भाग 3
हरिदत्त और गायत्री देवी की आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे।
विराज ने आर्या को गोद में उठा लिया।
“तुमने मुझे नई जिंदगी दी है।”
आर्या ने उसकी गर्दन में बाँहें डाल दीं।
“अब आप मेरे साथ दौड़ भी पाएँगे।”
उसी समय कंपनी के आर्थिक संकट की खबर आई। विक्रम ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल करके कई निवेशकों को सिंघानिया समूह से दूर कर दिया था। झील किनारा परियोजना के लिए जरूरी पैसा रुक गया था।
विराज ने कई बैंकों और निवेश कंपनियों से बात की, मगर हर जगह से इनकार हो गया।
तभी आर्या ने उसे शहर में होने वाली एक बड़ी नीलामी के बारे में बताया।
“पापा, हमें वहाँ जाना है।”
“क्यों?”
“वहाँ आकाश-भेदी कुठार आने वाला है।”
“वह क्या है?”
आर्या का चेहरा गंभीर हो गया।
“माँ जिस दिव्य कैद में बंद हैं, उसका दरवाजा कोई साधारण शक्ति नहीं खोल सकती। गुरुजी ने कहा था कि केवल आकाश-भेदी कुठार उस बंधन को तोड़ सकता है।”
विराज ने हैरानी से पूछा, “तुम्हारी माँ जीवित हैं?”
“हाँ। मुझे उनकी आवाज कभी-कभी सुनाई देती है।”
विराज के भीतर अजीब-सी हलचल हुई। देवयानी की याद उसके सामने जीवित हो उठी।
“मैं तुम्हें उस नीलामी में ले जाऊँगा।”
अगले दिन शहर के सबसे बड़े सभागार में नीलामी शुरू हुई। वहाँ बड़े उद्योगपति, पुराने राजघरानों के सदस्य और धनवान व्यापारी मौजूद थे।
विक्रम भी नागेंद्र के साथ वहाँ पहुँचा था।
विराज को देखकर उसने व्यंग्य से कहा, “कंपनी के कर्मचारियों को वेतन देने के पैसे नहीं हैं और साहब खजाना खरीदने आए हैं।”
विराज ने उसकी तरफ देखना भी जरूरी नहीं समझा।
पहली वस्तु एक साधारण-सा पुराना शंख था। नीलामी करने वाले ने कहा कि यह समुद्र की दुर्लभ गहराइयों से मिला है।
लोग हँसने लगे।
“यह तो सड़क किनारे मिल जाता है।”
“दस हजार भी ज्यादा हैं।”
आर्या ने अचानक विराज का हाथ पकड़ लिया।
“पापा, इसे खरीदिए।”
“तुम्हें यह शंख चाहिए?”
“इसके अंदर कुछ है।”
विराज ने बिना सवाल किए दस हजार की बोली लगा दी। किसी और ने रुचि नहीं दिखाई, इसलिए शंख उसे मिल गया।
विक्रम जोर से हँसा।
“कंपनी डूब रही है और विराज पत्थर खरीद रहा है।”
आर्या ने शंख उठाकर मेज पर रखा।
“इसके अंदर तीन मोती हैं।”
विक्रम ने कहा, “अगर इसमें मोती निकले तो मैं सबके सामने कुत्ते की तरह भौंकूँगा।”
आर्या मुस्कराई।
“और अगर नहीं निकले?”
