भाग 4
वह घोषणा करने वाला था कि आर्या उसकी बेटी और कंपनी की वारिस होगी, तभी उसकी रिश्तेदार चारुलता एक बच्ची के साथ वहाँ पहुँची।
बच्ची का नाम पिहू था।
चारुलता ने कहा, “विराज, तुम्हारी असली बेटी जीवित है।”
पूरे समारोह में सन्नाटा छा गया।
चारुलता ने बताया कि सात वर्ष पहले नदी के किनारे एक किसान को पिहू मिली थी। उसने उसे पाल लिया। किसान की मृत्यु के बाद पिहू अनाथालय पहुँच गई, जहाँ चारुलता ने उसे खोज लिया।
उसने डीएनए जाँच की रिपोर्ट दिखाई।
रिपोर्ट के अनुसार पिहू ही विराज की बेटी थी।
विराज ने रिपोर्ट हाथ में लेकर पिहू की तरफ देखा। उसके चेहरे की बनावट सच में कुछ हद तक विराज से मिलती थी।
हरिदत्त भावुक हो गए।
“मेरी असली पड़पोती वापस आ गई।”
आर्या चुपचाप कोने में खड़ी थी।
विराज उसके पास आया।
“आर्या…”
चारुलता ने बीच में कहा, “अब असली बेटी मिल गई है। इस बच्ची को झूठी उम्मीद देना ठीक नहीं होगा।”
विराज ने आर्या का हाथ पकड़कर कहा, “तुम हमेशा इस घर में रहोगी।”
लेकिन उसी शाम सब कुछ बदल गया।
विराज ने पिहू के गले में आधा हरा ताबीज देखा।
देवयानी ने हादसे से पहले अपनी बेटी को ऐसा ही ताबीज पहनाया था। दूसरा आधा विराज के पास था।
दोनों हिस्से पूरी तरह जुड़ गए।
विराज की आँखों में विश्वास उतर आया।
“पिहू सच में मेरी बेटी है।”
आर्या ने ताबीज देखा और घबरा गई।
“यह मेरा ताबीज है। कल तक मेरे गले में था।”
चारुलता ने उसे डाँट दिया।
“झूठ मत बोलो।”
आर्या ने विराज की तरफ देखा।
“पापा, मैं झूठ नहीं बोल रही।”
विराज के मन में पहले से जाँच रिपोर्ट का बोझ था।
उसने थकी आवाज में कहा, “आर्या, तुम्हारे पास कोई प्रमाण है?”
“आपको भी प्रमाण चाहिए?”
विराज चुप रहा।
यही चुप्पी आर्या के छोटे दिल को तोड़ गई।
अगले कुछ दिनों में चारुलता ने घर का माहौल पूरी तरह बदल दिया। पिहू को आर्या की जगह दी जाने लगी। विराज ने कहा कि पिहू का नाम वही रखा जाएगा जो उसने अपनी खोई बेटी के लिए चुना था।
आर्या से उसका नाम तक छिनने लगा।
चारुलता उसे ताना देती, “तुम सड़क से उठाई हुई बच्ची हो। विराज ने दया करके तुम्हें रखा है।”
आर्या भूखी रहती, फिर भी किसी से कुछ नहीं कहती। वह रात में अकेले बैठकर अपनी बंद शक्तियों को जगाने का अभ्यास करती।
एक दिन विराज दोनों बच्चियों के लिए विदेशी चॉकलेट लेकर आया। चारुलता ने आर्या का डिब्बा भी पिहू को दे दिया।
“पहले पिहू से माफी माँगो।”
“लेकिन मैंने कुछ किया ही नहीं।”
“फिर तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।”
आर्या ने चॉकलेट की तरफ देखा, फिर मुँह फेर लिया।
“मुझे नहीं चाहिए।”
उस रात विराज कहानी सुनाने नहीं आया। वह पिहू को डॉक्टर के पास ले गया था।
आर्या उसके कमरे के बाहर काफी देर बैठी रही।
फिर उसने एक कागज पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा—
“पापा, आपको आपकी असली बेटी मिल गई है। अब आपको मेरी जरूरत नहीं है। आपने मुझे कुछ दिनों के लिए बहुत प्यार दिया। मैं उसे कभी नहीं भूलूँगी। दादाजी और दादीजी का ध्यान रखना। मैं माँ को खुद खोज लूँगी।”
सुबह होने से पहले आर्या सिंघानिया भवन से निकल गई।
जब विराज लौटा और पत्र पढ़ा, उसके सीने में ऐसा दर्द उठा जैसे कोई हिस्सा टूटकर अलग हो गया हो।
“आर्या कहाँ है?”
