भाग 2
तनाव के कारण विराज की साँस अचानक तेज हो गई। उसका चेहरा नीला पड़ने लगा।
हरिदत्त घबरा गए।
“डॉक्टर को बुलाओ!”
आर्या ने विराज की कलाई पकड़ ली।
“डॉक्टर आने तक बहुत देर हो जाएगी।”
उसने अपने बालों से सुनहरी पिन निकाली। पिन के भीतर से तीन बेहद पतली सुइयाँ बाहर आ गईं।
विराज ने मुश्किल से पूछा, “तुम क्या कर रही हो?”
“आपकी नसों में कई जगह रास्ता बंद है। मैं उसे खोल रही हूँ।”
आर्या ने उसकी गर्दन, कलाई और सीने के पास सुइयाँ लगाईं। फिर अपनी हथेलियाँ उसके सीने पर रखकर आँखें बंद कर लीं।
उसकी उँगलियों से हल्की सुनहरी रोशनी निकली।
कुछ ही क्षणों में विराज की साँस सामान्य होने लगी।
उसने हैरानी से अपने हाथों को देखा।
“मेरा हाथ… इसमें पहले इतनी ताकत नहीं थी।”
आर्या ने गर्व से कहा, “मैंने कहा था न, मैं अपने पापा को मरने नहीं दूँगी।”
“लेकिन मैं तुम्हारा…”
विराज अपनी बात पूरी नहीं कर पाया।
आर्या ने उसका मुँह हथेली से बंद कर दिया।
“अभी मत बोलिए। मरीज ज्यादा बोलता है तो दवा नाराज हो जाती है।”
हरिदत्त हँस पड़े।
“यह बच्ची सच में हमारे घर की खुशकिस्मती है।”
उस दिन के बाद आर्या सिंघानिया भवन में रहने लगी। विराज ने उसके लिए सबसे सुंदर कमरा तैयार करवाया, मगर आर्या रात को अक्सर उसके कमरे में आ जाती और कहती, “पापा, पहाड़ों पर गुरुजी खर्राटे लेते थे। यहाँ अकेले नींद नहीं आती।”
विराज उसे कहानी सुनाता।
कभी राजकुमारी की, कभी बहादुर योद्धा की और कभी ऐसी बच्ची की जो अपने पिता को बचाने के लिए पूरी दुनिया से लड़ गई।
आर्या हर कहानी के अंत में पूछती, “वह बच्ची जीती न?”
विराज कहता, “हाँ, क्योंकि उसके पिता ने उसका साथ कभी नहीं छोड़ा।”
धीरे-धीरे दोनों के बीच ऐसा रिश्ता बन गया जिसे कोई झूठा नहीं कह सकता था।
एक दिन खाने की मेज पर आर्या ने इतने सारे पकवान देखकर पूछा, “पापा, अगर मैंने यह सब खा लिया तो आप गरीब हो जाएँगे?”
विराज पहली बार खुलकर हँसा।
“तुम खाती रहो। पैसे खत्म हुए तो तुम्हारा पापा और कमा लेगा।”
“सच?”