“तुम्हारे पापा मेरे सामने घुटने टेकेंगे।”
विराज ने कहा, “मुझे मंजूर है।”
शंख को सावधानी से खोला गया।
अंदर से तीन दूधिया सफेद मोती निकले, जिनकी चमक पूरे सभागार में फैल गई।
विशेषज्ञ ने जाँच कर कहा, “ये बेहद दुर्लभ मोती हैं। इनकी कीमत कम से कम चार करोड़ है।”
पूरा सभागार तालियों से गूँज उठा।
आर्या ने विक्रम की तरफ देखा।
“अब भौंकिए।”
विक्रम का चेहरा लाल हो गया।
“मैं मजाक कर रहा था।”
तभी सामने की कतार से प्रभावशाली उद्योगपति महिला माधवी राजवंशी उठीं।
माधवी राजवंशी समूह देश के सबसे बड़े व्यापारिक घरानों में से एक था।
उन्होंने कहा, “सौदा सबके सामने हुआ है। जो आदमी अपने शब्द का सम्मान नहीं करता, उसके साथ कोई व्यापार नहीं करता।”
विक्रम को मजबूरी में तीन बार कुत्ते की तरह भौंकना पड़ा।
आर्या ताली बजाकर हँसने लगी।
“पापा, यह तो सच में अच्छा भौंकते हैं।”
विराज भी अपनी हँसी नहीं रोक पाया।
नीलामी की दूसरी वस्तु किसी प्राचीन साधु का सुरक्षित रखा शरीर बताया गया। दावा किया गया कि उसके स्पर्श से बीमारी ठीक हो सकती है।
आर्या ने देखते ही कहा, “यह साधु नहीं है। इसके शरीर में जहरीली गैस भरी है।”
कबीर अरोड़ा ने आर्या की बात का मजाक उड़ाया और करोड़ों में वह वस्तु खरीद ली। जैसे ही उसने उसे छुआ, जहरीली गैस बाहर निकलने लगी और कबीर बेहोश होकर गिर पड़ा।
सभागार में अफरा-तफरी मच गई।
आर्या ने समय रहते सबको दूर कर दिया।
माधवी ने प्रभावित होकर कहा, “यह बच्ची साधारण नहीं है।”
अंत में आकाश-भेदी कुठार सामने लाया गया। वह देखने में पुराना और साधारण था, मगर आर्या को उसके चारों ओर नीली बिजली घूमती दिखाई दे रही थी।
शुरुआती कीमत आठ करोड़ रखी गई।
विक्रम ने नौ करोड़ की बोली लगाई।
विराज ने दस करोड़ कहा।
बोली बढ़ती गई।
सिंघानिया समूह के पास नकद पैसा बहुत कम बचा था। सहायक ने विराज के कान में कहा, “सर, अगर आपने इससे ज्यादा बोली लगाई तो कंपनी का पूरा पैसा खत्म हो जाएगा।”
आर्या ने विराज की ओर देखा। उसे समझ आ गया कि पापा कितनी बड़ी मुश्किल में हैं।
उसने धीमे से कहा, “पापा, मुझे कुठार नहीं चाहिए।”
“लेकिन तुम्हारी माँ?”
“माँ अच्छी हैं। वह मेरा इंतजार कर लेंगी। मैं आपकी कंपनी को डूबते नहीं देख सकती।”
विराज कुछ पल उसकी तरफ देखता रहा।
सात वर्ष की बच्ची अपनी माँ को बचाने का मौका छोड़ रही थी, सिर्फ इसलिए कि उसके पिता को नुकसान न हो।
उसने सहायक से कहा, “मेरे नाम की सभी संपत्तियाँ गिरवी रख दो।”
“सर!”
“जो कहा है, करो।”
विराज ने तीस करोड़ की बोली लगा दी।
पूरा सभागार शांत हो गया।
विक्रम और अधिक बोली लगाने वाला था, मगर नागेंद्र ने उसे रोक दिया।
“उसे खरीदने दो। जब कंपनी डूब जाएगी, कुठार अपने आप हमारा हो जाएगा।”
विराज ने आकाश-भेदी कुठार खरीद लिया।
आर्या की आँखों से आँसू बह निकले।
“आपने सब कुछ दाँव पर क्यों लगा दिया?”