चारुलता ने लापरवाही से कहा, “शायद अपने असली घर चली गई।”
विराज चिल्लाया, “उसका कोई घर नहीं था! यही उसका घर था।”
उसने पूरे शहर में आर्या को खोजने के आदेश दिए।
उधर हरिदत्त को चारुलता और पिहू की कहानी पर शक हो चुका था। उन्होंने विराज, आर्या और पिहू के बाल गुप्त रूप से जाँच के लिए भेजे।
रिपोर्ट देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।
पिहू का विराज से कोई रिश्ता नहीं था।
आर्या ही विराज की असली बेटी थी।
हरिदत्त तुरंत घर लौटने निकले, मगर रास्ते में उनकी कार को जानबूझकर टक्कर मार दी गई।
कार खाई में गिर गई।
खबर आई कि हरिदत्त सिंघानिया की मृत्यु हो गई है।
पूरा परिवार शोक में डूब गया।
मगर सबसे बड़ा सच अब भी हरिदत्त की बंद मुट्ठी में था—वह रिपोर्ट, जो साबित करती थी कि जिस बच्ची को सबने घर से जाने दिया, वही इस परिवार की असली वारिस थी।
हरिदत्त सिंघानिया की मृत्यु ने पूरे नवरंगपुर को हिला दिया। शहर के बड़े व्यापारी, कर्मचारी और पुराने साथी अंतिम दर्शन के लिए सिंघानिया भवन पहुँचे।
विराज दादाजी के शव के पास बैठा था। एक ही दिन में उसने पिता जैसे दादाजी और बेटी जैसी आर्या, दोनों को खो दिया था।
उसके मन में बार-बार आर्या का पत्र घूम रहा था।
“आपने मुझे कुछ दिनों के लिए बहुत प्यार दिया…”
विराज ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया।
“मैंने उसे जाने क्यों दिया?”
गायत्री देवी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“तुम्हें धोखा दिया गया है, बेटा। मगर अभी भी देर नहीं हुई। उसे खोजो।”
चारुलता पास खड़ी सब सुन रही थी। उसके भीतर घबराहट बढ़ती जा रही थी, क्योंकि हरिदत्त ने मरने से पहले किसी वकील से बात की थी। उसे डर था कि कहीं उन्होंने असली जाँच की रिपोर्ट या वसीयत सुरक्षित न कर दी हो।
दूसरी तरफ विक्रम और नागेंद्र इस अवसर का फायदा उठाना चाहते थे।
अंतिम संस्कार के अगले ही दिन विक्रम कंपनी के हिस्सेदारों के सामने पहुँच गया।
“अब दादाजी नहीं रहे। कंपनी को नए अध्यक्ष की जरूरत है।”
विराज ने ठंडी नजरों से उसे देखा।
“उनकी चिता की राख भी ठंडी नहीं हुई और तुम्हें कुर्सी की चिंता हो गई?”
