Supernatural Mystery

जिस बच्ची को नकली बेटी बनाकर घर लाए, वही निकली अरबपति की असली वारिस

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

एक सात साल की मासूम बच्ची अपने पिता की तलाश में अकेली शहर पहुँचती है। उसके पास न कोई घर है, न परिवार… बस एक पुरानी तस्वीर और यह विश्वास कि तस्वीर में दिखाई देने वाला आदमी ही उसका पिता है।

इसी दौरान वह एक बड़े उद्योगपति परिवार के मुखिया की जान बचाती है। उस परिवार का वारिस विराज सात साल पहले एक हादसे में अपनी पत्नी और छोटी बेटी को खो चुका है और उसी दुख में धीरे-धीरे टूटता जा रहा है।

विराज को बचाने के लिए उस रहस्यमयी बच्ची को कुछ दिनों के लिए उसकी नकली बेटी बनाकर घर लाया जाता है। लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि यह छोटा-सा झूठ एक ऐसे सच का दरवाजा खोल देगा, जो पूरे सिंघानिया परिवार की किस्मत बदल देगा।

बच्ची के पास ऐसी रहस्यमयी शक्तियाँ हैं जिनसे वह जानलेवा बीमारियाँ ठीक कर सकती है, काली शक्तियों को पहचान सकती है और अपने पिता को मौत के मुँह से वापस ला सकती है। मगर उसी घर में कुछ लोग कंपनी और करोड़ों की संपत्ति हथियाने के लिए विराज और उसके पूरे परिवार को खत्म करना चाहते हैं।

फिर घर में आती है एक दूसरी बच्ची, जिसे विराज की असली बेटी बताया जाता है। नकली जाँच रिपोर्ट, चोरी हुआ ताबीज और परिवार की साजिश के बीच वह मासूम बच्ची अपने ही पिता की नजरों में पराई हो जाती है।

लेकिन आखिर वह कौन है?

क्या वह सच में सिर्फ सड़क से मिली एक अनाथ बच्ची है?

उसकी माँ आखिर कहाँ कैद है?

विराज की पत्नी और बेटी सात साल पहले सच में नदी में बह गई थीं या वह हादसा भी किसी बड़ी साजिश का हिस्सा था?

और जब असली सच सामने आएगा, तब क्या विराज अपनी बेटी को वापस पा सकेगा?

देखिए पिता-बेटी के प्यार, विश्वासघात, रहस्य, दिव्य शक्तियों और परिवार के लिए लड़ी गई एक जबरदस्त लड़ाई की भावुक और रोमांचक कहानी।

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आप भाग 5 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 51 मिनट

भाग 5

आर्या द्वारा कुठार चलाने से मीनार में दरार आ गई थी। वह पूरी तरह मुक्त तो नहीं हुई थी, मगर कुछ समय के लिए धरती पर आ सकती थी।

विराज के आँसू रुक नहीं रहे थे।

उसने आर्या का हाथ पकड़कर कहा, “बेटी, मुझे माफ कर दो।”

आर्या ने आँखें फेर लीं।

“आपने मुझसे प्रमाण माँगा था।”

“मैं जीवन भर अपनी गलती सुधारूँगा।”

“अगर फिर किसी ने कागज दिखा दिया तो?”

विराज ने अपनी हथेली उसके सिर पर रखी।

“अब पूरी दुनिया भी कहे कि तुम मेरी बेटी नहीं हो, तब भी मैं विश्वास नहीं करूँगा।”

आर्या धीरे से उसके सीने से लग गई।

“फिर आज कहानी सुनानी पड़ेगी।”

विराज रोते-रोते हँस पड़ा।

मगर परिवार के पास खुश होने का समय नहीं था।

विराज की जाँच से पता चला कि चारुलता ने नकली रिपोर्ट तैयार करवाई थी। उसने पिहू को पैसे देकर विराज की बेटी बनाया और ताबीज चुराया।

विराज ने चारुलता का सामना किया।

पहले वह इंकार करती रही, मगर उसके मोबाइल की छिपी रिकॉर्डिंग सामने आ गई। रिकॉर्डिंग में वह नागेंद्र से पैसे की बात कर रही थी।

चारुलता टूट गई।

“हाँ, मैंने धोखा दिया। मुझे पैसे चाहिए थे। मेरे पिता कर्ज में मरे और तुम्हारे परिवार ने हमारी मदद नहीं की।”

विराज ने कहा, “तुम्हारे पिता को पैसे देने से इनकार इसलिए किया था क्योंकि वह जुए में सब हार जाते थे।”

चारुलता चिल्लाई, “तुम हमेशा खुद को सही समझते हो!”