विराज ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“तुमने मुझे मेरे पैर वापस दिए। तुमने मेरी माँ और दादाजी की जान बचाई। तुम्हारी माँ को बचाने के लिए मैं अपना सब कुछ दे सकता हूँ।”
उस दिन पहली बार आर्या ने मन ही मन कहा, “यही मेरे असली पापा हैं। कागज कुछ भी कहें।”
मगर नीलामी से लौटते ही कंपनी के सारे कर्ज देने वाले ऑफिस पहुँच गए। कर्मचारियों का वेतन रुका हुआ था और कई हिस्सेदारों ने विराज को पद से हटाने की माँग कर दी।
विक्रम ने दो दिन का समय दिया।
“अगर विराज दो दिन में सौ करोड़ नहीं जुटा पाया, तो उसे कंपनी के मुखिया का पद छोड़ना होगा।”
हरिदत्त ने विरोध किया, मगर हिस्सेदारों के हस्ताक्षर उसके सामने रख दिए गए।
विराज के पास केवल एक उम्मीद बची थी। अगले दिन माधवी राजवंशी का जन्मदिन समारोह था। वहाँ सबसे अच्छा उपहार देने वाले परिवार को सौ करोड़ का व्यापारिक समझौता मिलने वाला था।
विराज ने तीन दुर्लभ मोती माधवी को देने का फैसला किया।
मगर समारोह से कुछ घंटे पहले मोती कंपनी की तिजोरी से गायब हो गए।
समारोह में देश के बड़े परिवार महँगे उपहार लेकर आए थे। किसी ने दुर्लभ पौधा दिया, किसी ने पुरानी राजसी तलवार और किसी ने सदियों पुरानी संगीत पुस्तक।
विक्रम मंच पर पहुँचा और वही तीन मोती माधवी को दे दिए।
विराज समझ गया कि मोती उसी ने चुराए हैं, मगर उसके पास कोई प्रमाण नहीं था।
माधवी ने मोती देखकर कहा, “अब तक का सबसे अच्छा उपहार यही है। अगर कोई इससे बेहतर उपहार नहीं देता, तो समझौता विक्रम के नाम होगा।”
आर्या ने विराज का हाथ पकड़ा।
“हम यह कुठार दे देते हैं।”
विराज चौंक गया।
“यह तुम्हारी माँ को बचाने के लिए है।”
“पापा ने मेरे लिए सब कुछ दिया। अब मेरी बारी है।”
लेकिन विराज ने मना कर दिया।
तभी आर्या ने अपनी छोटी थैली से एक काली गोली निकाली।
“यह महान जीवनदायिनी गोली है। मैंने गुरुजी की दवा वाली अलमारी से ली थी।”
विराज ने माथा पकड़ लिया।
“तुमने चोरी की?”
“अपने गुरुजी की चीज लेना चोरी नहीं होता। वह बाद में डाँटेंगे, बस।”
आर्या गोली लेकर माधवी के पास पहुँची।
“दादीजी, यह आपके लिए।”
माधवी ने उसे देखकर पूछा, “यह क्या है?”
“इसे खाने से आपकी बीमारी ठीक हो जाएगी।”
विक्रम हँसने लगा।
“सड़क की बच्ची अब दवा बेच रही है।”
आर्या ने माधवी को ध्यान से देखा।
“आपके दिल में कमजोरी है। रात को बुरे सपने आते हैं। पैरों में दर्द रहता है और कभी-कभी साँस रुकने लगती है।”
माधवी का चेहरा बदल गया।
यह बातें बहुत कम लोगों को पता थीं।
फिर भी उन्होंने गोली खाने से इनकार कर दिया।
उसी समय अचानक उनके सीने में तेज दर्द उठा और वह गिर पड़ीं।
डॉक्टरों ने कहा कि हालत गंभीर है और एंबुलेंस आने तक देर हो सकती है।
आर्या ने गोली माधवी के मुँह में डाल दी।
कुछ ही क्षणों बाद माधवी के मुँह से काला खून निकला।
लोग चिल्लाने लगे कि बच्ची ने जहर दे दिया है।
सुरक्षा कर्मियों ने आर्या को पकड़ने की कोशिश की, मगर विराज उसके सामने खड़ा हो गया।
“मेरी बेटी को कोई हाथ नहीं लगाएगा।”
“अगर माधवीजी को कुछ हुआ तो?”
