गईं।
“तुम कहना क्या चाहते हो?”
“यही कि यह बच्ची आपकी बेटी नहीं है। दादाजी ने आपको जीने की वजह देने के लिए एक नाटक रचा है।”
आर्या ने हरिदत्त की ओर देखा।
हरिदत्त कुछ पल चुप रहे, फिर बोले, “हाँ, मैंने इसे कुछ दिनों के लिए तुम्हारी बेटी बनने को कहा था। मगर इसका यह मतलब नहीं कि इसके साथ तुम्हारा रिश्ता झूठा है।”
विराज का चेहरा बुझ गया।
उसने धीरे-धीरे आर्या को अपनी बाँहों से अलग कर दिया।
“तो तुम मेरी बेटी नहीं हो?”
आर्या के होंठ काँपने लगे।
“मुझे खुद नहीं पता। गुरुजी ने कहा था कि तस्वीर वाले आदमी मेरे पापा हैं।”
विक्रम हँसा।
“हर भिखारी बच्चा यही कहेगा अगर सामने अरबपति बैठा हो।”
विराज ने गुस्से से कहा, “विक्रम, बाहर निकल जाओ।”
“मैं सच बोल रहा हूँ। यह बच्ची अशुभ भी हो सकती है। आपकी पत्नी और बेटी जिस दिन हादसे में गायब हुईं, उसी दिन आप अपाहिज हुए थे। हो सकता है आपकी बेटी ही मनहूस हो।”
विराज ने पास रखी काँच की प्याली दीवार पर फेंक दी।
“मेरी बेटी को दोबारा मनहूस कहा तो मैं भूल जाऊँगा कि तुम मेरे भाई हो।”
विक्रम का चेहरा कठोर हो गया।
वह बाहर निकलते हुए बोला, “बहुत जल्द आपको समझ आ जाएगा कि कौन अपना है और कौन मुसीबत।”