“बिल्कुल।”
आर्या ने मिठाई का पूरा कटोरा अपनी तरफ खींच लिया।
“फिर तो मैं आज आपकी मेहनत बढ़ाने वाली हूँ।”
दोस्तों, परिवार के भीतर थोड़ी खुशी लौटी ही थी कि दूसरी तरफ विक्रम अपने तांत्रिक मामा नागेंद्र के साथ अगली चाल बना रहा था।
नागेंद्र कई वर्षों तक हिमालय और श्मशान की काली विद्याओं का अभ्यास कर चुका था। उसका चेहरा शांत रहता था, मगर आँखों में ऐसी ठंडक थी कि सामने वाला बेचैन हो जाए।
विक्रम ने कहा, “दादाजी हर बार बच जाते हैं। विराज भी उस बच्ची के आने के बाद बेहतर होने लगा है।”
नागेंद्र ने आँखें बंद कर कुछ क्षण ध्यान लगाया।
“वह बच्ची साधारण नहीं है। उसके भीतर जन्मजात दिव्य ऊर्जा है।”
“तो उसे मार दीजिए।”
“इतनी जल्दी नहीं। पहले यह जानना होगा कि उसकी शक्ति का स्रोत क्या है। मगर चिंता मत करो। जब तक हरिदत्त जीवित है, विराज को कंपनी से हटाना मुश्किल है। पहले बूढ़े को रास्ते से हटाते हैं।”
अगली रात हरिदत्त अपने कमरे में सो रहे थे। नागेंद्र ने दूर बैठकर काला मंत्र चलाया। भवन की दीवारों में छिपे काले धुएँ जैसे साए हरिदत्त के कमरे की तरफ बढ़ने लगे।
आर्या अपने कमरे में सोते-सोते अचानक उठ बैठी।
उसकी सुनहरी पिन गर्म हो गई थी।
“कोई दादाजी को नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहा है।”
वह नंगे पाँव दौड़ती हुई हरिदत्त के कमरे में पहुँची। कमरे के चारों कोनों में काली परछाइयाँ घूम रही थीं।
आर्या ने अपनी हथेली से हवा में एक गोल निशान बनाया।
“सुनहरी ज्वाला, अँधेरा जलाओ!”
उसकी हथेली से निकली रोशनी ने पूरे कमरे को भर दिया। काली परछाइयाँ चीखती हुई धुएँ में बदल गईं।
हरिदत्त जाग गए।
“आर्या, क्या हुआ?”
आर्या ने मुस्कराकर कहा, “कुछ गंदे कीड़े कमरे में घुस आए थे। मैंने साफ कर दिए।”
मगर उसकी नाक से हल्का खून निकल आया था।
उसने जल्दी से उसे पोंछ लिया ताकि हरिदत्त न देख सकें।
अगले दिन विराज आर्या को कपड़े खरीदने बड़े बाजार में ले गया। वहीं आर्या ने एक आदमी को देखकर तस्वीर निकाल ली।
उस आदमी का नाम कबीर अरोड़ा था। वह नवरंगपुर के अपराध जगत और कई अवैध कारोबारों से जुड़ा था।
आर्या दौड़कर उसके पास पहुँची।
“पापा!”
कबीर और उसके साथी हँस पड़े।
“यह कौन है?”
आर्या ने तस्वीर दिखाई।
“गुरुजी ने कहा था कि तस्वीर वाले मेरे पापा हैं। आप उनसे थोड़े मिलते हैं।”
कबीर ने तस्वीर छीनकर जमीन पर फेंक दी।
“दूर हट, भिखारन। मेरे नाम पर पैसे माँगने आई है?”
उसके साथ खड़ी महिला ने आर्या को धक्का दिया।
“आजकल बच्चे भी बड़े चालाक हो गए हैं। किसी अमीर आदमी को पापा बोलो और पैसा ऐंठो।”
आर्या जमीन पर गिर गई।
कबीर ने हाथ उठाया ही था कि किसी ने उसकी कलाई पकड़ ली।
विराज सामने खड़ा था। वह अब भी व्हीलचेयर पर था, मगर उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि कबीर दर्द से कराह उठा।
“मेरी बेटी से माफी माँगो।”
कबीर ने गुस्से से कहा, “तुम्हारी बेटी? शहर की सड़क से उठाई हुई बच्ची को बेटी बना लिया?”
“माफी माँगो।”
“वरना क्या करोगे?”
विराज ने उसकी कलाई मोड़ दी।
कबीर घुटनों पर आ गया।
आर्या की आँखें चमक उठीं।
“मेरे पापा सबसे ताकतवर हैं!”