उसी समय कमरे में धुआँ फैल गया।

नागेंद्र और विक्रम अपने आदमियों के साथ अंदर आ गए।

उन्होंने गायत्री देवी को पकड़ लिया।

नागेंद्र ने मुस्कराकर कहा, “बहुत पारिवारिक बातें हो गईं। अब असली काम करते हैं।”

विराज ने आगे बढ़ने की कोशिश की, मगर अचानक उसके सीने में तेज दर्द उठा। उसके मुँह से खून निकला।

चारुलता घबरा गई।

नागेंद्र हँसा।

“कुछ दिन पहले तुम्हारे कमरे में आत्मभेदी धूप जलाई गई थी। तीन दिनों में तुम्हारी आत्मा शरीर से अलग हो जाएगी। कोई दवा तुम्हें नहीं बचा सकती।”

विराज ने चारुलता की तरफ देखा।

“तुमने यह भी किया?”

चारुलता रो पड़ी।

“मैंने केवल धूप रखी थी। मुझे नहीं पता था कि वह तुम्हें मार देगा।”

विक्रम ने मेज पर कागज रखे।

“कंपनी और दादाजी के हिस्से मेरे नाम कर दो।”

विराज ने खून पोंछते हुए कहा, “दादाजी के हिस्से पहले ही आर्या और कर्मचारियों के नाम हैं।”

विक्रम ने वसीयत छीनकर फाड़ दी।

वकील माधव ने कहा, “इसकी सरकारी प्रति सुरक्षित है।”

विक्रम गुस्से से पागल हो गया।

“तो सबको मार दो!”

नागेंद्र ने हाथ उठाया। काली ऊर्जा का गोला विराज की तरफ बढ़ा।

आर्या उसके सामने आ गई।

“मेरे पापा को हाथ मत लगाना!”

उसकी शक्ति बहुत कम थी, फिर भी उसने सुनहरा घेरा बनाया। हमला रुक गया, मगर आर्या पीछे जा गिरी।

देवयानी ने नागेंद्र पर प्रहार किया।

दोनों की शक्तियाँ टकराईं तो पूरा भवन काँप उठा।

नागेंद्र ने आकाश-भेदी कुठार निकाल लिया।

“यह अब मेरे पास है। इसके सामने तुम कुछ नहीं हो।”

देवयानी ने कहा, “दिव्य वस्तु किसी लालची आदमी की नहीं होती।”

युद्ध शुरू हो गया।

नागेंद्र ने काली बिजली बरसाई। देवयानी ने सफेद प्रकाश से उसका सामना किया। गुरु सिद्धनाथ भी वहाँ पहुँच गए और विक्रम के आदमियों को मंत्र से बाँध दिया।

विक्रम गायत्री देवी को लेकर भागने लगा, मगर पिहू ने उसके पैर पर खिलौना फेंक दिया।

वह गिर पड़ा।

पिहू रोते हुए बोली, “आपने मुझे झूठ बोलना सिखाया। अब मैं आपकी बात नहीं मानूँगी।”

आर्या ने गायत्री देवी को मुक्त किया।

तभी आकाश फटने जैसी आवाज हुई।

दिव्य मीनार का रक्षक भैरवनाथ प्रकट हुआ। वह स्वर्ग का शक्तिशाली प्रहरी था।

उसने देवयानी से कहा, “तुमने अपनी कैद तोड़ी है। तुम्हें वापस चलना होगा।”

आर्या उसके सामने खड़ी हो गई।

“मेरी माँ कहीं नहीं जाएँगी।”

भैरवनाथ ने उसे धक्का दिया।

“आधी मानव और आधी दिव्य संतान, अपनी सीमा में रहो।”

विराज कमजोर शरीर के बावजूद उठ खड़ा हुआ।

“मेरी बेटी से दूर रहो।”

भैरवनाथ हँसा।

“एक साधारण मनुष्य मुझे रोकेगा?”

“पिता साधारण नहीं होता।”

भैरवनाथ ने विराज पर वार किया। देवयानी बीच में आ गई और घायल हो गई।

आर्या चीखी, “माँ!”

उसके भीतर दबाई गई सारी शक्ति अचानक जाग उठी। उसकी सुनहरी पिन विशाल दंड में बदल गई और उसके गले का आधा ताबीज चमकने लगा।

विराज के पास रखा दूसरा आधा ताबीज उड़कर उससे जुड़ गया।

पूरा ताबीज बनते ही आर्या के चारों ओर सुनहरी अग्नि फैल गई।

गुरु सिद्धनाथ ने हैरानी से कहा, “इसने अपनी असली शक्ति जगा ली।”

भैरवनाथ ने हमला किया।

आर्या ने दंड से उसे रोक दिया।

“देवता हो तो क्या किसी को भी परेशान करोगे?”

“तुम मुझे चुनौती देती हो?”