विराज ने बिना हिचके कहा, “मेरी बेटी असफल हुई तो उसकी जगह मेरी जान ले लेना।”
आर्या ने माधवी के शरीर पर सुइयाँ लगाईं और उनकी बंद नाड़ियों को खोलने लगी।
कुछ मिनट बाद माधवी ने आँखें खोल दीं।
वह उठकर बैठीं और हैरानी से बोलीं, “मेरे सीने का दर्द चला गया। मेरे पैर भी हल्के लग रहे हैं।”
डॉक्टरों ने जाँच की।
उनका दिल पहले से कहीं ज्यादा स्वस्थ था।
माधवी ने आर्या को गले लगा लिया।
“बेटी, तुमने मेरी जान बचाई है।”
फिर उन्होंने सबके सामने घोषणा की, “सौ करोड़ का समझौता विराज सिंघानिया को मिलेगा। इसके अलावा मैं सिंघानिया समूह में तीन सौ करोड़ का निवेश करूँगी।”
विक्रम के चेहरे से रंग उड़ गया।
माधवी ने उसकी तरफ देखकर कहा, “और जो मोती तुम लाए हो, वे कंपनी की तिजोरी से चोरी किए गए हैं। मेरे लोग पूरी जाँच करेंगे।”
सिंघानिया समूह बच गया।
उसी रात आर्या आकाश-भेदी कुठार लेकर भवन की छत पर पहुँची। उसने आसमान की ओर देखा।
“माँ, मैं आपको लेने आ रही हूँ।”
उसने कुठार उठाकर हवा में पूरी शक्ति से मारा।
आकाश में नीली दरार खुली। बादल गरजने लगे। दूर किसी अदृश्य स्थान पर काँच की ऊँची मीनार दिखाई दी, जिसके भीतर देवयानी कैद थी।
“आर्या!” देवयानी चीखी, “रुक जाओ! तुम्हारा शरीर इतनी शक्ति सह नहीं पाएगा।”
मगर आर्या ने दूसरी बार कुठार चलाया।
दिव्य मीनार में दरार पड़ गई।
उसी पल आकाश से भयानक बिजली आर्या पर गिरी।
उसका छोटा-सा शरीर छत पर जा गिरा।
विराज दौड़कर पहुँचा और उसे अपनी बाँहों में उठा लिया।
“आर्या! आँखें खोलो!”
आर्या को तुरंत हॉस्पिटल ले जाया गया। डॉक्टर ने कहा कि बहुत खून बह चुका है और उसका रक्त समूह बेहद दुर्लभ है।
विराज ने अपनी जाँच करवाई।
उसका रक्त आर्या से पूरी तरह मेल खाता था।
रक्त देते समय उसके मन में सवाल उठा।
“इतना दुर्लभ रक्त हम दोनों का एक जैसा कैसे हो सकता है?”
उसने डॉक्टर से गुप्त रूप से डीएनए जाँच करवाने को कहा।
मगर अस्पताल में नागेंद्र के आदमी पहले से मौजूद थे। असली रिपोर्ट बदल दी गई।
रिपोर्ट में लिखा था कि आर्या और विराज का कोई खून का रिश्ता नहीं है।
विराज का दिल टूट गया, लेकिन उसने तय किया कि चाहे आर्या उसकी असली बेटी न हो, वह उसे कानूनी रूप से अपनाएगा।
आर्या ठीक होकर घर लौटी तो उसके पास पहले जैसी शक्तियाँ नहीं थीं। उसकी दिव्य ऊर्जा आकाशीय बिजली के कारण बंद हो गई थी।
फिर भी विराज ने परिवार और शहर के बड़े लोगों को बुलाकर उसके स्वागत का समारोह रखा।