कबीर ने मजबूरी में माफी माँगी, लेकिन जाते-जाते धमकी दी, “इस अपमान की कीमत तुम्हारी कंपनी चुकाएगी।”
उसी शाम सिंघानिया समूह के शेयर तेजी से गिरने लगे। कई बड़े निवेशकों ने अचानक पैसा निकाल लिया। समाचार चैनलों पर कंपनी के डूबने की खबर चलने लगी।
विराज तुरंत ऑफिस के लिए निकला।
आर्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“जल्दी वापस आना। आज कहानी पूरी करनी है।”
विराज ने उसके माथे को चूमा।
“मैं वादा करता हूँ।”
लेकिन रात गहराती गई और विराज वापस नहीं आया।
उधर विक्रम ने विराज को सुनसान पहाड़ी रास्ते पर रोक लिया था। उसके आदमियों ने विराज की माँ गायत्री देवी को भी पकड़ रखा था।
विक्रम ने कंपनी के हिस्से सौंपने वाले कागज विराज के सामने रखे।
“हस्ताक्षर करो।”
विराज ने कागज फाड़ दिया।
“कंपनी तुम्हारे जैसे लालची आदमी को कभी नहीं मिलेगी।”
विक्रम ने गायत्री देवी के गले पर चाकू रख दिया।
“अपनी जान की परवाह नहीं है तो माँ की कर लो।”
“उन्हें छोड़ दो।”
“हस्ताक्षर करो।”
गायत्री देवी चिल्लाईं, “विराज, मत करना! तुम्हारे दादाजी ने यह कंपनी मेहनत से बनाई है।”
विक्रम ने उन्हें थप्पड़ मार दिया।
विराज की आँखों में खून उतर आया।
“उन्हें दोबारा हाथ लगाया तो मैं तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ूँगा।”
“व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे मुझे मारोगे?”
विराज ने माँ को बचाने के लिए मजबूरी में हस्ताक्षर कर दिए।
विक्रम हँस पड़ा।
“अब कंपनी मेरी है। और तुम्हारी जरूरत खत्म।”
उसके आदमियों ने विराज और गायत्री देवी को कार में बाँध दिया। योजना थी कि कार को पहाड़ी से नीचे धकेल दिया जाए और घटना को दुर्घटना बता दिया जाए।
उसी समय सिंघानिया भवन में आर्या की सुनहरी पिन जलने लगी।
वह घबरा गई।
“पापा खतरे में हैं।”
आर्या ने आँखें बंद कीं। उसने विराज को मन में पुकारा। कुछ क्षण बाद उसे पहाड़ी, कार और विक्रम की हँसी दिखाई दी।
वह कमरे से दौड़ी और हरिदत्त से बोली, “दादाजी, पापा को बचाना होगा।”
“तुम्हें कैसे पता?”
“बाद में बताऊँगी।”
आर्या ने जमीन पर अपना ताबीज रखा और मंत्र बोला। उसके चारों ओर सुनहरी रोशनी का घेरा बना। अगले ही पल वह हरिदत्त की आँखों के सामने से गायब हो गई।
पहाड़ी पर विक्रम के आदमी कार को धक्का देने वाले थे कि अचानक आकाश में बिजली चमकी। उनके सामने आर्या खड़ी थी।
विक्रम हँसा।
“एक छोटी बच्ची हमें रोकेगी?”
आर्या ने अपनी सुनहरी पिन को हवा में घुमाया। वह लंबा होकर सुनहरे डंडे में बदल गई।
“यह छोटी बच्ची नहीं,” आर्या ने गुस्से से कहा, “अपने पापा की बेटी है।”
आदमियों ने उस पर हमला किया।
आर्या ने डंडा जमीन पर मारा। धरती काँप उठी और सभी आदमी दूर जा गिरे।
विक्रम पीछे हटने लगा।
“यह कैसे हो सकता है?”
आर्या ने कार का दरवाजा तोड़ा और विराज को बाहर निकाला।
“पापा, मैं आ गई।”
विराज ने उसे सीने से लगा लिया।
“तुम यहाँ क्यों आई? तुम्हें चोट लग सकती थी।”
आर्या ने रोते हुए कहा, “आपको कुछ हो जाता तो मुझे कहानी कौन सुनाता?”