“जो मेरे माँ-पापा को चोट पहुँचाएगा, मैं उसे जरूर चुनौती दूँगी।”

दोनों के बीच भयानक युद्ध हुआ। भवन की छत टूट गई, आकाश में बिजली घूमने लगी और पूरा शहर दूर से चमक देख रहा था।

नागेंद्र ने मौका पाकर आर्या पर पीछे से कुठार चलाया, मगर गुरु सिद्धनाथ ने वार रोक लिया।

“अपने से छोटी बच्ची पर पीछे से हमला करते शर्म नहीं आती?”

नागेंद्र ने कहा, “शक्ति में उम्र नहीं देखी जाती।”

सिद्धनाथ ने उसकी कलाई पकड़कर कुठार छीन लिया।

देवयानी ने अपनी शक्ति से नागेंद्र की काली विद्या को बंद कर दिया।

विक्रम भागने लगा, मगर पुलिस बाहर पहुँच चुकी थी। वकील माधव ने पहले ही सूचना दे दी थी।

चारुलता ने रोते हुए अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसने बताया कि हरिदत्त और डॉक्टर ईश्वर की हत्या भी विक्रम और नागेंद्र ने करवाई थी।

विक्रम चिल्लाया, “यह झूठ बोल रही है!”

मगर उसके खिलाफ रिकॉर्डिंग, बैंक लेनदेन और कई गवाह मौजूद थे।

उधर आर्या ने अंतिम प्रहार करके भैरवनाथ को घुटनों पर ला दिया।

भैरवनाथ ने कहा, “तुमने स्वर्गीय नियम तोड़े हैं।”

आर्या ने जवाब दिया, “जो नियम माँ को बेटी से और पत्नी को पति से अलग करे, वह नियम गलत है।”

आकाश से एक गंभीर आवाज गूँजी।

“देवयानी की सजा पूरी मानी जाती है। उसके परिवार के प्रेम और त्याग ने उसके अपराध का भार मिटा दिया है।”

भैरवनाथ ने सिर झुका लिया और प्रकाश में गायब हो गया।

अब सबसे बड़ी चिंता विराज था।

आत्मभेदी धूप का जहर उसके पूरे शरीर में फैल चुका था। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया।

आर्या ने उसे जमीन पर लिटाया।

“पापा, आँखें बंद मत करना।”

विराज ने कमजोर मुस्कान के साथ कहा, “मैंने तुमसे बहुत सारी कहानियाँ सुनाने का वादा किया है। अभी नहीं जाऊँगा।”

आर्या ने अपनी हथेली उसके सीने पर रखी।

देवयानी ने उसे रोका।

“बेटी, यह जहर खींचने में तुम्हारी सारी शक्ति चली जाएगी।”

“शक्ति फिर आ जाएगी। पापा नहीं आएँगे।”

आर्या ने जहर अपने भीतर खींचना शुरू किया। उसके हाथ काले पड़ने लगे।

विराज ने उसका हाथ हटाने की कोशिश की।

“नहीं, आर्या।”

“आप चुप रहिए। मरीज ज्यादा बोलता है तो दवा नाराज हो जाती है।”

विराज की आँखों से आँसू निकल पड़े। यही बात आर्या ने पहली बार उसका इलाज करते समय कही थी।

देवयानी और सिद्धनाथ ने भी अपनी ऊर्जा आर्या को दी।

कुछ देर बाद विराज के शरीर से काला धुआँ बाहर निकला और सुनहरी आग में जल गया।

विराज की साँस सामान्य हो गई।

आर्या थककर उसके सीने पर गिर गई।

सुबह की पहली किरण टूटे हुए भवन पर पड़ी।

विक्रम, नागेंद्र और उनके साथी गिरफ्तार हो चुके थे। चारुलता को भी अपने अपराधों की सजा मिलने वाली थी। मगर विराज ने पिहू को अपराधी नहीं माना।

“उसका इस्तेमाल किया गया है,” उसने कहा, “इसमें उसकी कोई गलती नहीं।”

पिहू रोते हुए आर्या के पास आई।

“क्या तुम मुझसे नाराज हो?”

आर्या ने पूछा, “तुमने मेरी चॉकलेट खाई थी?”