विक्रम ने कहा, “भावनाओं से कंपनी नहीं चलती।”
“और लालच से परिवार नहीं चलता।”
विक्रम ने दावा किया कि उसके पिता भी कंपनी के संस्थापकों में थे, इसलिए अध्यक्ष पद पर उसका अधिकार है। मगर विराज ने बताया कि पुराने अपराधों के कारण उसके पिता के सभी हिस्से बहुत पहले वापस ले लिए गए थे।
तभी वकील माधव कमरे में आए।
उन्होंने हरिदत्त की अंतिम वसीयत पढ़ी।
“हरिदत्त सिंघानिया ने अपने निजी हिस्सों का आधा भाग अपनी पड़पोती आर्या और बाकी आधा कंपनी के पुराने व मेहनती कर्मचारियों के नाम किया है।”
विक्रम गुस्से से खड़ा हो गया।
“उस सड़क की बच्ची के नाम आधी संपत्ति?”
विराज ने पहली बार गौर किया कि दादाजी ने पिहू का नहीं, आर्या का नाम लिखा था।
उसके मन में संदेह गहरा हो गया।
“दादाजी को ऐसा क्या पता चल गया था?”
उसने अपने सहायक से कहा कि दादाजी ने दुर्घटना से पहले किन लोगों से मुलाकात की थी, इसका पूरा पता लगाया जाए।
कुछ घंटों बाद जानकारी मिली कि हरिदत्त मृत्यु से पहले एक निजी अस्पताल गए थे और वहाँ वरिष्ठ जाँच विशेषज्ञ डॉक्टर ईश्वर से मिले थे। उसी रात डॉक्टर ईश्वर की भी संदिग्ध दुर्घटना में मृत्यु हो गई।
विराज समझ गया कि यह साधारण हादसा नहीं था।
वह उसी अस्पताल पहुँचा। पुराने रिकॉर्ड गायब थे और कंप्यूटर व्यवस्था को जानबूझकर खराब किया गया था।
“किसी को डर था कि सच बाहर आ जाएगा,” विराज ने कहा।
उधर आर्या शहर से बाहर एक पुराने मंदिर में छिपी थी। उसकी शक्तियाँ बहुत कम बची थीं और नागेंद्र के लोग उसे खोज रहे थे।
वह मंदिर की टूटी सीढ़ियों पर बैठकर विराज की तस्वीर देख रही थी।
“पापा ने मुझे नहीं पहचाना,” उसने धीरे से कहा, “लेकिन मैं फिर भी उन्हें मुसीबत में नहीं छोड़ सकती।”
तभी पीछे से एक आवाज आई।
“जिस बच्ची को स्वर्गीय बिजली नहीं मार सकी, उसे दुख ने रुला दिया?”
आर्या मुड़ी। उसके गुरु सिद्धनाथ सामने खड़े थे।
उनके कपड़े धूल से भरे थे और हाथ में मिठाई का डिब्बा था।
आर्या दौड़कर उनसे लिपट गई।
“गुरुजी!”
“अरे, धीरे। बूढ़ी हड्डियाँ हैं।”
“आप मुझे लेने आए हैं?”
“हाँ। पहाड़ पर वापस चल।”
आर्या ने सिर हिला दिया।
“मैं पापा को छोड़कर नहीं जाऊँगी।”
“उन्होंने तुझे घर से जाने दिया।”
“क्योंकि उन्हें धोखा दिया गया। वह बुरे नहीं हैं।”
गुरु सिद्धनाथ ने मुस्कराकर कहा, “तू बिल्कुल अपनी माँ जैसी है। खुद घायल होगी, मगर अपनों का साथ नहीं छोड़ेगी।”
उन्होंने आर्या की नाड़ी देखी।
“तेरी दिव्य शक्ति बंद है। रोज दो घंटे ध्यान करेगी तो धीरे-धीरे लौटेगी।”
“दो महीने लगेंगे?”