विराज की आँखें भर आईं।
विक्रम भागने लगा, लेकिन आर्या ने सुनहरा डंडा उसके पैरों के बीच फेंक दिया। वह मुँह के बल गिर पड़ा।
विराज ने उसे कॉलर से पकड़ लिया।
“तुमने कंपनी के लिए मेरी माँ को मारने की कोशिश की।”
विक्रम डरकर बोला, “भैया, गलती हो गई। मुझे एक मौका दे दीजिए।”
“मैंने तुम्हें बहुत मौके दिए। आज से तुम्हारा सिंघानिया समूह से कोई संबंध नहीं।”
विक्रम ने दाँत भींच लिए।
“आपको लगता है आप जीत गए? असली खेल अभी शुरू हुआ है।”
वह किसी तरह वहाँ से भाग गया।
विराज ने आर्या की तरफ देखा। उसके छोटे हाथों पर चोट लगी थी और माथे से पसीना बह रहा था।
“तुम सच में कौन हो?”
आर्या ने मासूमियत से जवाब दिया, “आपकी बेटी।”
विराज का दिल भर आया।
उसने उसे अपनी बाँहों में उठाया।
“हाँ। चाहे तुम्हारा जन्म कहीं भी हुआ हो, आज से तुम मेरी बेटी हो।”
दूर अँधेरे में खड़ा नागेंद्र यह सब देख रहा था।
उसकी आँखों में लाल चमक उभरी।
“तो यह वही बच्ची है,” उसने बुदबुदाकर कहा, “जिसके जन्म से स्वर्ग के द्वार काँप उठे थे।”
और दोस्तों, यहीं से आर्या की जिंदगी का वह रहस्य खुलना शुरू हुआ, जो केवल सिंघानिया परिवार ही नहीं, बल्कि धरती और स्वर्ग दोनों की किस्मत बदलने वाला था।
पहाड़ी वाली घटना के बाद सिंघानिया परिवार के भीतर बहुत कुछ बदल गया था। विक्रम को कंपनी से निकाल दिया गया, उसके अधिकार छीन लिए गए और उसके दफ्तर को सील कर दिया गया। मगर विराज जानता था कि विक्रम इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं है।
दूसरी तरफ आर्या के आने से विराज की जिंदगी में ऐसी रोशनी आई थी जिसकी उसने उम्मीद छोड़ दी थी।
हर सुबह आर्या उसके कमरे में आकर परदे खोल देती।
“पापा, सूरज निकल आया। आप कब तक सोएँगे?”
विराज आँखें बंद किए कहता, “कंपनी का मालिक हूँ। थोड़ा देर तक सो सकता हूँ।”
आर्या तुरंत जवाब देती, “गुरुजी कहते हैं जो देर तक सोता है, उसकी किस्मत भी देर से जागती है।”
“तुम्हारे गुरुजी कभी अच्छी बात भी बताते हैं?”
“हाँ। वह कहते हैं मिठाई खाने से मन खुश रहता है।”
“यह बात उन्होंने कही थी या तुमने खुद बनाई?”
आर्या कुछ पल चुप रहती, फिर मासूम चेहरा बनाकर कहती, “बात चाहे किसी ने भी बनाई हो, सही तो है।”
आर्या रोज विराज की नसों का इलाज करती। कुछ ही दिनों में उसके पैरों में हल्की हरकत लौटने लगी। डॉक्टर भी हैरान थे, क्योंकि जिस समस्या को वे स्थायी मान चुके थे, उसमें अचानक सुधार हो रहा था।
एक सुबह आर्या ने विराज को सहारा देकर खड़ा किया।
विराज के पैर काँप रहे थे।
“मैं गिर जाऊँगा।”
“मैं पकड़ लूँगी।”
“तुम खुद इतनी छोटी हो।”
“मेरे हाथ छोटे हैं, ताकत नहीं।”
विराज ने पहला कदम बढ़ाया। फिर दूसरा।
सात वर्षों बाद वह अपने पैरों पर खड़ा था।