पिहू ने सिर झुका लिया।

“हाँ।”

“तो थोड़ी नाराज हूँ।”

पिहू रोने लगी।

आर्या मुस्कराकर बोली, “अगली बार अपनी चॉकलेट का आधा हिस्सा मुझे देना। फिर दोस्ती पक्की।”

दोनों बच्चियाँ गले लग गईं।

कुछ सप्ताह बाद सिंघानिया समूह के बड़े सभागार में एक समारोह रखा गया। पुराने कर्मचारी, हिस्सेदार, शहर के लोग और परिवार के सदस्य वहाँ मौजूद थे।

विराज अपने पैरों पर चलकर मंच पर पहुँचा। एक तरफ देवयानी थी और दूसरी तरफ आर्या।

उसने सबके सामने कहा, “आज मैं किसी कंपनी के मुखिया के रूप में नहीं, एक पिता के रूप में बोल रहा हूँ। मेरी बेटी सात वर्ष तक मुझसे दूर रही। फिर वह मेरे घर आई, मेरी जान बचाई, मेरे परिवार को बचाया और मेरे टूटे हुए जीवन को दोबारा जोड़ा।”

आर्या की आँखें भर आईं।

विराज ने आगे कहा, “मैं उसे पहचान नहीं पाया। मैंने कागजों पर भरोसा किया और उसके दिल पर नहीं। यह मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी।”

वह आर्या के सामने घुटनों पर बैठ गया।

“बेटी, क्या तुम मुझे फिर से अपना पापा स्वीकार करोगी?”

आर्या ने जल्दी से उसे उठाया।

“पापा बच्चों के सामने घुटनों पर नहीं बैठते।”

“तो जवाब क्या है?”

आर्या ने उसकी गर्दन में बाँहें डाल दीं।

“आपको बहुत सारी कहानियाँ सुनानी हैं। इसलिए माफ किया।”

पूरा सभागार तालियों से गूँज उठा।

विराज ने घोषणा की कि आर्या सिंघानिया समूह की कानूनी वारिस होगी। साथ ही हरिदत्त की इच्छा के अनुसार कंपनी के पुराने और मेहनती कर्मचारियों को हिस्सेदारी दी जाएगी।

पिहू की शिक्षा और भविष्य की जिम्मेदारी भी विराज और देवयानी ने ले ली।

गुरु सिद्धनाथ समारोह के पीछे बैठे मिठाई खा रहे थे।

आर्या उनके पास पहुँची।

“गुरुजी, आप पहाड़ वापस जा रहे हैं?”

“हाँ। शहर में बहुत शोर है।”

“मुझे भी चलना होगा?”

सिद्धनाथ ने विराज और देवयानी की तरफ देखा।

“अब तेरे पास माँ भी है और पिता भी। बूढ़े गुरु की क्या जरूरत?”

आर्या ने उन्हें गले लगा लिया।

“आप भी परिवार हैं।”

सिद्धनाथ की आँखें नम हो गईं, मगर उन्होंने तुरंत मुँह फेर लिया।

“ज्यादा भावुक मत हो। मेरी मिठाई गिर जाएगी।”

रात को आर्या विराज और देवयानी के बीच लेटी थी।

उसने कहा, “पापा, कहानी सुनाओ।”

विराज ने पूछा, “आज कौन-सी?”

“एक ऐसी बच्ची की, जो अपने पापा को खोजने शहर आई थी।”

“फिर क्या हुआ?”

“पहले पापा ने उसे नहीं पहचाना। फिर बहुत डाँट पड़ी।”

देवयानी ने विराज की तरफ देखकर कहा, “डाँट अभी बाकी है।”

विराज ने घबराकर पूछा, “किसकी?”

“तुम्हारी।”

आर्या हँसने लगी।

विराज ने दोनों को अपनी बाँहों में भर लिया।

“फिर उस बच्ची ने अपने माँ-पापा को ढूँढ़ लिया और वे हमेशा साथ रहने लगे।”

आर्या ने आँखें बंद करते हुए पूछा, “और कोई उन्हें अलग करने नहीं आया?”

विराज ने उसके माथे को चूमा।

“अब कोई नहीं। क्योंकि इस बार तुम्हारे माँ-पापा दोनों तुम्हारे साथ हैं।”

खिड़की से चाँद की रोशनी कमरे में आ रही थी। आर्या के गले में पूरा हुआ हरा ताबीज धीरे-धीरे चमक रहा था।

दोस्तों, कभी-कभी परिवार खून की जाँच से नहीं, मुश्किल समय में दिए गए साथ से पहचाना जाता है। मगर इस कहानी में तो किस्मत ने दोनों बातें एक साथ साबित कर दीं। जिसे नकली बेटी समझकर घर लाया गया था, वही उस घर की असली संतान, असली वारिस और सबसे बड़ी ताकत निकली।

और सबसे खूबसूरत बात यह थी कि आर्या को आखिरकार वह सब मिल गया, जिसकी तलाश में वह अकेली शहर आई थी—माँ की गोद, पिता की बाँहें और एक ऐसा घर जहाँ उसे दोबारा कभी यह साबित नहीं करना था कि वह किसकी बेटी है।

क्योंकि अब पूरा सिंघानिया परिवार गर्व से कहता था—

“आर्या हमारी खुशकिस्मती नहीं, हमारी जिंदगी है।”

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