“कम से कम।”
“मेरे पास इतना समय नहीं है।”
उधर सिंघानिया भवन में चारुलता को लगने लगा था कि विराज सच के करीब पहुँच रहा है। उसने पिहू को बीमार दिखाकर विराज का ध्यान भटकाने की योजना बनाई।
नागेंद्र ने उसे एक जहरीला चूर्ण दिया।
चारुलता ने वही चूर्ण एक खिलौने पर लगा दिया और खिलौना आर्या के पुराने सामान में रख दिया। फिर उसने गायत्री देवी के हाथों वह खिलौना पिहू को भिजवा दिया, यह कहकर कि आर्या ने अस्पताल जाते समय पिहू के लिए छोड़ा था।
कुछ घंटों बाद पिहू की हालत बिगड़ गई।
डॉक्टरों ने कहा कि उसे दुर्लभ जहर दिया गया है और छह घंटे में वह कोमा में जा सकती है।
खिलौने पर जहर मिलने के बाद चारुलता ने सबके सामने कहा, “यह आर्या ने किया है। वह पिहू से जलती थी।”
विराज ने तुरंत इंकार किया।
“आर्या किसी बच्चे को नुकसान नहीं पहुँचा सकती।”
“तो जहर उसके खिलौने पर कैसे आया?”
गायत्री देवी को आर्या पर पूरा भरोसा था। उन्होंने मंदिर जाकर उसे खोज निकाला।
“बेटी, पिहू मर रही है।”
आर्या ने पूछा, “पापा क्या सोचते हैं?”
“वह कहते हैं तुमने कुछ नहीं किया।”
आर्या की आँखों में हल्की चमक लौटी।
वह तुरंत अस्पताल पहुँची।
पिहू का शरीर नीला पड़ रहा था। डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी थी।
आर्या ने कहा, “मैं इसे बचा सकती हूँ।”
“तुम्हारी शक्ति तो चली गई है,” गुरु सिद्धनाथ ने चेतावनी दी।
“थोड़ी बची है।”
“उसे इस्तेमाल किया तो तुम्हारी जान जा सकती है।”
आर्या ने पिहू की तरफ देखा।
“इसकी कोई गलती नहीं है।”
उसने अपनी हथेलियाँ पिहू के सीने पर रखीं और बची हुई शक्ति उसके शरीर में डालने लगी। जहर धीरे-धीरे बाहर निकल आया।
पिहू ने आँखें खोल दीं।
मगर आर्या बेहोश होकर गिर गई।
विराज ने उसे बाँहों में उठाया।
“तुम हर बार सबको बचाती हो। लेकिन तुम्हें कौन बचाएगा?”
आर्या ने कमजोर आँखें खोलीं।
“मेरे पापा।”
उस एक वाक्य ने विराज की आत्मा तक को हिला दिया।
उसी समय कमरे में एक तेज हवा का झोंका आया। एक सफेद वस्त्र पहनी महिला सामने खड़ी थी। उसके लंबे बाल बिखरे थे और आँखों में आकाश जैसी चमक थी।
विराज उसे देखते ही जम गया।
“देवयानी?”
महिला ने आर्या को उसकी बाँहों से लिया।
“मेरी बेटी को इतनी चोट किसने पहुँचाई?”
विराज की आवाज काँपने लगी।
“आर्या… हमारी बेटी है?”
देवयानी ने क्रोध से उसकी तरफ देखा।
“तुम इतने वर्षों में अपनी ही बेटी की आँखें नहीं पहचान पाए?”
विराज के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“मुझे नकली जाँच दिखाई गई थी। ताबीज…”
“ताबीज चुराया गया था।”
देवयानी ने बताया कि सात वर्ष पहले उनकी कार का हादसा नहीं हुआ था। नागेंद्र और उसके साथियों ने कार को नदी में गिराया था। देवयानी ने अपनी शक्ति से आर्या को बचाया, मगर स्वर्ग के नियम तोड़ने के कारण उसे दंड मिला और दिव्य मीनार में कैद कर दिया गया। गुरु सिद्धनाथ ने आर्या को पाला।